बाजारों में पूरी तरह बेअसर रहा 'No UPI Day' का ऐलान

बाजारों में पूरी तरह बेअसर रहा 'No UPI Day' का ऐलान

देशभर के खुदरा बाजारों, स्थानीय व्यापारियों और दुकानदारों के बीच पिछले कुछ दिनों से चर्चा का विषय बने 'नो यूपीआई डे' (No UPI Day) के आह्वान का जमीनी स्तर पर असर पूरी तरह से नदारद नजर आया, लेकिन इसके विरोध में व्यापारियों का गुस्सा खुलकर सड़कों पर फूट पड़ा है। डिजिटल पेमेंट के बढ़ते चलन के बीच हाल ही में कुछ हलकों से यह बात सामने आई थी कि व्यापारी वर्ग यूपीआई ट्रांजैक्शंस के विरोध में एक दिन का सांकेतिक बहिष्कार कर सकता है, ताकि इस पर लगने वाले मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या अन्य शुल्कों से राहत मिल सके। हालांकि, जब आज बाजार खुले तो खरीदारों और दुकानदारों के बीच यूपीआई के जरिए होने वाले लेन-देन पूरी तरह से सामान्य रूप से सुचारू चलते रहे और ग्राहकों को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा। इसके बावजूद, देश के विभिन्न प्रमुख व्यापारिक संगठनों और स्थानीय बाजारों के दुकानदारों ने एकसाथ एक मंच पर खड़े होकर डिजिटल पेमेंट से जुड़े कुछ कड़े नियमों और शुल्कों पर गहरी नाराजगी जताई है। व्यापारियों ने सरकार और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) से यह मांग की है कि छोटे दुकानदारों को बिना किसी अतिरिक्त वित्तीय बोझ के डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने की सुविधा दी जानी चाहिए, ताकि वे अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा शुल्कों के रूप में गंवाने से बच सकें। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर भारत के खुदरा व्यापार और फिनटेक (FinTech) सेक्टर के बीच चल रही तनातनी को सुर्खियों में ला दिया है।

'No UPI Day' की चर्चाओं के बीच बाजारों में दिखा सामान्य कामकाज और डिजिटल लेन-देन का दौर

जब आज सुबह देश के छोटे-बड़े बाजार खुले, तो आम नागरिकों और ग्राहकों के मन में यह संशय जरूर था कि क्या सचमुच आज दुकानदार ऑनलाइन पेमेंट स्वीकार नहीं करेंगे, जैसा कि पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और व्यापारिक समूहों में चर्चा चल रही थी। लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत देखने को मिली, क्योंकि किसी भी दुकान पर क्यूआर कोड (QR Code) हटने या कैश मांगने जैसी कोई बात सामने नहीं आई। किराना स्टोर्स, सब्जी मंडियों, केमिस्ट की दुकानों और मॉल से लेकर रेहड़ी-पटरी वालों तक सभी ने पारंपरिक रूप से ग्राहकों के गूगल पे, फोनपे, पेटीएम और अन्य यूपीआई ऐप्स के जरिए भुगतान को बिना किसी रुकावट के स्वीकार किया। दुकानदारों का यह कहना था कि आज के डिजिटल युग में अधिकांश ग्राहक अपने साथ नकद (Cash) लेकर नहीं चलते हैं, और यदि वे यूपीआई बंद कर देते हैं, तो उनका रोजाना का व्यापार ठप हो जाएगा। यही कारण है कि 'नो UPI डे' का वह प्रतीकात्मक या विरोध स्वरूप बुलाया गया अभियान बाजारों में अपना कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ सका। इसके बावजूद, व्यापारियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सामान्य कामकाज चलाना उनकी मजबूरी और ग्राहकों की जरूरत है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि वे वर्तमान पेमेंट सिस्टम की कमियों और उसके वित्तीय बोझ से पूरी तरह संतुष्ट हैं।

