भारत से विवाद सुलझाने की जरूरत: पूर्व पाकिस्तानी जनरल ने दी बड़े टकराव की चेतावनी
दक्षिण एशिया की राजनीति और सामरिक गलियारों से एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर बयान सामने आया है, जहां पाकिस्तान के एक पूर्व सैन्य जनरल ने अपनी ही सरकार और देश की नीतियों को आईना दिखाते हुए भारत के साथ सभी लंबित विवादों को तुरंत बातचीत के जरिए सुलझाने की वकालत की है। उन्होंने कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि दोनों पड़ोसी देश अपने पुराने और जटिल मुद्दों का शांतिपूर्ण समाधान नहीं निकालते हैं, तो आने वाले समय में एक और बड़े और विनाशकारी टकराव से बचना नामुमकिन हो जाएगा। इस पूर्व जनरल ने खास तौर पर कश्मीर विवाद और सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) जैसे संवेदनशील विषयों पर खुलकर बात करते हुए यह स्वीकार किया है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और आंतरिक स्थिरता अब भारत के साथ लंबे समय तक चलने वाले तनाव को झेलने की स्थिति में नहीं है। उनके इस बयान के बाद से पाकिस्तान से लेकर भारत तक के राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में खलबली मच गई है, क्योंकि किसी पाकिस्तानी सैन्य पृष्ठभूमि के व्यक्ति द्वारा इस तरह की यथार्थवादी और गंभीर बात कहना एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
कश्मीर और सिंधु जल संधि पर पूर्व पाकिस्तानी जनरल का बड़ा कबूलनामा और कूटनीतिक मंथन
पाकिस्तान के पूर्व सैन्य अधिकारी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरा पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट, महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने साक्षात्कार के दौरान माना कि भारत के साथ दशकों से चले आ रहे कश्मीर विवाद को युद्ध के मैदान में जीतने का सपना अब पूरी तरह से बेमानी हो चुका है और सैन्य ताकत से स्थिति को बदलने की कोशिशें केवल बर्बादी का कारण बनेंगी। इसके साथ ही उन्होंने सिंधु जल संधि के भविष्य और दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर चल रहे तकनीकी व कूटनीतिक तनाव पर भी गहरी चिंता जताई है। उनका कहना था कि भारत जैसे विशाल और तेजी से उभरती हुई वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के साथ संवाद के दरवाजों को बंद रखना पाकिस्तान के अपने ही भविष्य के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान इस बात का साफ संकेत है कि पाकिस्तान की अंदरूनी व्यवस्था और प्रबुद्ध वर्ग का एक हिस्सा अब यह समझने लगा है कि भारत के साथ स्थायी शांति और व्यापारिक रिश्ते बहाल किए बिना देश को इस गर्त से बाहर निकालना असंभव है।
क्या बदल रही है पाकिस्तान की सामरिक सोच या कूटनीतिक दबाव के आगे झुकने को मजबूर हैं पूर्व अधिकारी
इस पूरी घटनाक्रम के बाद विश्लेषकों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वाकई पाकिस्तान की सैन्य और रणनीतिक सोच में कोई बुनियादी बदलाव आ रहा है, या फिर यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव का परिणाम है। भारत ने हमेशा से अपनी विदेश नीति में यह स्पष्ट रखा है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते, और यदि पाकिस्तान को द्विपक्षीय संबंध सुधारने हैं तो उसे अपनी सरजमीं से संचालित होने वाली भारत विरोधी गतिविधियों पर पूरी तरह से रोक लगानी होगी। पूर्व पाकिस्तानी जनरल की इस चेतावनी ने एक बार फिर से इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच बंद पड़े कूटनीतिक संवाद के रास्ते दोबारा खुल सकते हैं। हालांकि भारतीय कूटनीति के जानकारों का यह भी मानना है कि जब तक पाकिस्तान की सत्ता और सेना के वास्तविक नियंत्रण में बैठे लोगों की मानसिकता में कोई ठोस और स्थायी परिवर्तन नहीं आता, तब तक ऐसे बयानों को केवल एक हताशा भरा कदम या प्रतीकात्मक कूटनीति ही माना जाना चाहिए। बावजूद इसके, इस प्रकार की आवाजें उठना यह जरूर साबित करती हैं कि भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत और मजबूत होती अर्थव्यवस्था के आगे अब पड़ोसी देश के भीतर भी यह अहसास गहराने लगा है कि टकराव का रास्ता देश को पूरी तरह तबाह कर देगा और शांति के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा है।