ढाका से अंकारा तक अचानक क्यों गरमाई कूटनीति
दक्षिण एशिया के राजनीतिक और कूटनीतिक गलियारों में इस समय एक बहुत बड़ी हलचल देखने को मिल रही है, क्योंकि बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी अचानक तुर्की के दौरे पर रवाना हो गए हैं। इसी के ठीक साथ-साथ ढाका से तारिक रहमान सरकार के प्रमुख मंत्री और कूटनीतिक सलाहकार भी तुर्की की राजधानी अंकारा और इस्तांबुल के लिए उड़ान भर चुके हैं।
इस तरह एक ही समय पर भारत के वरिष्ठ राजनयिक और बांग्लादेशी सत्ता पक्ष के प्रमुख नेताओं का तुर्की पहुंचना केवल कोई साधारण संयोग नहीं माना जा सकता है। दक्षिण एशियाई राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों और रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच इस खबर के सामने आने के बाद से तरह-तरह की कयासबाजियों का बाजार बेहद गर्म हो गया है। आखिर ऐसा क्या चल रहा है कि दक्षिण एशिया से लेकर मध्य प्रदेश और पश्चिमी एशिया तक अचानक राजनयिकों की भागदौड़ शुरू हो गई है?
भारत-बांग्लादेश के बदले रिश्तों के बीच तुर्की का अचानक जुड़ता यह नया समीकरण
बांग्लादेश में हालिया राजनीतिक सत्ता परिवर्तन और तख्तापलट के बाद से ही भारत और बांग्लादेश के बीच के द्विपक्षीय संबंधों में कई तरह की नई चुनौतियां और कूटनीतिक मोड़ देखने को मिले हैं। तारिक रहमान के नेतृत्व में नई व्यवस्था बनने के बाद से बांग्लादेश लगातार अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नया आकार देने और उनमें विविधता लाने की कोशिश कर रहा है।
तुर्की हाल के कुछ वर्षों में मुस्लिम बहुल देशों के साथ अपने आर्थिक, रणनीतिक और रक्षा संबंधों को बहुत तेजी से मजबूत करने में जुटा हुआ है। ऐसे में बांग्लादेश की मौजूदा सरकार का झुकाव भी तुर्की की तरफ बढ़ता देखा गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इस पूरे कूटनीतिक समीकरण में भारतीय उच्चायुक्त की अचानक तुर्की यात्रा क्या संकेत देती है? राजनयिक सूत्रों की मानें तो भारत दक्षिण एशिया में अपने पड़ोसी देशों के साथ किसी भी तीसरे देश के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव और गतिविधियों को बहुत बारीकी से ट्रैक कर रहा है।
अंकारा में बैकचैनल डिप्लोमेसी और गुप्त बैठकों की पूरी अंदरूनी कहानी
कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय अंकारा और इस्तांबुल के बंद कमरों में बैकचैनल डिप्लोमेसी यानी पर्दे के पीछे का संवाद बहुत तेजी से सक्रिय हो गया है। भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी का तुर्की जाना और ठीक उसी समय वहां बांग्लादेशी मंत्रियों की मौजूदगी, इस बात की ओर साफ इशारा करती है कि कोई बड़ी त्रिकोणीय बातचीत या क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक गलियारे से जुड़ी रणनीतिक चर्चा चल रही है।
दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन बनाए रखने के लिए भारत लगातार अपने सभी पड़ोसियों और रणनीतिक साझेदारों के संपर्क में रहता है। तुर्की में रक्षा सौदों, ड्रोन तकनीक, व्यापारिक समझौतों और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को लेकर बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल की महत्वपूर्ण बैठकें होने के संकेत मिल रहे हैं। भारत इस बात को पूरी तरह सुनिश्चित करना चाहता है कि बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी सामरिक स्थिति और राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकताओं को किसी भी तरह का आघात या नुकसान न पहुंचे।
दक्षिण एशियाई राजनीति और भारत की क्षेत्रीय प्राथमिकताओं पर इसका कितना बड़ा असर होगा
बांग्लादेश में नई सरकार के आने के बाद से ही भारत अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट' यानी पड़ोसी प्रथम की नीति के तहत अपने रिश्तों को लगातार संतुलित करने का प्रयास कर रहा है। भारत के लिए बांग्लादेश केवल एक सीमावर्ती पड़ोसी नहीं है, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (North East India) की आंतरिक सुरक्षा, व्यापार, लॉजिस्टिक्स और पारगमन का सबसे अहम जरिया भी है।
यदि तुर्की बांग्लादेश में अपना निवेश, रक्षा सहयोग या रणनीतिक दखल बढ़ाता है, तो उसका सीधा असर पूरे दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप के भू-राजनीतिक माहौल पर पड़ेगा। यही वजह है कि भारतीय विदेश मंत्रालय और भारतीय राजनयिक इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए हैं। तुर्की में हो रही ये बैठकें केवल एक साधारण राजनयिक दौरा नहीं हैं, बल्कि यह आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया की विदेश नीति का नया रुख तय करने वाली एक बेहद महत्वपूर्ण घटना साबित हो सकती हैं।