ICC पूर्व जज को नोबेल पीस प्राइज मिलने से भड़के ट्रंप, लगा दिए कड़े प्रतिबंध

ICC पूर्व जज को नोबेल पीस प्राइज मिलने से भड़के ट्रंप, लगा दिए कड़े प्रतिबंध

वैश्विक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून के गलियारों में उस वक्त बहुत बड़ा सियासी भूचाल आ गया जब अमेरिका ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) के खिलाफ बेहद कड़े और आक्रामक प्रतिबंधों का ऐलान कर दिया। यह बड़ा फैसला ठीक उस समय सामने आया जब अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत की पूर्व जज और दक्षिण अफ्रीकी मूल की मानवाधिकार कार्यकर्ता नवी पिल्ले (Navi Pillay) को वर्ष 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई। नोबेल कमेटी के इस फैसले से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का गुस्सा भड़क उठा और उन्होंने आईसीसी को आड़े हाथों लेते हुए कोर्ट के खिलाफ वित्तीय और प्रशासनिक पाबंदियों की घोषणा कर दी। वाशिंगटन के इस कदम ने न केवल अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय प्रणाली पर सीधा प्रहार किया है, बल्कि अमेरिका और यूरोपीय सहयोगियों के बीच कूटनीतिक तनाव को भी एक नए मोड़ पर खड़ा कर दिया है।

नोबेल कमेटी के फैसले पर ट्रंप का तीखा हमला और आईसीसी के खिलाफ पाबंदियां

अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत की पूर्व जज नवी पिल्ले को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की खबर सार्वजनिक होते ही व्हाइट हाउस और डोनाल्ड ट्रंप के खेमे से बेहद तीखी प्रतिक्रिया आई। ट्रंप प्रशासन ने आईसीसी को पूरी तरह से निशाने पर लेते हुए कहा कि यह संस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निष्पक्ष न्याय देने के बजाय अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के खिलाफ राजनीतिक एजेंडा चला रही है। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रंप कभी भी अमेरिकी सैन्यकर्मियों, बॉर्डर अधिकारियों या निर्वाचित नेताओं के खिलाफ आईसीसी की मनमानी या मुकदमों की अनुमति नहीं देंगे। इसी मंशा के तहत अमेरिका ने आईसीसी के साथ वित्तीय लेनदेन पर पूरी तरह रोक लगाने और संस्था को मिलने वाले संसाधनों को ठप करने वाले कड़े फैसले पर मुहर लगा दी। अमेरिकी प्रशासन के इस अभूतपूर्व रुख ने पूरी दुनिया के मानवाधिकार संगठनों और कूटनीतिज्ञों को हैरान कर दिया है।

आखिर क्यों भड़का अमेरिका? इज़राइल, अफगानिस्तान और अमेरिकी संप्रभुता का मुद्दा

अमेरिका और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट के बीच यह कड़वाहट अचानक पैदा नहीं हुई है, बल्कि इसकी जड़ें पुरानी हैं। डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रशासनिक अधिकारी लंबे समय से आईसीसी के उन फैसलों से नाराज रहे हैं जिनमें अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान में भूमिका की जांच और इज़राइली नेताओं के खिलाफ जारी किए गए वारंट शामिल हैं। अमेरिकी विदेश विभाग का तर्क है कि अमेरिका ने 'रोम स्टेच्यूट' (Rome Statute) पर कभी हस्ताक्षर करने के बावजूद इसकी पुष्टि नहीं की थी, इसलिए आईसीसी के पास गैर-सदस्य देशों या उनके नागरिकों पर क्षेत्राधिकार चलाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। वाशिंगटन का आरोप है कि आईसीसी एक "रॉग कोर्ट" (Rogue Court) की तरह व्यवहार कर रही है जो निष्पक्ष कानून के बजाय राजनीतिक रूप से प्रेरित जांचों को बढ़ावा देती है। वहीं दूसरी तरफ नोबेल पुरस्कार विजेता नवी पिल्ले द्वारा इज़राइल और अमेरिकी नीतियों की तीखी आलोचना किए जाने की वजह से ट्रंप प्रशासन नोबेल कमेटी के इस चुनाव को भी राजनीतिक चाल मान रहा है।

अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में खलबली और यूरोपीय संघ का कड़ा रुख

अमेरिकी पाबंदियों के तुरंत बाद विश्व मंच पर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। यूरोपीय संघ (EU) और आईसीसी समर्थित देशों ने अमेरिका के इस फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा क्लास (Kaja Kallas) ने बयान जारी करते हुए कहा कि आईसीसी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय प्रणाली का मुख्य स्तंभ है और इसकी सुरक्षा करना यूरोपीय देशों की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहेगी। नीदरलैंड्स के हेग स्थित आईसीसी के प्रतिनिधियों ने साफ किया है कि अमेरिकी प्रतिबंधों और दबाव के बावजूद उनकी अदालत वैश्विक अपराधों और मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ अपनी जांच जारी रखेगी। नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी ने भी चेतावनी दी है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी संस्थाओं पर राजनीतिक हमले दुनिया में शांति और कानून के शासन के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं।

विश्व शांति, वैश्विक न्याय और आगे का भविष्य

इस पूरे टकराव ने यह साबित कर दिया है कि मौजूदा दौर में वैश्विक न्याय प्रणाली और महाशक्तियों की राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच का संतुलन कितना नाजुक हो चुका है। एक तरफ जहां नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नवी पिल्ले ने अंतरराष्ट्रीय कानून की निष्पक्षता और मानवाधिकारों की रक्षा पर जोर दिया है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका का यह कड़ा फैसला यह संदेश देता है कि वह अपनी सुरक्षा नीतियों में किसी भी अंतरराष्ट्रीय अदालत का दखल बर्दाश्त नहीं करेगा। अमेरिका द्वारा घोषित छह महीने की छूट अवधि (Grace Period) के दौरान अब यूरोपीय संघ और अमेरिका के बीच इस मुद्दे पर बातचीत की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, इस घटनाक्रम ने वैश्विक राजनीति में एक नया विवाद छेड़ दिया है, जिसका असर आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक अदालतों की साख पर पड़ना तय है।