US मिडटर्म चुनाव में ट्रंप की हार, ट्रेड डील और कश्मीर नीति पर असर

US मिडटर्म चुनाव में ट्रंप की हार, ट्रेड डील और कश्मीर नीति पर असर

अमेरिकी राजनीति में हाल ही में संपन्न हुए मिडटर्म (मध्यावधि) चुनावों के नतीजों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी को एक बड़ा राजनीतिक झटका दिया है। अमेरिकी संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी के मजबूत उभार और सत्ता समीकरण बदलने के बाद अब यह सवाल सबसे बड़ा बन गया है कि इसका भारत पर कूटनीतिक, आर्थिक और सामरिक रूप से क्या प्रभाव पड़ेगा। विशेष रूप से भारत-अमेरिका व्यापार समझौता (Trade Deal), एच-1बी वीजा नीतियां, ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय कूटनीति जैसे संवेदनशील मुद्दों पर वॉशिंगटन के बदले रुख के दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों और भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही अमेरिका का घरेलू राजनीतिक परिदृश्य बदल गया हो, लेकिन भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी पर इसका बहुत ज्यादा नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा, फिर भी कुछ मोर्चों पर कड़ा संघर्ष देखने को मिल सकता है।

#1. US मिडटर्म चुनाव के नतीजे और भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर संभावित असर

भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से लंबित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) के पहले चरण की रूपरेखा हाल ही में तैयार की गई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि मिडटर्म चुनाव में ट्रंप को झटका लगने के बाद उनके घरेलू विधायी एजेंडे भले ही कमजोर पड़ जाएं, लेकिन व्यापार नीति और शुल्कों (Tariffs) के मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति के पास पर्याप्त कार्यकारी अधिकार (Executive Authority) सुरक्षित रहते हैं। इसलिए भारत के साथ चल रही ट्रेड डील प्रक्रिया पर तुरंत कोई बड़ा ब्रेक लगने की संभावना नहीं है। हालांकि, संसद में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने के कारण भारतीय उत्पादों के आयात, श्रम मानकों और पर्यावरण संबंधी शर्तों पर अमेरिकी कांग्रेस की तरफ से कड़ी छानबीन और सवाल-जवाब जरूर बढ़ाए जा सकते हैं।

#1. एच-1बी वीजा, इमिग्रेशन और भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए बढ़ती चुनौतियां

अमेरिका में काम कर रहे भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए एच-1बी वीजा (H-1B Visa) और ग्रीन कार्ड का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है। अमेरिकी आव्रजन नीतियों और डेफरेंस पॉलिसी में बदलाव को लेकर पहले से ही अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। मिडटर्म चुनाव के बाद बदली हुई राजनीतिक स्थिति में भारतीय कर्मचारियों और छात्रों के लिए कुशल श्रम गतिशीलता (Skilled-Worker Mobility) के नियमों पर संसद की पैनी नजर रहेगी। डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ सांसद हमेशा से आव्रजन नियमों को और अधिक पारदर्शी बनाने की वकालत करते रहे हैं, जिससे उम्मीद की जा रही है कि ग्रीन कार्ड के बैकलॉग में फंसे भारतीयों के मुद्दों पर नए सिरे से बहस छिड़ सकती है।

#1. कश्मीर, क्षेत्रीय भू-राजनीति और दक्षिण एशिया पर वाशिंगटन का रुख

कश्मीर और भारत-पाकिस्तान के कूटनीतिक मामलों पर अमेरिकी विदेश नीति पारंपरिक रूप से द्विपक्षीय बातचीत के समर्थन में रही है। विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स के आने से मानवाधिकारों और आंतरिक नीतियों से जुड़े मुद्दों पर मुखरता थोड़ी बढ़ सकती है, लेकिन भारत की सामरिक महत्ता को देखते हुए द्विपक्षीय रक्षा सहयोग, क्वाड (QUAD) की मजबूती और चीन के खिलाफ क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के मामले में दोनों दलों की नीति एक जैसी ही रही है। इसलिए भारत की संप्रभुता और कश्मीर जैसे आंतरिक मामलों पर अमेरिकी नीति में किसी बड़े या अचानक बदलाव की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती है।

#1. ग्लोबल ऑयल मार्केट, ईरान तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

हालिया मिडटर्म चुनावों के दौरान ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आए उतार-चढ़ाव ने अमेरिकी घरेलू राजनीति को भी प्रभावित किया है। अमेरिकी जनता में महंगाई और ईंधन के दाम एक बड़ा मुद्दा बने थे। जानकारों का मानना है कि यदि संसद के दबाव में अमेरिकी प्रशासन पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव को कम करने और कूटनीतिक रास्तों को अपनाने के लिए विवश होता है, तो इससे वैश्विक क्रूड ऑयल की कीमतों में नरमी आ सकती है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का अधिकांश हिस्सा आयात करता है, ऐसे में तेल की कीमतों में स्थिरता आना भारतीय अर्थव्यवस्था और राजकोषीय घाटे के लिए एक बहुत बड़ी राहत साबित होगा।