बेतहाशा महंगाई का हवाला देकर CREDAI ने सरकार के सामने रखी बड़ी मांग
देशभर के रियल एस्टेट सेक्टर और आम नागरिकों के अपने घर के सपने को लेकर एक बहुत बड़ी और अहम खबर सामने आ रही है, जिसने शहरी विकास और आवास नीतियों पर नई बहस छेड़ दी है। प्रॉपर्टी डेवलपर्स के सबसे बड़े शीर्ष संगठन 'क्रेडाई' (CREDAI) ने सरकार के सामने यह खुलकर और कड़ाई से बात रखी है कि वर्तमान समय में आसमान छूती महंगाई और निर्माण सामग्री की लागत में बेतहाशा वृद्धि के कारण 45 लाख रुपये के बजट में कोई भी अफोर्डेबल हाउस (Affordable Housing) तैयार करना पूरी तरह से असंभव हो चुका है। देश के विभिन्न महानगरों और अर्ध-शहरी इलाकों में जिस प्रकार से सीमेंट, स्टील, श्रम लागत (Labor Cost) और जमीन की कीमतें बढ़ी हैं, उसने कम आय वाले मध्यम वर्ग के लिए किफायती आवास की परिभाषा को ही बदलकर रख दिया है। क्रेडाई के अधिकारियों और देश भर के रियल एस्टेट विशेषज्ञों का यह कहना है कि सरकार द्वारा तय की गई पुरानी अफोर्डेबल हाउसिंग की मौद्रिक सीमा अब आज की वास्तविक आर्थिक परिस्थितियों से कोसों दूर हो चुकी है, जिसके कारण बिल्डर्स और डेवलपर्स के लिए इस श्रेणी में प्रोजेक्ट्स लॉन्च करना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। इस मांग के सामने आने के बाद से उन करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों की चिंताएं बढ़ गई हैं जो कम कीमत में अपना पक्का घर खरीदने का सपना संजोए बैठे हैं, क्योंकि यदि सरकार इस सीमा को नहीं बढ़ाती है या सब्सिडी के नियमों में बदलाव नहीं करती है, तो सस्ते घरों का निर्माण कार्य देश भर में बुरी तरह से ठप हो सकता है।
CREDAI की इस मांग के पीछे छिपी महंगाई की सच्चाई और निर्माण लागत का संकट
भारतीय रियल एस्टेट डेवलपर्स संगठन (CREDAI) ने केंद्र और राज्य सरकारों के समक्ष जो आर्थिक आंकड़े और तर्क रखे हैं, उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों में देश के भीतर निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाले हर एक प्रमुख घटक के दाम दोगुने या उससे भी अधिक हो चुके हैं। कोविड महामारी के बाद से लेकर अब तक स्टील, सीमेंट, एल्युमिनियम, कॉपर, कांच और सैनिटरी फिटिंग्स जैसी बुनियादी सामग्रियों की कीमतों में बेतहाशा उछाल आया है, जिससे किसी भी बहुमंजिला इमारत या स्वतंत्र मकान को खड़ा करने की लागत बहुत अधिक बढ़ गई है। इसके अलावा, शहरों के भीतर जमीनों के सर्किल रेट और अधिग्रहण की लागत में भी भारी वृद्धि दर्ज की गई है, जिसका सीधा प्रभाव फ्लैट्स और मकानों की अंतिम बिक्री मूल्य (Final Selling Price) पर पड़ता है। ऐसी स्थिति में, जब सरकार या नीतियां यह उम्मीद करती हैं कि कोई डेवलपर 45 लाख रुपये या उससे कम कीमत में आधुनिक सुविधाओं से लैस एक गुणवत्तापूर्ण अफोर्डेबल हाउस उपलब्ध करा देगा, तो वह धरातल पर पूरी तरह से अव्यवहारिक साबित होता है। क्रेडाई ने इसी गंभीर आर्थिक विसंगति को उजागर करते हुए सरकार से यह मांग की है कि अफोर्डेबल हाउसिंग की इस मूल्य सीमा (Price Cap) को तुरंत संशोधित किया जाए और इसे महंगाई के मौजूदा स्तर के अनुरूप काफी ऊपर उठाया जाए, ताकि इस सेगमेंट में काम करने वाले डेवलपर्स को भी व्यापार करने का अनुकूल अवसर मिल सके।
मध्यम वर्ग और कम आय वाले परिवारों के सपनों पर मंडराता संकट और किफायती आवास की परिभाषा
