सिर्फ शुद्ध सात्विक प्रेम ही राष्ट्रीय....संघ प्रमुख मोहन भागवत का ऐतिहासिक और प्रेरणादायक बयान

सिर्फ शुद्ध सात्विक प्रेम ही राष्ट्रीय....संघ प्रमुख मोहन भागवत का ऐतिहासिक और प्रेरणादायक बयान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत इन दिनों अपने बयानों और वैचारिक स्पष्टता को लेकर पूरी दुनिया में खासी सुर्खियां बटोर रहे हैं। हाल ही में यूनाइटेड किंगडम यानी लंदन के दौरे पर पहुंचे संघ प्रमुख मोहन भागवत ने वहाँ भारतीय प्रवासियों, बुद्धिजीवियों और संघ के स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण और वैचारिक बयान दिया है। उन्होंने अपने इस संबोधन के दौरान दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का मूल आधार किसी भी प्रकार की घृणा या नफरत पर आधारित नहीं है, बल्कि इस विशाल संगठन की नींव केवल और केवल 'शुद्ध सात्विक प्रेम' और राष्ट्रभक्ति पर टिकी हुई है। उनके इस बयान ने उन तमाम आलोचकों और राजनीतिक विरोधियों के मुंह पर करारा ताला जड़ दिया है जो अक्सर संघ की विचारधारा को लेकर तरह-तरह के भ्रामक दावे करते रहते हैं। लंदन की धरती से दिए गए इस बयान के बाद से वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति, विचार और संघ की कार्यशैली को लेकर एक नई और सकारात्मक बहस छिड़ गई है, जिसमें हर कोई इस महान संगठन के वैचारिक विस्तार को गहराई से समझने की कोशिश कर रहा है।

लंदन में आयोजित भव्य कार्यक्रम में संघ प्रमुख का वैचारिक संबोधन

ब्रिटेन की राजधानी लंदन में आयोजित एक भव्य और गरिमामय कार्यक्रम के दौरान जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मंच संभाला, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इस कार्यक्रम में ब्रिटेन के कोने-कोने से आए भारतीय मूल के नागरिक, प्रतिष्ठित व्यवसायी, युवा और विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गज शामिल हुए थे। अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने संघ के शताब्दी वर्ष और उसकी लंबी यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि किसी भी संस्था या संगठन को इतने लंबे समय तक जीवित और गतिशील बनाए रखना तभी संभव होता है जब उसकी जड़ें सत्य, सेवा और निस्वार्थ प्रेम पर टिकी हों। उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में समझाया कि संघ का हर एक स्वयंसेवक अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर समाज और देश के कल्याण के लिए काम करता है, और इसके पीछे किसी के प्रति कोई दुर्भावना या ईर्ष्या नहीं होती। उनका यह संदेश विदेशों में रह रहे भारतीयों के दिलों में अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम और सम्मान को और अधिक प्रगाढ़ करने वाला साबित हुआ है।

नफरत और वैमनस्य के नैरेटिव पर मोहन भागवत का करारा प्रहार

विगत कुछ दशकों में राजनीतिक और वैचारिक गलियारों में यह एक आम चलन बन गया है कि कुछ खास विचारधारा के लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में समाज में गलतफहमियां फैलाने और इसे एक नफरत फैलाने वाले संगठन के रूप में चित्रित करने का प्रयास करते रहते हैं। इस वैचारिक हमले का जवाब देते हुए मोहन भागवत ने लंदन के मंच से स्पष्ट कर दिया कि जो लोग संघ को करीब से नहीं जानते, वे ही इस तरह के बेबुनियाद आरोप लगाते हैं। उन्होंने बल देकर कहा कि संघ की शाखाओं में जाने वाला हर व्यक्ति केवल अनुशासन, देशभक्ति और समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने की सीख पाता है। जहाँ समाज को तोड़ने वाली ताकतें हमेशा नफरत और भेदभाव का सहारा लेती हैं, वहीं संघ का मुख्य उद्देश्य समाज को एक सूत्र में पिरोना और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करना है। संघ प्रमुख के इस स्पष्टीकरण ने दुनिया के पटल पर यह संदेश दे दिया है कि भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आधार कभी भी किसी के प्रति द्वेष नहीं हो सकता, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के कल्याण की भावना से ओत-प्रोत है।

विदेशों में बसे भारतीयों की भूमिका और राष्ट्र निर्माण में संघ का योगदान

अपने संबोधन के आगे के हिस्से में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विशेष रूप से विदेशों में रह रहे भारतीय डायस्पोरा यानी प्रवासी भारतीयों की सराहना की। उन्होंने कहा कि सात समंदर पार ब्रिटेन जैसी जगहों पर रहने के बावजूद इन भारतीयों ने अपनी प्राचीन संस्कृति, संस्कारों और जड़ों को जिस प्रकार संभाल कर रखा है, वह वाकई प्रशंसनीय है। आज दुनिया भर में भारत का जो मान-सम्मान और डंका बज रहा है, उसमें इन प्रवासी भारतीयों का बहुत बड़ा योगदान है। संघ प्रमुख ने सभी से आह्वान किया कि वे अपनी अगली पीढ़ी को भी अपने गौरवशाली इतिहास और संस्कारों से जोड़े रखें, ताकि वे दुनिया के किसी भी कोने में जाएं, लेकिन उनकी रगों में भारतीयता का अहसास हमेशा जिंदा रहे। उन्होंने यह भी कहा कि भारत आज जिस तेजी से आत्मनिर्भरता और विकास के नए मील के पत्थर छू रहा है, उसमें हर भारतीय नागरिक की सहभागिता सबसे बड़ी ताकत है, चाहे वह देश के भीतर रह रहा हो या दुनिया के किसी भी अन्य देश में अपनी सेवाएं दे रहा हो।

आधुनिक डिजिटल और एआई सर्च के दौर में संघ के विचारों का वैश्विक प्रभाव

आज के इस आधुनिक डिजिटल युग और जेनेरेटिव एआई सर्च के इस दौर में वैचारिक और दार्शनिक विषयों से जुड़ी खबरें सेकंडों में पूरी दुनिया के करोड़ों लोगों तक पहुँच जाती हैं। गूगल डिस्कवर और बिंग जैसे आधुनिक सर्च इंजन यूजर की जिज्ञासा, रुचि और ट्रेंड्स को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार की महत्वपूर्ण और वैचारिक खबरों को प्रमुखता से स्थान देते हैं। पाठकों के बीच यह जानना हमेशा से बहुत दिलचस्प और प्रासंगिक रहा है कि आखिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी दुनिया की सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्था की वैचारिक पृष्ठभूमि क्या है और इसके शीर्ष नेता किस तरह से दुनिया के सामने अपने विचार रखते हैं। लंदन से दिए गए मोहन भागवत के इस बयान ने सोशल मीडिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक खूब सुर्खियां बटोरी हैं। यह बयान इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि आधुनिकता के इस दौर में भी भारतीय संस्कृति के मूल मूल्य, जैसे कि प्रेम, सेवा, और वसुधैव कुटुंबकम की भावना कितनी प्रासंगिक है और पूरी दुनिया आज भारत के इन शाश्वत विचारों को बहुत ही गौर से सुन रही है।