अचानक दिल्ली पहुंचे पूर्व पाकिस्तानी राजदूत के बड़े खुलासे से मची खलबली

अचानक दिल्ली पहुंचे पूर्व पाकिस्तानी राजदूत के बड़े खुलासे से मची खलबली

दक्षिण एशिया की कूटनीति के गलियारों में उस वक्त भारी सनसनी फैल गई जब एक पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक के अचानक नई दिल्ली पहुंचने की खबर सामने आई। इस दौरे ने भारत और पाकिस्तान के बीच ठप पड़े कूटनीतिक संबंधों के बीच अचानक एक नया भूचाल ला दिया है। कूटनीतिक जानकारों के बीच इस बात की चर्चाएं तेज हो गईं कि आखिर पर्दे के पीछे ऐसा क्या पक रहा है जो अचानक पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं को भारत के रुख पर विचार करने के लिए मजबूर कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स और अंदरखाने से छनकर आ रही जानकारियों के मुताबिक, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और वहां की हुकूमत अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़ने के बाद अपनी बची-खुची साख और इज्जत बचाने का रास्ता तलाश रही है। इस यात्रा ने एक बार फिर से इस सवाल को हवा दे दी है कि क्या दशकों से तल्ख चल रहे भारत और पाकिस्तान के रिश्ते आने वाले दिनों में किसी नए मोड़ की तरफ बढ़ सकते हैं।

अचानक दिल्ली पहुंचने वाले पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक का मिशन और कूटनीतिक हलचल

नई दिल्ली की ठंडी हवाओं के बीच अचानक एक वरिष्ठ पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक की मौजूदगी ने भारतीय विदेश मंत्रालय से लेकर कूटनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। अमूमन इस तरह के गोपनीय और अघोषित दौरे किसी बड़े रणनीतिक या राजनीतिक संदेश का हिस्सा होते हैं। जानकारों का कहना है कि यह दौरा कोई सामान्य यात्रा नहीं है, बल्कि इसके तार पाकिस्तान की मौजूदा अंदरूनी राजनीतिक और आर्थिक बदहाली से जुड़े हुए हैं। पाकिस्तान की हुकूमत यह अच्छी तरह समझ चुकी है कि भारत को लगातार नजरअंदाज करके या केवल घरेलू राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए शत्रुता बनाए रखने की नीति अब खुद उसी के लिए गले की फांस बनती जा रही है। नई दिल्ली में बंद कमरे में हुई बैठकों और अनौपचारिक चर्चाओं के दौरान इस बात पर मुख्य रूप से मंथन किया गया कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद के बंद दरवाजों को आखिरकार किस तरह से खोला जा सकता है ताकि दोनों मुल्कों के बीच जारी तनाव को थोड़ा कम किया जा सके।

असीम मुनीर और पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व की मजबूरी: 'इज्जत बचाने का रास्ता'

पाकिस्तान की सियासत में हमेशा से सेना का दबदबा रहा है और मौजूदा समय में देश की बागडोर थामे फील्ड मार्शल या आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर के सामने इस वक्त अस्तित्व और साख का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। एक तरफ जहां पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था दिवालिया होने की कगार पर है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और पश्चिमी देशों से भी उसे कोई खास राहत नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा, भारत के प्रति आक्रामक रवैया अपनाने की पुरानी रणनीति अब पाकिस्तान के अपने ही देश में भारी पड़ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि जनरल असीम मुनीर और पाकिस्तानी सैन्य तंत्र को यह बात भली-भांति समझ आ चुकी है कि बिना भारत के साथ किसी न किसी स्तर पर सामान्य संबंध बहाल किए, उनकी वैश्विक स्वीकार्यता शून्य हो जाएगी। यही वजह है कि वे अब अपनी घरेलू जनता के बीच अपनी फजीहत छिपाने और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अपनी इज्जत बचाने के लिए एक सुरक्षित रास्ता तलाशने की जुगत में लगे हुए हैं।

भारत का स्पष्ट और अडिग रुख: आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते

पाकिस्तान की तरफ से भले ही पर्दे के पीछे कूटनीतिक संकेत भेजने और बातचीत की जमीन तलाशने की कोशिशें की जा रही हों, लेकिन नई दिल्ली ने अपने तेवर और नीतियां पहले की तरह बिल्कुल स्पष्ट और सख्त रखी हैं। भारत का रुख हमेशा से यह रहा है कि बातचीत और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते। जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से संचालित होने वाले आतंकवाद को पूरी तरह से नेस्तनाबूद नहीं करता और भारत विरोधी गतिविधियों पर रोक नहीं लगाता, तब तक किसी भी तरह की औपचारिक द्विपक्षीय बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं बनती है। मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत ने कूटनीतिक मंचों पर पाकिस्तान को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया है और दुनिया को यह समझा दिया है कि भारत अब किसी भी दबाव या दिखावे के बहकावे में आने वाला नहीं है। यही कारण है कि पाकिस्तानी राजनयिकों और दूतों को भारत के साथ संपर्क साधने के लिए अब अनौपचारिक और गुप्त माध्यमों का सहारा लेना पड़ रहा है।

क्या वाकई सुधरेंगे भारत-पाकिस्तान रिश्ते या यह सिर्फ एक राजनीतिक दिखावा है?

इस उच्च-स्तरीय कूटनीतिक हलचल के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच आने वाले समय में भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में कुछ नरमी आ सकती है? अधिकांश भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की तरफ से आने वाले ऐसे संकेत अक्सर मजबूरी का नतीजा होते हैं, न कि उसकी किसी सच्ची नीयत का। जब तक पाकिस्तानी सेना और वहां की खुफिया एजेंसी अपनी पुरानी भारत-विरोधी मानसिकता और प्रॉक्सी वॉर की नीति को पूरी तरह से त्याग नहीं देती, तब तक किसी भी बड़े बदलाव की उम्मीद करना बेमानी होगा। हालांकि, इस तरह के दौर यह जरूर साबित करते हैं कि भारत की मजबूत विदेश नीति और आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरती उसकी छवि के आगे पाकिस्तान अब दबाव महसूस करने लगा है। आने वाले हफ्तों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या पाकिस्तान की यह छटपटाहट किसी वास्तविक कूटनीतिक बदलाव में बदलती है या यह सिर्फ कूटनीतिक गलियारों में बहने वाली हवा बनकर रह जाती है।