भारत जैसे विकासशील देश में अपने सपनों का घर खरीदना हर आम नागरिक के जीवन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण वित्तीय लक्ष्य होता है, और सरकार की विभिन्न योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत भी किफायती घरों को बढ़ावा दिया जाता रहा है। लेकिन जब निर्माण लागत इतनी अधिक बढ़ जाती है कि 45 लाख रुपये के बजट में घर बनाना असंभव हो जाता है, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा उन सैलरीड क्लास और लोअर-मिडिल क्लास परिवारों को भुगतना पड़ता है जो अपने सीमित बजट में घर खरीदने के लिए बैंकों के होम लोन और सरकारी सब्सिडी पर निर्भर रहते हैं। जब डेवलपर्स इस कीमत पर घर बेचने में असमर्थ हो जाते हैं, तो वे अफोर्डेबल प्रोजेक्ट्स के बजाय प्रीमियम और लग्जरी हाउसिंग प्रोजेक्ट्स का निर्माण करने लगते हैं, जिससे सस्ते घरों की आपूर्ति बाजार में तेजी से घटने लगती है। घरों की मांग और आपूर्ति के बीच का यह भारी असंतुलन अंततः प्रॉपर्टी की कीमतों को और अधिक बढ़ा देता है, जिससे आम आदमी के लिए घर खरीदना एक असंभव सपना बनता चला जाता है। क्रेडाई की इस मांग के केंद्र में यही चिंता मुख्य रूप से शामिल है कि यदि समय रहते नीतिगत बदलाव नहीं किए गए, तो देश का एक बहुत बड़ा तबका हमेशा के लिए अपने घर के अधिकार से वंचित हो सकता है।
सरकार और नीति निर्माताओं के सामने रियल एस्टेट सेक्टर की क्या हैं बड़ी चुनौतियां
रियल एस्टेट सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था में जीडीपी (GDP) का एक बहुत बड़ा हिस्सा योगदान करता है और कृषि के बाद सबसे अधिक रोजगार पैदा करने वाला दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में, यदि इस सेक्टर को बुनियादी स्तर पर महंगाई और नियमों की अड़चनों का सामना करना पड़े, तो इसका नकारात्मक असर पूरी अर्थव्यवस्था की विकास दर पर पड़ सकता है। क्रेडाई द्वारा सरकार के समक्ष यह बात भी जोरदार तरीके से रखी गई है कि न केवल घरों की कीमत की सीमा बढ़ाई जानी चाहिए, बल्कि सरकारी मंजूरियों (Approvals) में लगने वाले समय और लागत को भी कम किया जाना चाहिए। वर्तमान में किसी भी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले दर्जनों तरह की अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) और अनुमतियां लेनी पड़ती हैं, जिसमें महीनों और कभी-कभी सालों का समय लग जाता है, जिससे ब्याज और होल्डिंग कॉस्ट इतनी अधिक बढ़ जाती है कि प्रोजेक्ट की लागत स्वतः आसमान छूने लगती है। यदि सरकार सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम को पूरी ईमानदारी से लागू करे और निर्माण सामग्रियों पर लगने वाले जीएसटी (GST) या अन्य शुल्कों में कुछ राहत प्रदान करे, तो काफी हद तक मकानों की बढ़ी हुई लागत को नियंत्रित किया जा सकता है।
भविष्य का रियल एस्टेट परिदृश्य और सरकार के संभावित कदमों पर सबकी नजरें
महंगाई का हवाला देकर क्रेडाई द्वारा 45 लाख रुपये की सीमा को बढ़ाने की यह मांग इस समय देश के नीति निर्माताओं, वित्त मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय के विचारार्थ एक बहुत बड़ा विषय बन चुकी है। देश के करोड़ों मध्यमवर्गीय खरीदार और पूरा हाउसिंग सेक्टर अब इस बात का इंतजार कर रहा है कि सरकार इस महत्वपूर्ण मांग पर क्या प्रतिक्रिया देती है और क्या आगामी बजट या नीतियों में किफायती आवास की परिभाषा को नए सिरे से परिभाषित किया जाएगा। यदि सरकार इस सीमा को बढ़ाकर 65 लाख या 75 लाख रुपये तक कर देती है, तो इससे न केवल डेवलपर्स को राहत मिलेगी, बल्कि टैक्स छूट और होम लोन की ब्याज दरों पर मिलने वाली सरकारी सहायता का लाभ भी एक बड़े दायरे के खरीदारों तक पहुंच सकेगा। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सरकार और रियल एस्टेट उद्योग मिलकर आम आदमी के सिर पर छत सुनिश्चित करने के लिए कौन सा ऐसा संतुलित और व्यावहारिक रास्ता निकालते हैं जो महंगाई की मार से बेहाल जनता को एक वास्तविक और स्थायी राहत प्रदान कर सके।