आतंकवाद सिर्फ एक बहाना: मौलाना फजलुर रहमान का जनरल मुनीर पर बड़ा हमला

आतंकवाद सिर्फ एक बहाना: मौलाना फजलुर रहमान का जनरल मुनीर पर बड़ा हमला

पाकिस्तान की आंतरिक और भू-राजनीतिक हलकों में इन दिनों भारी उथल-पुथल मची हुई है। देश के प्रमुख राजनेता और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (JUI-F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान (जिन्हें राजनीतिक गलियारों में 'मौलाना डीजल' के नाम से भी जाना जाता है) ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार के खिलाफ बेहद तीखे तेवर अपनाए हैं। हाल ही में खैबर पख्तूनख्वा (Khyber Pakhtunkhwa) प्रांत में राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल और गवर्नर शासन लागू किए जाने के बाद से पाकिस्तान का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। मौलाना फजलुर रहमान ने इस पूरी प्रशासनिक कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों का गला घोंटने वाला कदम करार देते हुए इसे एक सोची-समझी विदेशी साजिश का हिस्सा बताया है।

आतंकवाद का मुखौटा और खनिज संपदा पर कब्जे का गुप्त अमेरिकी एजेंडा

मौलाना फजलुर रहमान ने एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए दावा किया कि खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद का हौव्वा खड़ा करना और सुरक्षा का बहाना बनाना असल में एक बहुत बड़े आर्थिक और भू-राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा है। उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि प्रांत में आपातकालीन शासन स्थापित करने के पीछे गुप्त रूप से अमेरिका का आर्थिक एजेंडा काम कर रहा है। मौलाना के अनुसार, अमेरिका और पश्चिमी देशों की नजर इस क्षेत्र में मौजूद अकूत खनिज संसाधनों (Mineral Wealth) और दुर्लभ भू-गर्भ संपदा पर टिकी हुई है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि आज अमेरिकी राजनयिक और कांसुल जनरल जिस तरह से यहां के खनिजों और निवेश को लेकर बयान दे रहे हैं, उससे साफ हो जाता है कि पर्दे के पीछे क्या पक रहा है। पाकिस्तान के हुक्मरानों ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए देश की संप्रभुता और प्राकृतिक संसाधनों को विदेशी ताकतों के हाथों गिरवी रख दिया है।

सेना प्रमुख जनरल मुनीर को खुली चेतावनी, 1971 के इतिहास की दिलाई याद

अपने आक्रामक भाषण के दौरान मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी सेना के शीर्ष नेतृत्व और विशेष रूप से सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को आड़े हाथों लिया। उन्होंने सेना की बढ़ती राजनीतिक और संस्थागत दखलअंदाजी पर कड़ी आपत्ति जताते हुए चेताया कि यदि संस्थाएं अपने संवैधानिक दायरे से बाहर निकलकर देश की पूरी व्यवस्था पर कब्जा करेंगी, तो वे खुद ही इस भारी 'सत्ता के बोझ' के तले दबकर बिखर जाएंगी। इतना ही नहीं, मौलाना ने पाकिस्तान के इतिहास के सबसे काले अध्याय यानी 1971 के युद्ध और ढाका में हुए पाकिस्तानी सेना के ऐतिहासिक आत्मसमर्पण की याद दिलाते हुए सेना प्रमुख को अपनी नीतियों में सुधार करने की सख्त नसीहत दी है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि देश को बार-बार तानाशाही और जबरन फैसलों के जरिए तोड़ने की कोशिशों के परिणाम बहुत घातक साबित होंगे।

विदेशी निवेशकों का पलायन और देश में गहराता आर्थिक संकट

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही बदहाली के दौर से गुजर रही है, और उस पर ऐसे सियासी टकराव स्थिति को और बदतर बना रहे हैं। मौलाना फजलुर रहमान ने देश से निवेशकों के लगातार पलायन और विदेशी पूंजी के भागने के लिए सीधे तौर पर मौजूदा सैन्य-समर्थित नागरिक सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि आज पड़ोसी देशों में शांति, सुरक्षा और पारदर्शी नीतियों के कारण निवेश आ रहा है, जबकि इसके विपरीत पाकिस्तान में कानून के राज के अभाव और मनमाने फैसलों के कारण बड़े निवेशक देश छोड़कर भाग रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब तक देश में चुनी हुई जनता के प्रतिनिधियों को वास्तविक अधिकार नहीं दिए जाएंगे और नौकरशाही व सेना अपनी सीमाओं में नहीं रहेंगी, तब तक देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आ सकती।

लोकतांत्रिक ताकतों का साझा प्रतिरोध और भविष्य की राजनीतिक दिशा

खैबर पख्तूनख्वा की प्रांतीय सरकार को बर्खास्त कर वहां आपातकाल थोपे जाने के फैसले ने पाकिस्तान के विपक्षी दलों को एकजुट होने का एक नया मंच दे दिया है। जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के खिलाफ की गई इस कार्रवाई को मौलाना फजलुर रहमान ने पूरे देश के संघीय ढांचे और प्रांतीय स्वायत्तता पर सीधा हमला बताया है। उन्होंने घोषणा की है कि उनकी पार्टी इस तानाशाही रवैये के खिलाफ चुप नहीं बैठेगी और संसद से लेकर सड़कों तक कड़ा राजनीतिक संघर्ष किया जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि मौलाना के इन बयानों ने पाकिस्तान की सियासत में एक भूचाल ला दिया है और आने वाले दिनों में सरकार और सेना की मुश्किलें काफी बढ़ने वाली हैं।