सऊदी अरब के खिलाफ हूतियों की गुप्त मदद कर रहा UAE

सऊदी अरब के खिलाफ हूतियों की गुप्त मदद कर रहा UAE

मध्य पूर्व यानी खाड़ी देशों के सामरिक गलियारों से बेहद चौंकाने वाली और भू-राजनीतिक हलचल मचा देने वाली खबर सामने आ रही है। पश्चिमी एशिया की राजनीति और सुरक्षा मामलों के विश्लेषकों ने दावा किया है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब के बीच बढ़ता क्षेत्रीय तनाव अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। खुफिया रिपोर्टों और कूटनीतिक सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आ रही है कि यमन में जारी संघर्ष के बीच संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब के प्रभाव को बेअसर करने और खाड़ी क्षेत्र में अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए पर्दे के पीछे से हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) और उनके समर्थित गुटों को गुप्त रूप से शह दे रहा है। यमन युद्ध के शुरुआती दौर में सऊदी अरब और यूएई एक ही गठबंधन का हिस्सा थे, लेकिन अब दोनों देशों के बीच बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने उन्हें एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ा कर दिया है।

यह रणनीतिक दुश्मनी तब और गहरा गई जब सऊदी अरब और यूएई के बीच यमन के दक्षिणी भूभाग और लाल सागर (Red Sea) के प्रमुख समुद्री व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण स्थापित करने को लेकर मतभेद खुलकर सामने आने लगे। विश्लेषकों का मानना है कि अबू धाबी, रियाद के उस बढ़ते वैश्विक प्रभाव से असहज महसूस कर रहा है, जिसे सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अपने 'विजन 2030' और नए रक्षा समझौतों के जरिए हासिल करने की कोशिश में हैं। ऐसे में सऊदी अरब को क्षेत्रीय संघर्षों में उलझाए रखने और उसके सैन्य दबाव को कमजोर करने के लिए यूएई की ओर से हूती विद्रोहियों के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाइयों को धीमा करने और अनौपचारिक रूप से उन्हें रणनीतिक ढील देने के आरोप लगाए जा रहे हैं। इस गुप्त रणनीतिक खींचतान ने खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) की एकजुटता की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है।

यमन का युद्धक्षेत्र और लाल सागर में यूएई-सऊदी की वर्चस्व की जंग

यमन पिछले एक दशक से भी अधिक समय से गृहयुद्ध की आग में जल रहा है, जहां एक तरफ ईरान समर्थित हूती विद्रोही हैं और दूसरी तरफ सऊदी अरब समर्थित सरकारी तंत्र। शुरुआत में यूएई ने सऊदी गठबंधन के तहत अग्रिम भूमिका निभाई थी, लेकिन बाद में उसने यमन के दक्षिणी क्षेत्र में सक्रिय अलगाववादी समूह साउथर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) को अपना खुला समर्थन देना शुरू कर दिया। यूएई की यह नीति सऊदी अरब की यमन नीति से पूरी तरह उलट थी, क्योंकि रियाद एक अखंड यमन सरकार का समर्थन करता है, जबकि यूएई दक्षिणी यमन के बंदरगाहों पर अपना एकाधिकार जमाना चाहता है। हालिया महीनों में सऊदी हवाई हमलों के जवाब में जब हूतियों ने सऊदी अरब के तेल ठिकानों और बुनियादी ढांचों पर हमले तेज किए, तो यूएई की रहस्यमयी चुप्पी ने रियाद के संदेह को और गहरा कर दिया है।

