'इतुरुप द्वीप' का वो जिन्न... जिसके लिए आमने-सामने आए भारत के 2 पक्के दोस्त; जानें क्या है रूस-जापान का विवाद
दुनिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर इन दिनों एक ऐसा विवाद फिर से सुलग उठा है जिसने भारत की कूटनीति के सामने एक पेचीदा स्थिति पैदा कर दी है। यह विवाद है 'इतुरुप द्वीप' (Iturup Island) को लेकर, जो कुरील द्वीप समूह (Kuril Islands) का सबसे बड़ा और सामरिक रूप से बेहद अहम हिस्सा है। एक तरफ रूस है जो इस पर अपना पूर्ण अधिकार जताता है, तो दूसरी तरफ जापान है जो इसे अपना 'उत्तरी क्षेत्र' (Northern Territories) कहकर वापस पाने की मांग कर रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि रूस और जापान दोनों ही भारत के अत्यंत करीबी और रणनीतिक साझेदार हैं। ऐसे में, इस ठंडे पड़े क्षेत्रीय विवाद के फिर से गरमाने से वैश्विक कूटनीति में हलचल मच गई है और यह सवाल उठने लगा है कि भारत अपने इन दोनों पक्के दोस्तों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखेगा।
क्या है कुरील द्वीप और इतुरुप का पूरा इतिहास?
यह पूरा विवाद द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से जुड़ा हुआ है। साल 1945 में युद्ध के अंतिम दिनों में सोवियत संघ (अब रूस) की सेना ने कुरील द्वीप समूह पर कब्जा कर लिया था। इसमें इटुरुप, शिकोतन, कुनाशीर और हाबोमाई द्वीप शामिल हैं। जापान का तर्क है कि ये चारों द्वीप उसके संप्रभु भूभाग का हिस्सा हैं और 1851 तथा 1875 की संधियों के तहत रूस ने अवैध रूप से इन पर कब्जा जमाया हुआ है।
दूसरी ओर, रूस का साफ कहना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत यह क्षेत्र कानूनी रूप से सोवियत संघ को मिला था, जिसका उत्तराधिकारी आज रूस है। यही वजह है कि पिछले 8 दशकों से रूस और जापान के बीच आज तक कोई औपचारिक 'शांति संधि' (Peace Treaty) साइन नहीं हो पाई है, क्योंकि दोनों पक्ष इन द्वीपों पर अपनी दावेदारी छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
जापान का आक्रामक रुख और रूस की दो टूक चेतावनी
हाल के महीनों में जापान के प्रधानमंत्री और वहां की संसद ने इन उत्तरी क्षेत्रों पर अपनी संप्रभुता के दावे को और अधिक तेज कर दिया है। जापान का आरोप है कि रूस लगातार इन द्वीपों पर अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा है और आधुनिक मिसाइल प्रणालियों तथा एयरबेस का निर्माण कर रहा है।
इसके जवाब में मास्को (रूस) ने भी कड़े तेवर अपनाते हुए साफ कह दिया है कि कुरील द्वीप समूह पर रूस की संप्रभुता पर सवाल उठाने का कोई मतलब नहीं है और यह क्षेत्र रूस की मुख्य भूमि का अभिन्न अंग है। रूस ने इन द्वीपों पर जापान के साथ किसी भी तरह के क्षेत्रीय समझौते की संभावना से इनकार करते हुए पश्चिमी देशों के इशारों पर चलने का टोक्यो पर आरोप लगाया है।
भारत की दुविधा और संतुलित कूटनीति
भारत के लिए यह स्थिति किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। रूस के साथ भारत के संबंध ऐतिहासिक, रक्षात्मक और ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर बेहद मजबूत रहे हैं, जबकि जापान के साथ भारत की दोस्ती इंडस-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा, आधुनिक तकनीक और आर्थिक निवेश के लिहाज से अतुलनीय है।
भारत की पारंपरिक विदेश नीति हमेशा से द्विपक्षीय और क्षेत्रीय विवादों को शांतिपूर्ण बातचीत के जरिए सुलझाने के पक्ष में रही है। भारत सीधे तौर पर इनमें से किसी भी देश के दावे का समर्थन या विरोध करने से बचता आया है, क्योंकि दोनों ही देश भारत के वैश्विक रणनीतिक समीकरणों में अहम भूमिका निभाते हैं। बहरहाल, इतुरुप द्वीप का यह भू-राजनीतिक जिन्न आने वाले दिनों में ग्लोबल डिप्लोमेसी की बड़ी परीक्षा लेने वाला है।