मोदी और जिनपिंग की मुलाकात से पाकिस्तान में मचा हड़कंप, चीन-भारत की नजदीकियों से उड़े होश

मोदी और जिनपिंग की मुलाकात से पाकिस्तान में मचा हड़कंप, चीन-भारत की नजदीकियों से उड़े होश

अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बिसात पर कब कौन सी चाल चल दी जाए, इसका अंदाजा लगाना हर किसी के बस की बात नहीं होती। कूटनीति के गलियारों में जब दो महाशक्तियां आपस में मिलती हैं, तो दुनिया भर के समीकरण रातों-रात बदल जाते हैं। कुछ ऐसा ही नजारा हाल ही में एक वैश्विक मंच पर देखने को मिला, जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने-सामने आए। दोनों शीर्ष नेताओं के बीच हुई इस मुलाकात ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस हाई-प्रोफाइल मीटिंग की गूंज जितनी दिल्ली और बीजिंग में सुनाई दी, उससे कहीं ज्यादा इसका असर इस्लामाबाद की सियासत पर देखने को मिला। भारत और चीन के बीच सुधरते कूटनीतिक और आर्थिक रिश्तों की आहट भर से पाकिस्तान के हुक्मरानों के दिल की धड़कनें तेज हो गईं। इस मुलाकात की तस्वीरें जैसे ही सार्वजनिक हुईं, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का उतरा हुआ चेहरा इस बात की गवाही देने के लिए काफी था कि उनके मुल्क की बेचैनी किस कदर बढ़ चुकी है।

पाकिस्तान के लिए क्यों किसी झटके से कम नहीं है यह मुलाकात

दशकों से पाकिस्तान यह मानकर चल रहा था कि भारत और चीन के बीच के तनाव का फायदा उठाकर वह अपनी रोटियां सेकता रहेगा। पाकिस्तानी रणनीतिकार हमेशा इस गलतफहमी में जीते रहे कि बीजिंग हमेशा नई दिल्ली के खिलाफ उनके पाले में खड़ा रहेगा। लेकिन समय के साथ वैश्विक भू-राजनीति में जो बड़े बदलाव आए हैं, उन्होंने पाकिस्तान के इस भ्रम को पूरी तरह से चकनाचूर कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की इस ताजा मुलाकात ने साफ कर दिया है कि आज के दौर में देशहित और व्यापारिक संबंध कूटनीति के सबसे बड़े पैमाने बन चुके हैं। दोनों एशियाई दिग्गजों ने आपसी संवाद को बढ़ावा देने और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया है, जो पाकिस्तान के हुक्मरानों के गले नहीं उतर रहा है। जब दो सबसे बड़े पड़ोसी देश आपस में मिलकर भविष्य की रणनीति तय कर रहे हों, तो स्वाभाविक है कि आतंकवाद के सहारे अपनी राजनीति चलाने वाले देश की नींद उड़ना तय है। शहबाज शरीफ और उनके आकाओं के लिए यह दृश्य किसी बड़े राजनीतिक झटके से कम नहीं था।

शहबाज शरीफ का उतरा चेहरा और इस्लामाबाद में मातम

सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया चैनलों पर वायरल हो रही तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि इस मुलाकात के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का चेहरा किस तरह उतरा हुआ नजर आया। इस्लामाबाद के राजनीतिक गलियारों में इस समय सन्नाटा पसरा हुआ है, क्योंकि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि अगर भारत और चीन आपसी मतभेदों को दरकिनार कर कूटनीतिक संवाद को आगे बढ़ाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनका क्या वजूद रह जाएगा। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले ही आईसीयू में है और वह अपनी हरकतों के लिए चीन और अन्य वैश्विक संस्थाओं के सामने हाथ फैलाने को मजबूर है। ऐसे में मोदी और जिनपिंग की यह सौहार्दपूर्ण मुलाकात पाकिस्तान के उस प्रोपेगैंडा को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है, जिसके तहत वह भारत को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग दिखाने का सपना देखता था। प्रधानमंत्री मोदी के इस कूटनीतिक कौशल ने पड़ोसी मुल्क को मानसिक रूप से पंगु बना दिया है और वहां के मीडिया में भी इस बात की खुलकर चर्चा होने लगी है कि अब उनका 'सदाबहार दोस्त' भी भारत के साथ रिश्तों को प्राथमिकता दे रहा है।

भू-राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव और भारत का बढ़ता रसूख

आज का नया भारत दुनिया के किसी भी कोने में आंखें झुकाकर बात नहीं करता, बल्कि अपनी शर्तों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर मजबूत कूटनीति तय करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की यह सबसे बड़ी खूबी रही है कि उन्होंने चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देश के साथ भी कूटनीतिक चैनलों को खुला रखते हुए अपने हितों को साधने में महारत हासिल की है। शी जिनपिंग के साथ हुई इस मुलाकात में क्षेत्रीय व्यापार, सीमावर्ती शांति और वैश्विक अर्थव्यवस्था जैसे अहम मुद्दों पर सकारात्मक चर्चा हुई। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत क्षेत्रीय स्थिरता का मुख्य स्तंभ है और दुनिया के तमाम बड़े देश अब इस सच्चाई को स्वीकार कर चुके हैं। जब भारत वैश्विक पटल पर इतनी मजबूत स्थिति में खड़ा होता है, तो उसके विरोधी खेमे में बेचैनी होना स्वाभाविक है। पाकिस्तान की जनता भी अब अपने नेताओं से सवाल पूछने लगी है कि आखिर कब तक वे झूठे सपनों के सहारे देश की जनता को गुमराह करते रहेंगे, जबकि भारत हर मोर्चे पर नए मील के पत्थर गढ़ रहा है।

ड्रैगन की नई चाल और पाकिस्तान की बढ़ी हुई लाचारी

इस हाई-प्रोफाइल मुलाकात के बाद से यह साफ हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई भी देश किसी का स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता, बल्कि राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है। चीन ने भी यह भली-भांति समझ लिया है कि भारत के साथ आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग बढ़ाना उसके अपने हित में है। बीजिंग और नई दिल्ली के बीच बढ़ती इस समझ ने इस्लामाबाद के रणनीतिकारों को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। शहबाज शरीफ और उनकी सरकार अब समझ नहीं पा रही है कि वे अपनी जनता को क्या जवाब दें। एक तरफ देश में भुखमरी, महंगाई और आंतरिक अशांति का माहौल है, तो दूसरी तरफ उनके सबसे बड़े सहारे कहे जाने वाले चीन का भारत के प्रति नरम रुख अपनाना उनके लिए किसी वज्रापात से कम नहीं है। मोदी और जिनपिंग की यह मुलाकात आने वाले समय में वैश्विक राजनीति की दशा और दिशा तय करेगी, लेकिन इतना तय है कि इस एक तस्वीर ने पाकिस्तान के हुक्मरानों की रातों की नींद जरूर उड़ा दी है और उनके चेहरे की हवाइयां उड़ती साफ देखी जा सकती हैं।