बांग्लादेश में कौन भड़का रहा भारत विरोधी भावनाएं

बांग्लादेश में कौन भड़का रहा भारत विरोधी भावनाएं

दक्षिण एशियाई भू-राजनीति में भारत का पूर्वी पड़ोसी बांग्लादेश एक बार फिर तीव्र भारत-विरोधी बयानबाजी और राजनीतिक उथल-पुथल का मुख्य केंद्र बन गया है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद से शुरू हुआ तनाव अब दिसंबर 2026 में 1996 की 30-वर्षीय गंगा जल संधि (Ganga Water Sharing Treaty) के समाप्त होने के मुहाने पर बेहद संवेदनशील और विस्फोटक मोड़ ले चुका है। ढाका की सड़कों पर नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) और कट्टरपंथी संगठनों द्वारा एक बार फिर "दिल्ली ना ढाका" जैसे भारत-विरोधी नारे गूंज रहे हैं। बांग्लादेश की आंतरिक राजनीतिक खींचतान, ऊर्जा संकट और आर्थिक तंगी का ढीकरा भारत के सिर फोड़ने का यह सुनियोजित प्रयास न केवल दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि इससे जापान के सहयोग से बन रहे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण 'मटरबारी पोर्ट प्रोजेक्ट' (Matarbari Port Project) और उत्तर-पूर्व भारत को जोड़ने वाले ट्रांजिट कॉरिडोर की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

#1. बांग्लादेश में भारत विरोधी आग भड़काने वाले मुख्य तत्व और राजनीतिक साज़िश

ढाका में उठ रही भारत विरोधी नफरत की लहर के पीछे केवल आम नागरिकों का गुस्सा नहीं, बल्कि देश के कट्टरपंथी इस्लामी समूह, पूर्व छात्र आंदोलन से निकले संगठन जैसे नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) और राजनीतिक विपक्षी ताकतें हैं। एनसीपी के संयोजक नाहिद इस्लाम और कट्टरपंथी सांसद हसनात अब्दुल्ला जैसे चेहरे रैलियों में बिना किसी ठोस सबूत के भारत पर बांग्लादेश को अस्थिर करने, मस्जिदें गिराने की साजिश रचने और सीमा पर अत्याचार करने जैसे बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं। पीएम तारिक रहमान की नई सरकार के सामने बिजली संकट, रसोई गैस की कमी और महंगाई के कारण जो घरेलू जनाक्रोश पनप रहा है, उसे मोड़ने के लिए राजनीतिक नेताओं द्वारा 'इंडिया कार्ड' (India Card) का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह भड़काऊ बयानबाजी इतनी खतरनाक हो चुकी है कि कुछ कट्टरपंथी नेता भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (Seven Sisters) को काटने और अलगाववादियों को पनाह देने की धमकियां तक दे रहे हैं।

#1. 1996 की गंगा जल संधि का नवीनीकरण बना नया कूटनीतिक फ्लैशपॉइंट

भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हस्ताक्षरित 30-वर्षीय ऐतिहासिक 'गंगा जल संधि' दिसंबर 2026 में अपनी म्याद पूरी कर रही है। पश्चिमी बंगाल के फरक्का बैराज पर शुष्क मौसम (1 जनवरी से 31 मई) के दौरान जल बंटवारे को नियंत्रित करने वाली यह संधि बांग्लादेश की लगभग एक-तिहाई आबादी की आजीविका का मुख्य आधार है। बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्रालय द्वारा 12 दिसंबर 2026 से पहले एक नई और अधिक पानी की मांग वाली संधि करने का भारी दबाव बनाया जा रहा है। कट्टरपंथी संगठन इस जल संधि को लेकर जनता को भड़का रहे हैं और यह अफवाह फैला रहे हैं कि भारत उनके हिस्से का पानी रोक रहा है। संधि के नवीनीकरण पर बातचीत के बजाय सड़क पर उतरे प्रदर्शनकारी चेतावनी दे रहे हैं कि यदि उन्हें 'उचित हिस्सा' नहीं मिला, तो वे पूरे देश में उग्र आंदोलन छेड़ेंगे। जल संकट और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में गंगा जल समझौता दोनों देशों के बीच कूटनीति की सबसे कठिन परीक्षा बन गया है।

#1. जापान-प्रायोजित मटरबारी पोर्ट प्रोजेक्ट पर गहराया संकट और सामरिक ख़तरा

भारत विरोधी भावनाओं का सीधा असर केवल भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय व्यापार पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक सामरिक पहलों पर भी पड़ रहा है। जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) के सहयोग से कॉक्स बाजार के पास विकसित किया जा रहा 'मटरबारी डीप सी पोर्ट' (Matarbari Deep Sea Port) बंगाल की खाड़ी में एक अत्यंत महत्वपूर्ण आर्थिक गेम-चेंजर प्रोजेक्ट है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (Seven Sisters), नेपाल और भूटान के लिए समुद्री व्यापार मार्ग को आसान बनाना और चीन के प्रभाव को संतुलित करना था। हालांकि, बांग्लादेश में चरमपंथी समूहों और राजनीतिक दलों द्वारा इस प्रोजेक्ट के तहत भारत को दिए जाने वाले ट्रांजिट कॉरिडोर और बंदरगाह के इस्तेमाल का हिंसक विरोध शुरू कर दिया गया है। विपक्ष का तर्क है कि भारत को ट्रांजिट रूट देने से बांग्लादेश की संप्रभुता को खतरा है, जिसके कारण जापानी कंपनियों और विदेशी निवेशकों में सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा हो गई है।

#1. शेख हसीना की भारत में मौजूदगी और पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा पर प्रभाव

अगस्त 2024 में शेख हसीना के भारत में शरण लेने के बाद से ही ढाका में अंतरिम और नई राजनीतिक व्यवस्था भारत से लगातार हसीना के प्रत्यर्पण (Extradition) की मांग कर रही है। इसी मुद्दे को भारत के खिलाफ जनभावनाएं भड़काने के लिए एक बड़े औजार के रूप में भुनाया जा रहा है। इसके साथ ही बांग्लादेश की सीमा पर जमात-ए-इस्लामी और हिज़ब उत-तहरीर (Hizb ut-Tahrir) जैसे प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठनों की बढ़ती सक्रियता भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर ('चिकन्स नेक') और पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा पैदा कर रही है। बांग्लादेश की राजनीति में आ रहा यह उग्र वैचारिक बदलाव भारतीय विदेश नीति के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।

#1. कूटनीतिक गतिरोध और शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता

बांग्लादेश में लगातार गहराते इस भारत-विरोधी माहौल से पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल है। भारत ने सदैव एक जिम्मेदार पड़ोसी के रूप में बांग्लादेश के विकास, बिजली आपूर्ति और बुनियादी ढांचे में मदद की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बांग्लादेश की सरकार अपने राजनीतिक हितों के लिए भारत-विरोधी ताकतों को इसी तरह संरक्षण देती रही, तो इसका सीधा नुकसान बांग्लादेश की अपनी अर्थव्यवस्था, विदेशी निवेश और गारमेंट्स उद्योग को उठाना पड़ेगा। भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह क्षेत्रीय शांति और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता किए बिना केवल तर्कसंगत और परस्पर सम्मान के आधार पर ही गंगा जल संधि और व्यापारिक कॉरिडोर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर वार्ता आगे बढ़ाएगी।