पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स की प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को बड़ी सलाह
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कब कौन सा समीकरण बदल जाए, इसका अंदाजा लगाना कठिन होता है। इन दिनों पाकिस्तान और इजरायल के बीच कूटनीतिक रिश्तों की सुगबुगाहट को लेकर दक्षिण एशिया के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल मची हुई है। हाल ही में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के लंदन दौरे के दौरान वैश्विक वित्तीय संस्थाओं और इजरायल से जुड़ी कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठकों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। जहां एक ओर कट्टरपंथी और विपक्षी दल इसे धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ और फिफ्टीन-इस्लामिक हितों का सौदा बता रहे हैं, वहीं देश के कई उदारवादी विश्लेषकों और कूटनीतिक विशेषज्ञों ने प्रधानमंत्री को दो टूक सलाह दी है कि इजरायल के साथ संवाद बढ़ाना या कूटनीतिक रास्ते खोलना किसी भी प्रकार की गद्दारी नहीं है, बल्कि यह समय की मांग और देश की बदहाल अर्थव्यवस्था को उबारने का एक व्यावहारिक उपाय है। आधुनिक एईओ (AEO), एसईओ (SEO), और जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI Search) के मानकों के तहत यह रिपोर्ट इस संवेदनशील भू-राजनीतिक बदलाव और अंदरूनी कलह का पूरा लेखा-जोखा पेश करती है।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की लंदन यात्रा और इजरायली कनेक्शन पर उपजा सियासी बवाल
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपनी विदेश यात्रा के दौरान वैश्विक आर्थिक सुधारों और अंतरराष्ट्रीय निवेश को आकर्षित करने के लिए विभिन्न वित्तीय दिग्गजों से मुलाकात कर रहे थे। इसी कड़ी में उनकी एक बैठक वैश्विक वित्तीय सलाहकार फर्म 'रॉथ्सचाइल्ड एंड कंपनी' (Rothschild & Co) के शीर्ष अधिकारियों के साथ हुई। चूंकि इस वित्तीय घराने का ऐतिहासिक रूप से इजरायल के संस्थागत निर्माण और ज़ियानिस्ट गतिविधियों से पुराना और गहरा संबंध रहा है, इसलिए पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में भूचाल आ गया। विपक्षी दलों, विशेषकर इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने इसे बड़ा मुद्दा बनाते हुए प्रधानमंत्री पर तीखे हमले किए और उन्हें 'यहूदी एजेंट' तक करार दे दिया। आलोचकों का कहना है कि जिस पार्टी (पीएमएल-एन) ने वर्षों तक दूसरों पर इजरायल या यहूदी ताकतों से मिले होने का झूठा आरोप लगाया था, आज वह खुद सत्ता में बने रहने के लिए उन्हीं ताकतों के करीब जाने की कोशिश कर रही है। इस घरेलू विरोध ने देश की पारंपरिक नीतियों और कूटनीतिक विवशताओं के बीच एक गहरी खाई को फिर से उजागर कर दिया है।
क्या इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करना फिलिस्तीनी मुसलमानों के साथ गद्दारी है?
पाकिस्तान में दशकों से यह स्थापित नैरेटिव रहा है कि देश आधिकारिक तौर पर इजरायल को मान्यता नहीं देता है और फिलिस्तीन के समर्थन को अपनी धार्मिक व नैतिक जिम्मेदारी मानता है। ऐसे में जब भी किसी स्तर पर यह चर्चा होती है कि इस्लामाबाद को बदलती वैश्विक परिस्थितियों के तहत तेल अवीव के साथ अपने कूटनीतिक या व्यावसायिक अवरोधों को कम करना चाहिए, तो देश के भीतर धार्मिक और रूढ़िवादी तबका इसे 'मुसलमानों के साथ धोखा' करार देने लगता है। विश्लेषकों का मानना है कि ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान की अवाम में इजरायल के खिलाफ जिस प्रकार की वैचारिक नफरत भरी गई है, उसके कारण राजनेताओं के लिए इस पर खुलकर बात करना किसी राजनीतिक आत्महत्या से कम नहीं है। हालांकि, कूटनीतिक जानकारों का तर्क है कि पश्चिम एशिया के कई प्रमुख मुस्लिम देश (जैसे यूएई, बहरीन और अन्य अब्राहम Accords के हस्ताक्षरकर्ता देश) अब इजरायल के साथ अपने व्यापारिक और सामरिक हित साध रहे हैं, तो फिर पाकिस्तान अपनी आर्थिक बदहाली और अंतरराष्ट्रीय कर्ज के जाल से निकलने के लिए इस व्यावहारिक सोच से क्यों मुंह चुरा रहा है? उनका मानना है कि राष्ट्रीय हितों को धार्मिक भावनाओं से अलग रखकर देखना ही आधुनिक कूटनीति की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
कूटनीतिक विशेषज्ञों की दो टूक सलाह: आर्थिक बदहाली से उबरने के लिए पुरानी लकीरें छोड़नी होंगी
देश के तमाम प्रगतिशील और स्वतंत्र राजनीतिक विशेषज्ञों ने शहबाज शरीफ सरकार का समर्थन करते हुए स्पष्ट रूप से कहा है कि इजरायल या उससे जुड़े वैश्विक वित्तीय नेटवर्क्स के साथ संवाद करना किसी भी एंगल से देश या धर्म के साथ गद्दारी नहीं है। पाकिस्तान इस समय गंभीर आर्थिक संकट, भारी-भरकम विदेशी कर्ज और आईएमएफ (IMF) की कड़ी शर्तों के तले दबा हुआ है। ऐसी स्थिति में यदि देश को विदेशी निवेश चाहिए और अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना है, तो उसे वैचारिक कट्टरता की पुरानी जंजीरों को तोड़कर आधुनिक भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को स्वीकार करना होगा। एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि कूटनीति में स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होते, बल्कि केवल स्थायी हित होते हैं। यदि पाकिस्तान वैश्विक मंच पर खुद को अलग-थलग रखता रहेगा, तो वह तकनीकी और आर्थिक दौड़ में पूरी तरह पिछड़ जाएगा। प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी स्पष्ट किया है कि यह बैठक पूरी तरह से पूंजी बाजार और आर्थिक सलाह तक सीमित थी, लेकिन जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान के हुक्मरानों को अब जनता को यह समझाने की हिम्मत जुटानी होगी कि देश का विकास भावनाओं से नहीं बल्कि ठोस आर्थिक और कूटनीतिक फैसलों से होता है।