रणनीतिक जानकारों का कहना है कि यूएई की यह गुप्त रणनीति 'शतरंज के मोहरों' जैसी है। यूएई चाहता है कि सऊदी अरब यमन के दलदल और हूती हमलों के साए में व्यस्त रहे, ताकि यूएई लाल सागर, बाब-अल-मंदब जलडमरूमध्य और अदन की खाड़ी के व्यापारिक समुद्री मार्गों पर अपने आर्थिक और सामरिक केंद्र (Ports) को निर्बाध रूप से मजबूत कर सके। इसके अलावा, यूएई द्वारा हूती गुटों के साथ अनौपचारिक समझ की खबरें इस बात की ओर इशारा करती हैं कि वह अपने देश और बुनियादी ढांचे को हूती मिसाइलों व ड्रोन हमलों से सुरक्षित रखने की एवज में सऊदी अरब की सामरिक घेराबंदी पर आंखें मूंदे हुए है। इस दोहरे रुख ने दोनों अरब महाशक्तियों के बीच भरोसे को पूरी तरह खत्म कर दिया है।

इस्लामिक देशों के समीकरण और वाशिंगटन की बढ़ी चिंताएं

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच गहराता यह मतभेद केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक कूटनीति पर भी पड़ रहा है। हाल ही में सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान और तुर्की के साथ किए गए त्रिपक्षीय रक्षा समझौतों (Mecca Defense Pact) से यूएई असहज महसूस कर रहा है। यूएई को डर है कि इस तरह के सैन्य गठबंधनों से खाड़ी क्षेत्र में तुर्की और पाकिस्तान का असर बढ़ेगा, जो उसकी अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं के अनुकूल नहीं है। यही वजह है कि अबू धाबी अब रियाद की रणनीतियों को मात देने के लिए उन सभी ताकतों और विद्रोहियों के प्रति नरम रुख अपना रहा है जो सऊदी अरब के लिए सिरदर्द बने हुए हैं।

दूसरी ओर, संयुक्त राज्य अमेरिका (US) और पश्चिमी देश इन दो मजबूत सहयोगियों के बीच बढ़ते दरार से बेहद चिंतित हैं। वाशिंगटन का मानना है कि सऊदी अरब और यूएई की आपसी दुश्मनी का सीधा फायदा ईरान और हूती विद्रोहियों को मिल रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला (Energy Supply Chain) पर भारी खतरा मंडरा रहा है। अमरीकी कूटनीतिज्ञ दोनों देशों के बीच जारी इस छद्म युद्ध (Proxy Rivalry) को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दोनों देश अपने-अपने राष्ट्रीय और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए एक-दूसरे के खिलाफ शह-मात का खेल खेलने से पीछे नहीं हट रहे हैं।

मिडिल ईस्ट की सुरक्षा पर असर और भविष्य का सामरिक परिदृश्य

अरब जगत के इन दो सबसे अमीर और ताकतवर देशों के बीच की यह आपसी रंजिश मिडिल ईस्ट की सुरक्षा संरचना को पूरी तरह बदल सकती है। यदि यूएई और सऊदी अरब के बीच का यह कूटनीतिक दरार इसी तरह बढ़ता रहा, तो जीसीसी (GCC) संगठन व्यावहारिक रूप से निष्क्रिय हो जाएगा। हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब की विफलता और यूएई की गुप्त रणनीति यह साबित करती है कि अब खाड़ी देश अपने साझा सुरक्षा मंचों के बजाय व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे मध्य पूर्व में किसी भी शांति समझौते की गुंजाइश खत्म होती दिख रही है और यमन युद्ध का दायरा और अधिक जटिल होता जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि सऊदी अरब के खिलाफ यूएई की यह अंदरूनी रणनीति आने वाले समय में मध्य पूर्व में नए शक्ति संतुलन (Power Balance) को जन्म देगी। जहां सऊदी अरब सैन्य और कूटनीतिक मोर्चे पर आक्रामक रुख अपनाए हुए है, वहीं यूएई आर्थिक और समुद्री सुरक्षा के मोर्चे पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या दोनों देशों के शीर्ष शासक इस बढ़ते मतभेद को सुलझाने के लिए बातचीत की मेज पर आते हैं या फिर खाड़ी की यह अंदरूनी दुश्मनी पूरे क्षेत्र को एक और भीषण संकट की ओर धकेल देगी।