160 से ज्यादा जिंदगियां गईं, जानें नेपाल में तबाही का असली कारण क्या
हिमालयी देश नेपाल में बुधवार को मची भीषण तबाही को लेकर एक बड़ा वैज्ञानिक खुलासा सामने आया है। अब तक जिसे भूकंप से उपजा जलजला माना जा रहा था, वह दरअसल एक भयानक प्राकृतिक भूस्खलन और हिमनद का टूटना था।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के वैज्ञानिकों ने साफ कर दिया है कि 160 से अधिक जिंदगियों को लीलने वाली यह आपदा 'ग्लेशियर के ढहने' और उसके बाद बहे 'विशाल मलबे' का सीधा नतीजा थी।
शुरुआती भ्रम और सैटेलाइट डेटा का सच
आपदा के शुरुआती घंटों में स्थानीय सिस्मोग्राफ ने नेपाल-चीन सीमा के पास 4.4 और 5.2 तीव्रता के झटके दर्ज किए थे, जिसके चलते इसे भूकंप समझा गया। USGS ने जब नजदीकी सीस्मोलॉजिकल स्टेशनों, लंबी अवधि की तरंगों और हाई-रेजोल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों की गहन पड़ताल की, तो सच कुछ और ही निकला। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जमीन के भीतर कोई टेक्टोनिक हलचल नहीं हुई थी, बल्कि पहाड़ों से गिरे विशाल हिमखंड और चट्टानों के घर्षण से पैदा हुए कंपन को सिस्मिक उपकरणों ने भूकंप मान लिया था।
ग्लेशियर फटने की संवेदनशीलता और बढ़ता खतरा
नेपाल लंबे समय से 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOF) के गंभीर खतरे से जूझ रहा है। जब तेजी से पिघलते हिमनदों के पीछे बनी प्राकृतिक झीलें भारी दबाव से टूटती हैं, तो पहाड़ों से नीचे उतरता पानी रास्ते में आने वाली हर चीज को तबाह कर देता है। रसुवा जिले में बीते वर्ष भी ऐसा ही कहर टूटा था। रीडिंग यूनिवर्सिटी की जलवायु वैज्ञानिक डोरोथी हेनरिक के अनुसार, पहाड़ी घाटियां बेहद संकरी होती हैं। जैसे ही कोई विशाल हिमखंड या मलबा नदी के प्रवाह को रोकता है, पीछे पानी की अथाह दीवार खड़ी हो जाती है। जब यह रुकावट टूटती है, तो नीचे की बस्तियों को संभलने का एक पल भी नहीं मिलता। हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता तापमान और पिघलते पर्माफ्रॉस्ट इन हादसों की आवृत्ति तेजी से बढ़ा रहे हैं।
जमीन पर भारी तबाही और तेज हुआ राहत कार्य
इस विनाशकारी जलप्रलय का सबसे गंभीर असर नेपाल के बुनियादी ढांचे पर पड़ा है। बाढ़ के वेग में 19 प्रमुख मोटर पुल ताश के पत्तों की तरह बह गए। नुवाकोट और रसुवा जिलों में चल रही 354 मेगावाट क्षमता की आठ जलविद्युत परियोजनाएं तबाह हो गई हैं, जबकि पांच निर्माणाधीन हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को भारी नुकसान पहुंचा है। सेना के 44 जवानों समेत करीब 80 सुरक्षाकर्मी अभी भी लापता हैं। प्रधानमंत्री बालेन शाह ने आपात बैठक बुलाकर प्रभावित इलाकों में युद्धस्तर पर राहत और बचाव कार्य चलाने के निर्देश दिए हैं, जबकि खोज दल मलबे में दबे जीवित लोगों की तलाश में दिन-रात जुटे हैं।