पाकिस्तान में मौजूद भारतीय दिग्गजों के पुश्तैनी घरों को संवारने की तैयारी
भारत और पाकिस्तान के बीच भले ही राजनीतिक दूरियां कितनी भी हों, लेकिन दोनों देशों की साझा संस्कृति और इतिहास की जड़ें बहुत गहरी हैं। विभाजन के समय जो लोग और नेता भारत आ गए, उनके पैतृक घर आज भी पाकिस्तान की मिट्टी में सहेजे हुए हैं। शहीद भगत सिंह के पुश्तैनी घर और हवेली के बाद अब पाकिस्तान सरकार द्वारा देश के अन्य महान दिग्गजों जैसे ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार, दिग्गज राजनेता लालकृष्ण आडवाणी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के ऐतिहासिक घरों और पैतृक आशियानों को संरक्षित करने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। जानकारों का मानना है कि इन विरासतों को सहेजने से सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है और दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक जुड़ाव को एक नई दिशा मिल सकती है।
वर्तमान में किस हाल में हैं इन दिग्गजों के घर
पाकिस्तान के पेशावर और कराची जैसे प्रमुख शहरों में मौजूद इन दिग्गज हस्तियों के घरों की हालत वक्त के साथ काफी जर्जर हो चुकी है। दिलीप कुमार का पेशावर स्थित पुश्तैनी मकान, जहां उनका जन्म हुआ था और उन्होंने अपना शुरुआती बचपन बिताया था, देखरेख के अभाव में लंबे समय से जर्जर स्थिति में है। हालांकि अतीत में इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया था, लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह आज भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। इसी तरह, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का पैतृक गांव और लालकृष्ण आडवाणी से जुड़े कराची के स्थान भी आज अपनी पुरानी चमक खो चुके हैं और उनके आशियाने मरम्मत की बड़ी जोत देख रहे हैं। स्थानीय हेरिटेज एक्सपर्ट्स लगातार इन ऐतिहासिक इमारतों को बचाने की मांग करते आए हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां इस साझा इतिहास से रूबरू हो सकें।
सांस्कृतिक कूटनीति और पर्यटन की उम्मीदें
शहीद भगत सिंह के पैतृक गांव बंगा (फ फैसलाबाद) में स्थित घर की देखरेख जिस प्रकार स्थानीय स्तर पर होती रही है, उसी तर्ज पर अन्य ऐतिहासिक इमारतों के पुनरुद्धार की योजना बनाई जा रही है। यदि पाकिस्तान सरकार इन धरोहरों का कायाकल्प कर इन्हें संग्रहालयों या सांस्कृतिक केंद्रों में बदलती है, तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यटकों को आकर्षित करने का एक बेहतरीन माध्यम बन सकता है। सेलिब्रिटी हस्तियों और राजनीतिक दिग्गजों के इन घरों से जुड़ी यादें दोनों देशों के इतिहास प्रेमियों के दिलों में आज भी जिंदा हैं। अब देखना यह होगा कि पाकिस्तान सरकार इन ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने के लिए कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर कब तक जमीन पर ठोस कदम उठाती है।