अमेरिकी चुनाव और ग्रीन कार्ड-H1B का इंतजार
सपनों के देश अमेरिका में अपनी किस्मत आजमाने और स्थाई निवास की चाहत रखने वाले लाखों भारतीय पेशेवरों के लिए एच-1बी (H-1B) वीजा और एम्प्लॉयमेंट-बेस्ड ग्रीन कार्ड (Green Card) का सफर किसी कठिन और अनिश्चित इम्तिहान से कम नहीं है। अमेरिकी राजनीति और आव्रजन नीतियों (Immigration Policies) में आ रहे बड़े बदलावों के बीच दो भारतीय आईटी इंजीनियरों की अलग-अलग दास्तां आज अमेरिका में बसे 10 लाख से अधिक भारतीयों की कड़वी सच्चाई को बयां करती है। सिलिकॉन वैली (Silicon Valley) में लगभग एक ही समय पर अपने करियर की शुरुआत करने वाले दो दोस्तों में से एक को कानूनी अड़चनों को पार करते हुए आखिर permanent residency (ग्रीन कार्ड) का तोहफा मिल गया, वहीं दूसरा दोस्त H-1B वीजा एक्सटेंशन और नीतियों के सख्त होने के कारण सब कुछ छोड़कर हमेशा के लिए भारत लौटने पर मजबूर हो गया।
#1. अमेरिका में ग्रीन कार्ड का 179 सालों का लंबा इंतजार और देशवार कोटा का संकट
अमेरिका में भारतीय पेशेवरों के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करना दिन-प्रतिदिन अत्यधिक चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी (NFAP) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में 10 लाख से अधिक योग्य भारतीय एम्प्लॉयमेंट-बेस्ड (EB-2 और EB-3) ग्रीन कार्ड बैकलॉग में फंसे हुए हैं। अमेरिकी आव्रजन कानून में प्रति-देश 7 प्रतिशत का सीमित कोटा लागू होने के कारण भारतीय आवेदकों के लिए EB-2 कैटेगरी में इंतजार की अवधि अनुमानित रूप से 179 साल तक पहुंच चुकी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि हजारों उच्च योग्य भारतीय टेक प्रोफेशनल्स अपनी पूरी जिंदगी अमेरिका में बिना स्थाई नागरिकता के केवल अस्थाई कामगार के रूप में बिताने को मजबूर हैं, जबकि अन्य देशों के नागरिकों को वही ग्रीन कार्ड महज कुछ महीनों या वर्षों में मिल जाता है।
#1. अमेरिकी चुनाव और H-1B वीजा नियमों में लगातार कड़े होते बदलाव
अमेरिका के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम और आगामी मध्यावधि व राष्ट्रपति चुनावों के दौरान आव्रजन नीति हमेशा एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनी रहती है। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) द्वारा हाल के महीनों में एच-1बी (H-1B) वीजा धारकों की डेफरेंस पॉलिसी (Deference Policy) को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। पूर्व में यदि किसी कर्मचारी का H-1B वीजा एक बार मंजूर हो जाता था, तो रिन्यूअल के समय उसे पहले के निर्णय के आधार पर आसानी से एक्सटेंशन मिल जाता था। हालांकि, नई नीतिगत समीक्षा के तहत हर एक्सटेंशन आवेदन को एक नए सिरे से जांचा जाएगा, जिसमें वेतन स्तर, कंपनी की प्रामाणिकता और विशेष व्यवसाय की शर्तों की सख्त समीक्षा की जा रही है। इस अतिरिक्त प्रशासनिक जांच (RFEs) ने अमेरिका में कार्यरत 70% से अधिक भारतीय H-1B धारकों के मन में अनिश्चितता का भय पैदा कर दिया है।
#1. एक को मिला ग्रीन कार्ड, तो दूसरा वीजा नवीनीकरण न होने पर भारत लौटा
सिलिकॉन वैली की एक प्रसिद्ध टेक कंपनी में कार्यरत राजेश (बदला हुआ नाम) को उनकी कंपनी ने विशेष असाधारण श्रेणी (EB-1 Priority Worker) के तहत स्पॉन्सर किया था, जिससे उन्हें लंबे बैकलॉग से छूट मिल गई और 8 साल के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार उनके हाथों में स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड आ गया। हालांकि, उनके साथ ही अमेरिका पहुंचे उनके साथी अमित (बदला हुआ नाम) का मामला साधारण EB-2 श्रेणी में था। लगातार H-1B एक्सटेंशन पर काम कर रहे अमित का इस बार वर्क वीजा एक्सटेंशन कड़े नियमों और कागजी जांच के चलते खारिज हो गया। 60 दिनों के ग्रेस पीरियड में नई नौकरी न मिल पाने और बच्चों की पढ़ाई के बीच बढ़ती अनिश्चितता से तंग आकर अमित को अपना जमा-जमाया घर, कार और जीवन समेटकर अपने परिवार के साथ वापस भारत (बेंगलुरु) लौटना पड़ा।
#1. H-4 वीजा पर निर्भर जीवनसाथी और भारतीय बच्चों की 'एज-आउट' की बड़ी समस्या
अमेरिका के इस आव्रजन संकट का असर केवल नौकरीपेशा पेशेवरों पर ही नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार और मासूम बच्चों पर भी गहराई से पड़ रहा है। H-1B वीजा धारकों के जीवनसाथी H-4 वीजा पर अमेरिका में रहते हैं। वर्क ऑथराइजेशन डॉक्यूमेंट (EAD) के रिन्यूअल में होने वाली हफ्तों की देरी के कारण कई योग्य भारतीय महिलाओं को अपनी नौकरियां गंवानी पड़ रही हैं। इसके अलावा सबसे दुखद स्थिति उन बच्चों की है जो अमेरिका में बड़े हुए हैं, लेकिन 21 वर्ष की आयु पूरी करते ही वे कानूनन अपने माता-पिता के ग्रीन कार्ड आवेदन से बाहर (Aged-out) हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें या तो सेल्फ-स्पॉन्सर F-1 स्टूडेंट वीजा पर जाना पड़ता है या फिर देश छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है।
#1. रिवर्स ब्रेन ड्रेन: अमेरिका से भारत लौट रहे कुशल इंजीनियर, भारत में नए अवसर
अमेरिका की अनिश्चित आव्रजन नीतियों और ग्रीन कार्ड के कभी न खत्म होने वाले इंतजार ने अब एक नया ट्रेंड शुरू कर दिया है जिसे 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' (Reverse Brain Drain) कहा जा रहा है। अमेरिका में दशकों गुजारने के बावजूद अनिश्चितता के साये में जीने से तंग आकर अब बड़ी संख्या में वरिष्ठ भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स और रिसर्चर्स वापस भारत लौटने का विकल्प चुन रहे हैं। भारत में तेजी से बढ़ते टेक इकोसिस्टम, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) और स्टार्टअप्स के बूम के कारण इन पेशेवरों को भारत के बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और गुरुग्राम जैसे शहरों में प्रतिस्पर्धी वेतन और बेहतर जीवनशैली मिल रही है। यह स्थिति अमेरिका के लिए जहां उच्च कुशल मानव संसाधन का नुकसान है, वहीं भारत के टेक और इनोवेशन सेक्टर के लिए एक बड़ा वरदान साबित हो रही है।