भारत के इस प्लान से हिल सकता है अमेरिका का डॉलर सिस्टम! BRICS में बड़ा दांव

भारत के इस प्लान से हिल सकता है अमेरिका का डॉलर सिस्टम! BRICS में बड़ा दांव

देश की राजधानी नई दिल्ली शनिवार से शुरू हो रहे बहुप्रतीक्षित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए पूरी तरह सज-धज कर तैयार है। 11 देशों के शीर्ष नेताओं के इस महामंथन से ठीक पहले अमेरिकी डॉलर के वैश्विक वर्चस्व को लेकर एक बार फिर रणनीतिक बहस छिड़ गई है।

भारत, चीन और रूस के नेतृत्व में ब्रिक्स ब्लॉक लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर का व्यावहारिक विकल्प तलाशने पर मंथन कर रहा है। इसी कड़ी में भारत ने सीमा पार भुगतान को सरल और सुरक्षित बनाने के लिए एक व्यापक व दूरदर्शी प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया है, जिसने वैश्विक वित्तीय हलकों और पश्चिमी ताकतों के कान खड़े कर दिए हैं।

सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को जोड़ने की वकालत

ब्रिक्स समूह बीते कई महीनों से एक एकीकृत तकनीकी प्लेटफॉर्म तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिसका मकसद सदस्य देशों की सरकारी डिजिटल मुद्राओं को आपस में इंटरलिंक करना है।

'ब्लूमबर्ग' की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत इस सम्मेलन में ब्रिक्स साझेदारों के बीच उनके संबंधित केंद्रीय बैंकों द्वारा जारी डिजिटल मुद्राओं के इस्तेमाल को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देने की जोरदार वकालत करेगा। यह पहल अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनावश्यक बिचौलियों को बाहर करने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है।

साझा करेंसी नहीं, द्विपक्षीय कनेक्टिविटी पर भारत का फोकस

रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में माहिर भारत किसी ऐसे एकाधिकारवादी नेटवर्क की पैरवी नहीं कर रहा है जिसे सीधे तौर पर अमेरिकी डॉलर या वैश्विक 'स्विफ्ट' (SWIFT) प्रणाली को खत्म करने वाले मोर्चे के रूप में देखा जाए।

भारत की सोची-समझी कूटनीति यह सुनिश्चित करना चाहती है कि ब्रिक्स को पश्चिमी देशों या अमेरिका विरोधी खेमे के रूप में न आंका जाए। इसी भू-राजनीतिक संतुलन के चलते भारत किसी एकल 'ब्रिक्स मुद्रा' के निर्माण के बजाय दोनों देशों के आपसी तकनीकी तंत्र को परस्पर जोड़ने यानी द्विपक्षीय डिजिटल करेंसी कनेक्टिविटी पर जोर दे रहा है।

स्थानीय करेंसी से घटेगी लागत, बिचौलियों की छुट्टी

भारतीय प्रस्ताव का मुख्य आधार यह है कि ब्रिक्स देश अपनी-अपनी राष्ट्रीय डिजिटल करेंसी को तकनीकी स्तर पर एक-दूसरे से जोड़ें। इस सीधे संपर्क से विदेशी मध्यस्थ बैंकों (कॉरेस्पॉन्डेंट बैंक्स) पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेन-देन की लागत में भारी गिरावट दर्ज की जाएगी। सरल शब्दों में समझा जाए तो व्यापारिक सौदों के निपटान के लिए किसी तीसरे देश की मुद्रा यानी डॉलर की अनिवार्यता खत्म हो जाएगी और देश अपनी घरेलू संपदा के दम पर आयात-निर्यात कर सकेंगे।

ई-रुपया, डिजिटल युआन और रूबल का साझा तकनीकी प्लेटफॉर्म

इस प्रस्तावित कार्यप्रणाली के तहत भारतीय रिजर्व बैंक के ई-रुपया, चीन के डिजिटल युआन और रूस के डिजिटल रूबल जैसी सेंट्रल बैंक डिजिटल मुद्राओं (CBDC) को एक साझा इंटरफेस पर लाया जाएगा। इसमें किसी भी देश की मौद्रिक संप्रभुता प्रभावित नहीं होगी और प्रत्येक देश का अपनी करेंसी पर पूर्ण वित्तीय नियंत्रण बरकरार रहेगा। इससे द्विपक्षीय व्यापार का भुगतान बिना किसी डॉलर रूपांतरण और बिना स्विफ्ट नेटवर्क के सुरक्षित तरीके से संपन्न हो सकेगा। भारत अपने सफल यूपीआई (UPI) मॉडल के अनुभव के आधार पर यह साबित कर चुका है कि प्रणालियों को जोड़ना एक नई साझा मुद्रा बनाने से कहीं अधिक सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प है।

नेट सेटलमेंट साइकिल से बचेगा अरबों का विदेशी भंडार

यह नया ब्रिक्स डिजिटल पेमेंट मॉडल 'नेट सेटलमेंट साइकिल' के सिद्धांत पर काम करेगा। इसके तहत हर एक व्यापारिक लेन-देन का भुगतान अलग-अलग करने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि एक निश्चित समय-सीमा के दौरान कुल आयात और निर्यात का मिलान किया जाएगा और अंत में केवल अंतर की राशि का ही डिजिटल भुगतान होगा। यदि भारत किसी अवधि में चीन से 500 अरब रुपये का आयात करता है और उसी दौरान चीन भारत से 450 अरब रुपये का सामान खरीदता है, तो अंत में केवल 50 अरब रुपये के अंतर का ही निपटान करना होगा, जिससे फॉरेक्स रिस्क और ट्रांजेक्शन फीस दोनों में भारी बचत होगी।