मोदी से सिर्फ मिलने नहीं, कई शर्तों के साथ आ रहे नेपाली PM बालेन शाह

मोदी से सिर्फ मिलने नहीं, कई शर्तों के साथ आ रहे नेपाली PM बालेन शाह

नेपाल की राजनीति में अपनी बेबाक और सख्त छवि के लिए मशहूर प्रधानमंत्री बालेन (बालेंद्र) शाह का पहला आधिकारिक भारत दौरा तय हो चुका है। 22 से 25 नवंबर के बीच होने वाली इस चार दिवसीय हाई-प्रोफाइल दिल्ली यात्रा को लेकर दक्षिण एशियाई कूटनीति के गलियारों में भारी हलचल मची हुई है। भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री के हालिया काठमांडू दौरे और नेपाली शीर्ष नेतृत्व से मुलाकातों के बाद इस दौरे का खाका पूरी तरह से तैयार हो गया है। हालांकि, काठमांडू के राजनीतिक गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, बालेन शाह नई दिल्ली केवल औपचारिक मुलाकात या फोटो-सेशन के लिए नहीं आ रहे हैं। वे अपने साथ नेपाल के बुनियादी ढांचागत विकास, सीमा विवादों और वित्तीय सहायता से जुड़ी शर्तों एवं ठोस मांगों का एक लंबा एजेंडा लेकर आ रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बातचीत में बालेन शाह का यह आक्रामक स्टैंड काम कर पाएगा या फिर भारत अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक और सुरक्षा प्राथमिकताओं पर मजबूती से टिका रहेगा?

बालेन शाह का दिल्ली दौरा और नेपाल के कड़े कूटनीतिक पैंतरे

काठमांडू के रणनीतिक सूत्रों के अनुसार, बालेन शाह के नेतृत्व वाली नेपाल सरकार ने नई दिल्ली के सामने अपनी मांगों की एक लंबी सूची रखी है। नेपाल की प्राथमिकताओं में अगस्त में आई विनाशकारी बाढ़ से हुए नुकसान से निपटने के लिए करीब 500 मिलियन डॉलर का पुनर्निर्माण अनुदान (Reconstruction Grant) और 500 मिलियन डॉलर की अतिरिक्त सहायता शामिल है। इसके अलावा नेपाल भारत से 1 अरब डॉलर की नई क्रेडिट लाइन और 2 अरब डॉलर का विशेष आर्थिक पैकेज हासिल करने की फिराक में है। नेपाल का तर्क है कि भारत की ओर से पूर्व में किए गए राजनीतिक वादों और द्विपक्षीय प्रोजेक्ट्स की गति पिछले कुछ वर्षों से काफी धीमी रही है, जिन्हें अब बिना किसी देरी के पूरा किया जाना चाहिए। भैरहवा और पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के संचालन के लिए भारत से अतिरिक्त एयर एंट्री रूट्स (हवाई प्रवेश बिंदु) हासिल करना भी बालेन शाह की प्रमुख शर्तों में शामिल है।

लिपुलेख और कालापानी सीमा विवाद: क्या बालेन शाह उठाएंगे सख्त रुख?

भारत और नेपाल के संबंधों में कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा का सीमा विवाद हमेशा से एक संवेदनशील और गर्माया हुआ मुद्दा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के शासनकाल में इस मुद्दे को लेकर दोनों देशों के रिश्तों में खासी तल्खी आ गई थी। अब जब बालेन शाह सत्ता में हैं, तो नेपाल के घरेलू जनमानस की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वे पीएम नरेंद्र मोदी के सामने इस मुद्दे पर कड़ा और आक्रामक रुख अपनाएंगे। बालेन शाह ने काठमांडू का मेयर रहते हुए और बाद में प्रधानमंत्री बनने तक कई मौकों पर अपने आक्रामक राष्ट्रवादी स्टैंड से नेपाली युवाओं का भारी समर्थन हासिल किया है। हालांकि, कूटनीति के जानकारों का कहना है कि मेज पर बैठकर टेबल टॉक करते समय आक्रामकता से ज्यादा परिपक्वता और व्यावहारिक तालमेल की जरूरत होती है। यदि बालेन केवल घरेलू राजनीति को साधने के लिए सख्त रुख अपनाते हैं, तो इससे द्विपक्षीय वार्ता का माहौल प्रभावित हो सकता है।

हाइड्रोपावर, कनेक्टिविटी और व्यापार संधि पर नई दिल्ली की सतर्क रणनीति

भारत हमेशा से नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक और विकास साझेदार रहा है, लेकिन चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए नई दिल्ली भी अब हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही है। इस दौरे के दौरान रक्सौल-काठमांडू रेलवे लाइन, पंचेश्वर बहुउद्देशीय परियोजना और हाइड्रोपावर एक्सपोर्ट (जलविद्युत व्यापार) जैसे अहम एजेंडों पर समझौते होने की संभावना है। भारत, नेपाल की पनबिजली को खरीदने के लिए तैयार है, बशर्ते उसमें चीनी कंपनियों का मालिकाना हक या निवेश न हो। भारतीय विदेश मंत्रालय के रुख से साफ है कि भारत नेपाल के साथ 'नेबरहुड फर्स्ट' (पड़ोसी प्रथम) की नीति के तहत एक मजबूत, सकारात्मक और परिणाम-उन्मुख संबंध चाहता है। मगर सुरक्षा चिंताओं और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक संतुलन से भारत किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। बालेन शाह की आक्रामक कूटनीति दिल्ली में कितनी रंग लाती है, इसका फैसला 23 और 24 नवंबर को होने वाली द्विपक्षीय बैठकों के नतीजों से ही होगा।