संयुक्त राष्ट्र के दोमुहें रवैये और दोहरे मापदंडों का काला सच!
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पन्नों पर आज एक ऐसा गंभीर और विचारणीय प्रश्न खड़ा हो गया है, जो दुनिया भर के स्वतंत्र विचारकों और विश्लेषकों को झकझोर रहा है। प्रश्न यह है कि क्या संयुक्त राष्ट्र (United Nations) जैसी वैश्विक संस्थाएं अब निष्पक्ष और तटस्थ रहकर काम कर रही हैं, या फिर वे पश्चिमी ताकतों के भू-राजनीतिक हितों का मोहरा बनकर रह गई हैं? हाल के वर्षों में दुनिया ने यह स्पष्ट रूप से देखा है कि जब यूरोप और पश्चिमी देशों की सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन होते हैं, सरकारी संपत्तियों को तहस-नहस किया जाता है, पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमले होते हैं और अराजकता का माहौल बनता है, तब संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय और इसके शीर्ष अधिकारी गहरी और रहस्यमयी चुप्पी साध लेते हैं। इसके विपरीत, जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया या आंतरिक नीतिगत निर्णय लिया जाता है, तो यही संस्था बिना तथ्यों की गहराई में जाए तुरंत फौरी और पक्षपातपूर्ण टिप्पणियां जारी करने लगती है। यह स्पष्ट रूप से संयुक्त राष्ट्र के दोमुहें और दोहरे रवैये (Double Standards) को उजागर करता है।
यूरोप के शहरों में सुलगती हिंसा और मानवाधिकार के पैरोकारों की चुप्पी
यदि हम हालिया यूरोपीय परिदृश्य पर नजर डालें, तो फ्रांस के पेरिस, ब्रिटेन के विभिन्न शहरों, जर्मनी और इटली जैसे देशों में अप्रवासी संकट, आर्थिक नीतियों और सुरक्षा कानूनों के खिलाफ भड़के हिंसक प्रदर्शनों ने विकराल रूप लिया है। इन देशों में प्रदर्शनकारियों द्वारा गाड़ियों को आग के हवाले किया गया, दुकानों में बड़े पैमाने पर लूटपाट की गई और सार्वजनिक सुरक्षा को गंभीर खतरे में डाला गया। इन वारदातों से निपटने के लिए यूरोपीय सरकारों और पुलिस बलों द्वारा जो कड़े प्रशासनिक और कानूनी कदम उठाए गए, उनमें कई मानवाधिकारों के हनन के आरोप भी लगे। इसके बावजूद, जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्च कमिश्नर (UNHCHR) के कार्यालय से इन यूरोपीय देशों की हिंसक घटनाओं पर कोई प्रभावी, तीखी या बाध्यकारी निंदा देखने को नहीं मिली। यह चुनिंदा चुप्पी इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि मानवाधिकार के नाम पर वैश्विक मंचों का उपयोग केवल राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।
भारत के आंतरिक मामलों में अनावश्यक दखल और पूर्वाग्रह से ग्रसित बयानबाजी
दूसरी ओर, भारत के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र का रवैया हमेशा से अत्यधिक संदिग्ध और अनुचित रूप से दखलंदाजी भरा रहा है। भारत एक परिपक्व, जीवंत और मजबूत लोकतंत्र है, जहां स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष चुनाव आयोग और मजबूत प्रेस की स्वतंत्रता देश के संविधान की रक्षा करती है। इसके बावजूद, जब भी भारत सरकार राष्ट्रहित में कोई विधायी कदम उठाती है—चाहे वह नागरिकता संशोधन कानून हो, अनुच्छेद 370 का निष्प्रभावीकरण हो या देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े अन्य नीतिगत फैसले हों—संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी बिना समय गंवाए फौरन प्रेस विज्ञप्तियां जारी कर देते हैं। इन बयानों में अक्सर ज़मीनी सच्चिदानंद और स्थानीय वास्तविकताओं की अनदेखी की जाती है, और पश्चिमी मीडिया द्वारा प्रायोजित दुष्प्रचार को आधार बना लिया जाता है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत ने कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दो टूक शब्दों में यह स्पष्ट किया है कि संप्रभु राष्ट्रों के आंतरिक मामलों में बाहरी और असंतुलित हस्तक्षेप किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की सख्त जरूरत और ग्लोबल साउथ की आवाज
आज आवश्यकता इस बात की है कि संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं की संरचना और कार्यप्रणाली की गंभीर समीक्षा की जाए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाई गई ये व्यवस्थाएं आज की बहुध्रुवीय (Multiplex) दुनिया की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने में पूरी तरह विफल साबित हो रही हैं। ग्लोबल साउथ (Global South) के देश, विशेष रूप से भारत, लगातार यह मांग कर रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और मानवाधिकार निकायों में पारदर्शिता लाई जाए और विकसित देशों के प्रभाव से इन्हें मुक्त किया जाए। जब तक वैश्विक संस्थाएं दोहरे मापदंडों की राजनीति से बाहर नहीं निकलतीं, तब तक अंतरराष्ट्रीय शांति और मानवाधिकारों की रक्षा के उनके दावे खोखले और अविश्वास से भरे ही माने जाएंगे। दुनिया की जनता अब इन दोमुंही नीतियों को भली-भांति समझ चुकी है, और समय आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों को फिर से पुनर्स्थापित किया जाए।