ड्रैगन कर रहा लंबे युद्ध की तैयारी? रक्षा कानून में किया बड़ा बदलाव
वैश्विक भू-राजनीतिक पटल पर इस समय ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर से लेकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र तक तनाव का पारा चरम पर है, और इस बीच चीन यानी ड्रैगन की हरकतों ने पूरी दुनिया की नींद उड़ा दी है। अपने आक्रामक क्षेत्रीय दावों और संभावित बड़े सैन्य टकराव की आशंका के बीच चीन की सरकार ने अपने रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों में एक बेहद खतरनाक और व्यापक बदलाव कर दिया है। नए संशोधनों के तहत, यदि देश में कभी भी युद्ध या आपातकाल जैसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो आम नागरिकों की निजी संपत्ति, बुनियादी ढांचे, परिवहन साधन और आर्थिक संसाधन स्वतः ही सीधे तौर पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) यानी चीनी सेना के नियंत्रण में चले जाएंगे। इस बड़े नीतिगत बदलाव से यह साफ हो गया है कि बीजिंग अब किसी भी छोटे-मोटे संघर्ष के बजाय एक लंबे, पूर्णकालिक और भीषण युद्ध की तैयारियों में पूरी ताकत से जुट गया है, जिससे वैश्विक स्तर पर सुरक्षा विश्लेषकों की चिंताएं कई गुना बढ़ गई हैं।
चीन के नए राष्ट्रीय रक्षा कानून और युद्धकालीन प्रावधानों के मायने
शी जिनपिंग प्रशासन के नेतृत्व में पिछले कुछ वर्षों से चीन अपनी सैन्य क्षमताओं के आधुनिकीकरण के साथ-साथ अपने नागरिक समाज और प्रशासनिक तंत्र को भी युद्ध की मानसिकता में ढालने का काम कर रहा है। हाल ही में किए गए इन कानूनी संशोधनों ने सेना को असीमित अधिकार प्रदान कर दिए हैं, जिसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा या युद्ध के समय नागरिक संसाधनों का इस्तेमाल पूरी तरह से सैन्य अभियानों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है। इसका मतलब यह है कि अगर ड्रैगन किसी भी देश के साथ युद्ध में उलझता है, तो सेना को देश के भीतर किसी भी कारखाने, निजी वाहन, गोदाम, तकनीकी उपकरण और संपत्तियों को बिना किसी पूर्व अनुमति के अपने कब्जे में लेने का कानूनी अधिकार मिल चुका है। जानकारों का मानना है कि यह कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बीजिंग भविष्य में किसी बड़े सैन्य संघर्ष, विशेषकर ताइवान पर कब्जे की जंग को लेकर अपनी आंतरिक व्यवस्था को पूरी तरह से चाक-चौबंद करना चाहता है ताकि संसाधनों की कमी के कारण उसके युद्ध अभियान में कोई रुकावट न आए।
ताइवान संकट और वैश्विक महायुद्ध की आशंकाओं के बीच ड्रैगन की चाल
चीनी राष्ट्रपति और सैन्य कमांडरों की ओर से लगातार यह बयान दिए जाते रहे हैं कि ताइवान का 'एकीकरण' उनके लिए एक मुख्य राष्ट्रीय लक्ष्य है, जिसे हासिल करने के लिए वे बल प्रयोग से भी पीछे नहीं हटेंगे। ऐसे में रक्षा कानूनों में इस तरह के कठोर बदलाव सीधे तौर पर इस आशंका को बल देते हैं कि चीन ताइवान या किसी अन्य पड़ोसी देश के खिलाफ किसी बड़े सैन्य अभियान का खाका तैयार कर चुका है। पश्चिमी देशों और अमेरिका के खुफिया तंत्र का मानना है कि चीन इस बात से भली-भांति वाकिफ है कि यदि वह ताइवान पर हमला करता है, तो उसे लंबे समय तक आर्थिक प्रतिबंधों और एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का सामना करना पड़ सकता है। इसी आर्थिक और सैन्य अवरोध से निपटने के लिए उसने अपने घरेलू कानूनों में इस प्रकार के प्रावधान किए हैं ताकि युद्ध की स्थिति में देश की पूरी अर्थव्यवस्था और संपत्ति को तुरंत एक सैन्य मशीनरी में तब्दील किया जा सके।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता और आर्थिक बाजारों पर पड़ने वाला प्रभाव
चीन के इस आक्रामक विधायी कदम ने न केवल उसके पड़ोसी देशों जैसे ताइवान, जापान, भारत और फिलीपींस की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के जानकारों में भी गहरी सुगबुगाहट पैदा कर दी है। एक तरफ जहां चीन अपनी घरेलू जनता को युद्ध के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय निवेशक और बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन से अपना कारोबार समेटने या सुरक्षित विकल्पों की तलाश करने पर विचार कर रही हैं। यदि भविष्य में चीन कोई भी दुस्साहस करता है, तो उससे न केवल एशिया की शांति को खतरा पैदा होगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पूरी तरह तबाह हो सकती है। कुल मिलाकर, ड्रैगन का यह नया रक्षा कानून इस बात की गवाही देता है कि दुनिया एक बेहद अनिश्चित और खतरनाक दौर में प्रवेश कर रही है, जहां महाशक्तियां किसी भी बड़ी अनहोनी से निपटने के लिए अपनी कानूनी और सैन्य तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगी हुई हैं।