डोकलाम-गलवान में भारत से भिड़ने की जिद पड़ी भारी, ड्रैगन की बदलती चाल और टूटी हेकड़ी की पूरी कहानी
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में इन दिनों एक बहुत बड़ी और सनसनीखेज खबर चर्चा का विषय बनी हुई है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक समय था जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी PLA के सैन्य जनरलों की धमकियों और आक्रामकता से सीमाई इलाके दहल जाते थे, और वही कमांडर भारत को आंखें दिखाने की हिमाकत करते थे। लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि डोकलाम और गलवान घाटी में भारत के खिलाफ आक्रामक तेवर दिखाने वाले एक प्रमुख चीनी जनरल की हेकड़ी अब पूरी तरह से निकल चुकी है। ड्रैगन की विस्तारवादी नीतियों को लीड करने वाले इस शीर्ष सैन्य अधिकारी को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अचानक बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इस बड़े राजनीतिक और सैन्य घटनाक्रम के बाद वैश्विक स्तर पर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या चीन की आंतरिक राजनीति में कुछ बहुत बड़ा उलटफेर चल रहा है या फिर भारत के साथ सीमा पर मुंह की खाने के बाद ड्रैगन अब अपनी पुरानी रणनीति में बदलाव करने के लिए मजबूर हो गया है।
डोकलाम और गलवान में भारत के लोहे से टकराकर कैसे चूर-चूर हुई चीनी सेना की झूठी शान?
कुछ साल पहले डोकलाम पठार और उसके बाद साल 2020 की गर्मियों में गलवान घाटी में चीनी सेना ने जो हिमाकत दिखाई थी, उसका मुख्य उद्देश्य भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना और अपनी सीमा का विस्तार करना था। उस दौरान चीन के इन आक्रामक जनरलों को लगता था कि वे अपनी सैन्य ताकत के दम पर भारत को आसानी से झुका लेंगे और अपनी शर्तों पर बॉर्डर के हालात तय करेंगे। लेकिन भारतीय सेना के अदम्य साहस, जांबाज सैनिकों के पराक्रम और रणनीतिक सूझबूझ ने चीन की इस खुमार भरी अकड़ को धूल में मिला दिया। गलवान घाटी में भारतीय जवानों ने जिस तरह से चीनी सैनिकों को खदेड़ा और डोकलाम में जिस दृढ़ता के साथ भारतीय सेना चट्टान की तरह अड़ी रही, उसने ड्रैगन के उन कथित अजेय जनरलों के सारे अहंकार को चकनाचूर कर दिया। दुनिया ने देख लिया कि भारत अब 1962 वाला देश नहीं है, बल्कि वह अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए हर आंख में आंख डालकर जवाब देने का माद्दा रखता है।
शी जिनपिंग के दरबार में गिरी गाज: किन वजहों से चीन के शीर्ष जनरलों पर हो रही है ताबड़तोड़ कार्रवाई?
जैसे-जैसे भारत के साथ सीमा विवाद में चीन को कूटनीतिक और सैन्य मोर्चे पर नाकामी का सामना करना पड़ा, वैसे-वैसे बीजिंग के भीतर आंतरिक कलह और दबाव बढ़ने लगा। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हाल के दिनों में अपनी सेना के भीतर बड़े पैमाने पर सफाई अभियान शुरू किया है और कई वरिष्ठ जनरलों तथा रक्षा अधिकारियों को उनके पदों से बर्खास्त कर दिया है। जानकारों का मानना है कि डोकलाम और गलवान जैसी जगहों पर भारत के खिलाफ गलत आकलन करने और चीनी सेना की कमजोरियों को दुनिया के सामने उजागर करने का ठीकरा इन कमांडरों के सिर पर फोड़ा गया है। चीनी नेतृत्व यह अच्छी तरह समझ चुका है कि भारत के साथ बेवजह का सैन्य टकराव मोल लेना और बार-बार मुंह की खाना देश की कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रपति जिनपिंग की छवि के लिए घातक साबित हो रहा है। यही वजह है कि जिन जनरलों ने कभी अपनी ताकत का झूठा गुमान पाला था, आज वे शी जिनपिंग के राजनीतिक और सैन्य कोप का शिकार बनकर नेपथ्य में धकेले जा रहे हैं।
बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियां और ड्रैगन की मजबूरी: क्या चीन को समझ आ गई है भारत की असली ताकत?
शी जिनपिंग द्वारा उठाए गए इन कड़े कदमों और शीर्ष जनरलों को बाहर का रास्ता दिखाए जाने से साफ संदेश मिलता है कि चीन अब अपनी विदेश और सुरक्षा नीति में एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था दबाव में है, वहीं दूसरी तरफ भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक मोर्चे पर उलझना चीन के लिए अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है। भारतीय कूटनीति की परिपक्वता और मजबूत सैन्य तैयारी ने चीन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि एशिया में यदि स्थिरता रखनी है, तो भारत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। डोकलाम और गलवान के मोर्चों पर अपनी किरकिरी कराने वाले इन जनरलों की विदाई इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि आक्रामकता हमेशा जीत की गारंटी नहीं होती। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि चीन का नया नेतृत्व भारत के साथ संबंधों को सुधारने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाता है या फिर उसकी पुरानी चालें नए चेहरों के साथ फिर से सामने आती हैं।