190 'किल मार्क्स' के साथ लौटा सुपरकैरियर, क्या ईरान में मची भीषण तबाही
मध्य पूर्व के उथले और सुलगते समुद्री इलाकों में 321 दिनों तक चले सबसे खतरनाक और गोपनीय सैन्य मिशन को अंजाम देने के बाद अमेरिकी नौसेना का सबसे ताकतवर सुपरकैरियर USS अब्राहम लिंकन (CVN-72) आखिरकार सैन डिएगो स्थित अपने नौसैनिक अड्डे पर लौट आया है। लेकिन इस युद्धपोत की वापसी ने शांति के बजाय अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और रक्षा हलकों में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। कैलिफोर्निया के तट पर जैसे ही यह विशालकाय परमाणु युद्धपोत डॉक हुआ, उस पर मौजूद 'आयरन आइलैंड' सुपरस्ट्रक्चर पर उकेरी गई आकृतियों को देखकर दुनिया भर के सैन्य विशेषज्ञ सन्न रह गए। युद्धपोत के ऊपरी ढांचे पर लगभग 190 'किल मार्क्स' (विजय प्रतीक) दर्ज थे—जिसमें 10 पनडुब्बियां, 34 युद्धपोत और 122 आत्मघाती ड्रोन शामिल थे। अमेरिकी नौसेना की इस रहस्यमयी और अभूतपूर्व तबाही की दास्तान के सामने आने के बावजूद पेंटागन और नौसैनिक कमान ने अब तक इस पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है, जिससे ईरान और अमेरिका के बीच पर्दे के पीछे हुए भीषण टकराव की गूंज और तेज हो गई है।
10 पनडुब्बियां, 34 पोत और 122 ड्रोन: अमेरिकी सुपरकैरियर पर दर्ज '190 किल मार्क्स' का सच
सैन डिएगो बंदरगाह पर पहुंचे यूएसएस अब्राहम लिंकन की तस्वीरों ने रक्षा विश्लेषकों का ध्यान तुरंत अपनी ओर खींच लिया। नौसैनिक परंपरा के अनुसार, जब कोई युद्धपोत या लड़ाकू विमान दुश्मन के हथियारों या ठिकानों को तबाह करता है, तो उसकी याद में उस पर सिलहूट (आकृतियां) उकेरी जाती हैं जिन्हें 'किल मार्क्स' कहा जाता है। अब्राहम लिंकन पर कुल 190 निशान बने हुए थे। इनमें से 10 निशान पनडुब्बियों के, 34 निशान नौसैनिक जहाजों और गश्ती नौकाओं के, तथा 122 से अधिक त्रिकोणीय निशान शाहेद-136 जैसे वन-वे अटैक ड्रोन के थे। इसके अलावा क्रूज मिसाइलों और बैलिस्टिक मिसाइलों को मार गिराने के संकेत भी इस पर अंकित थे। इन आंकड़ों ने साफ कर दिया कि 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के तहत अमेरिकी कैरियर स्ट्राइक ग्रुप 3 ने फारस की खाड़ी, ओमान के सागर और लाल सागर में किस स्तर का भीषण हमला बोला था। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में नौसैनिक बेड़ों और मिसाइलों को नष्ट करना किसी छोटे-मोटे सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं हो सकता, बल्कि यह आधुनिक इतिहास का सबसे आक्रामक समुद्री युद्ध साबित हुआ है।
'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' और ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी: सूखे डॉक में तबाह हुई पनडुब्बियां?
अब्राहम लिंकन पर अंकित इन निशानों की प्रामाणिकता और उनके पीछे की कहानी को लेकर रक्षा विशेषज्ञों में गहन विश्लेषण शुरू हो चुका है। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि समुद्र में इतनी बड़ी संख्या में ईरानी पनडुब्बियों का एक साथ नष्ट होना लगभग असंभव है। ऐसे में डिफेंस फोटोग्राफर्स और विश्लेषकों का अनुमान है कि अमेरिकी नौसेना के F-35C लाइटनिंग II और F/A-18E/F सुपर हॉर्नेट लड़ाकू विमानों ने टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों और लेजर-गाइडेड बमों का इस्तेमाल करके ईरानी नौसेना के बंदरगाहों और सूखी गोदियों (Dry Docks) पर सटीक मिसाइल हमले किए थे। जब ईरानी पनडुब्बियां और मिसाइल नौकाएं मरम्मत या डॉकिंग की स्थिति में थीं, तभी उन्हें निशाना बनाकर पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया गया। इस 40 दिवसीय तीव्र संघर्ष और नौसैनिक नाकेबंदी के जरिए अमेरिका ने ईरानी नौसेना के सामरिक ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसने तेहरान की समुद्री हमला करने की क्षमता को लगभग पंगु बना दिया है।
अमरीकी नौसेना की रहस्यमयी चुप्पी और लंबी तैनाती के पीछे के बड़े सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक हैरान करने वाली बात अमेरिकी रक्षा मंत्रालय और नौसेना कमान का आधिकारिक रुख है। युद्धपोत पर 190 से अधिक किल मार्क्स खुले तौर पर दिखने के बावजूद, जब पेंटागन से इस तबाही के आधिकारिक आंकड़ों पर सवाल पूछे गए, तो नौसेना ने कोई भी विस्तृत ऑडिट रिपोर्ट या बयान देने से इनकार कर दिया और चुप्पी साध ली। वहीं, 321 दिनों तक समुद्र में तैनात रहने की वजह से अब्राहम लिंकन के चालक दल को भारी मानसिक और शारीरिक दबाव का सामना करना पड़ा है। हालांकि इस चुप्पी के पीछे कई कूटनीतिक रणनीतियां भी मानी जा रही हैं। जानकारों का कहना है कि अमेरिका मध्य पूर्व में ईरान के साथ तनाव को और ज्यादा भड़काना नहीं चाहता, इसलिए वह इन विजय निशानों का खुलकर प्रचार करने से बच रहा है। फिर भी, युद्धपोत की इन तस्वीरों ने दुनिया को यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि अमेरिकी वायुसेना और नौसेना ने ईरान के भीतर और उसके आसपास कितनी भयावह तबाही मचाई है।
मध्य पूर्व का बदलता भू-राजनीतिक समीकरण और आने वाले दिनों की आशंका
यूएसएस अब्राहम लिंकन की वापसी के बाद भी मध्य पूर्व के समुद्र में तनाव कम नहीं हुआ है। अमेरिकी नौसेना ने संतुलन बनाए रखने के लिए यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन और यूएसएस जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश जैसे अन्य दो एयरक्राफ्ट कैरियर्स को क्षेत्र में तैनात कर रखा है। ईरान की ओर से भी लगातार नए ड्रोन और मिसाइल परीक्षणों के जरिए अमेरिकी उपस्थिति को चुनौती देने की कोशिश की जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि भविष्य का युद्ध अब केवल पारंपरिक जहाजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एआई-संचालित ड्रोन, हाइपरसोनिक मिसाइलों और गुप्त पनडुब्बियों के बीच एक अत्यंत घातक मोर्चे पर लड़ा जा रहा है। अब देखना यह होगा कि क्या अमेरिकी नौसेना इस भीषण अभियान की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करती है या फिर यह '321 दिनों का सीक्रेट मिशन' इतिहास के पन्नों में एक रहस्यमयी सैन्य अध्याय बनकर रह जाएगा।