दुकानदारों और व्यापारियों का एकसुर में विरोध: शुल्कों के खिलाफ उठाई गई आवाज

यद्यपि बाजार में यूपीआई से पेमेंट का सिलसिला सामान्य रूप से जारी रहा, लेकिन देश भर के व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने एकसाथ एकजुट होकर केंद्र सरकार और पेमेंट गेटवे कंपनियों के सामने अपनी मांगें पुरजोर तरीके से रख दी हैं। दुकानदारों का मुख्य दर्द इस बात को लेकर है कि जब वे ग्राहकों से यूपीआई के माध्यम से छोटी से छोटी राशि का भुगतान लेते हैं, तो कई बार मर्चेंट ट्रांजैक्शन चार्जेस या अन्य तकनीकी शुल्कों के कारण उनकी आय पर सीधा असर पड़ता है। छोटे मार्जिन पर काम करने वाले किराना दुकानदारों और खुदरा विक्रेताओं का यह तर्क है कि यदि हर डिजिटल ट्रांजैक्शन पर उन्हें बैंक या सर्विस प्रोवाइडर को एक्स्ट्रा चार्ज देना पड़ेगा, तो उनके लिए अपना कारोबार चलाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इसी वित्तीय दबाव के विरोध में व्यापारियों ने सरकार से यह मांग की है कि छोटे और मध्यम व्यापारियों (MSME) के लिए यूपीआई ट्रांजैक्शंस को पूरी तरह से शुल्क-मुक्त (Zero MDR) रखा जाना चाहिए, ताकि देश में डिजिटल इंडिया का यह अभियान बिना किसी बाधा के और अधिक मजबूती के साथ आगे बढ़ सके। व्यापारियों की इस एकजुटता ने नीति निर्माताओं का ध्यान इस ओर आकर्षित कर लिया है कि अब फिनटेक कंपनियों और बैंकों को छोटे दुकानदारों के हितों का भी विशेष ध्यान रखना होगा।

भारत के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम और खुदरा व्यापार के बीच का नाजुक संतुलन

भारत आज दुनिया भर में डिजिटल भुगतान के मामले में एक मिसाल बन चुका है, जहां सड़क के किनारे चाय बेचने वाले से लेकर बड़े शोरूम तक हर कोई क्यूआर कोड के जरिए सेकंडों में पेमेंट स्वीकार करता है। इस अभूतपूर्व डिजिटल क्रांति के पीछे सबसे बड़ी ताकत देश का आम दुकानदार और खुदरा विक्रेता ही है, जिसने अपनी दुकानों पर यूपीआई को अपनाकर इसे जन-जन तक पहुंचाया है। ऐसे में, यदि व्यापारियों के मन में किसी भी प्रकार की वित्तीय असंतोष की भावना पैदा होती है, तो यह पूरे फिनटेक इकोसिस्टम के लिए एक गंभीर विचारणीय विषय बन जाता है। तकनीकी विशेषज्ञों और आर्थिक विश्लेषकों का यह मानना है कि सरकार, रिजर्व बैंक (RBI) और एनपीसीआई (NPCI) को मिलकर एक ऐसा संतुलित और पारदर्शी मॉडल तैयार करना चाहिए जिससे न केवल ग्राहकों को आसानी से पेमेंट करने की सुविधा मिलती रहे, बल्कि दुकानदारों को भी बिना किसी अतिरिक्त आर्थिक बोझ के मुनाफा कमाने का अवसर मिले। जब तक व्यापारियों और सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच का यह वित्तीय तालमेल पूरी तरह से स्पष्ट और संतोषजनक नहीं होगा, तब तक इस प्रकार के विरोध के स्वर समय-समय पर उठते रहेंगे, जिसे समय रहते सुलझाना बेहद जरूरी है।

भविष्य की राह और व्यापारियों की मांगों पर सरकार का संभावित रुख

बाजारों में 'No UPI Day' के असरहीन रहने और दुकानदारों द्वारा एकसाथ खड़े होकर अपनी मांगें उठाने के इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि भारत का व्यापारी अब अपनी आर्थिक सुरक्षा को लेकर बेहद जागरूक हो चुका है। देश के विभिन्न व्यापार मंडलों ने यह चेतावनी भी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ही सकारात्मक विचार नहीं किया गया, तो वे भविष्य में और अधिक बड़े स्तर पर अपने विरोध प्रदर्शन की रूपरेखा तैयार कर सकते हैं। हालांकि, सरकार और डिजिटल पेमेंट नियामक पहले से ही इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि देश के डिजिटल बुनियादी ढांचे को कैसे और अधिक सुदृढ़ तथा उपयोगकर्ता के अनुकूल बनाया जाए। आम उपभोक्ता और खुदरा व्यापारी यही उम्मीद कर रहे हैं कि आने वाले दिनों में आपसी बातचीत के जरिए इस समस्या का एक ऐसा स्थायी समाधान निकाल लिया जाएगा जिससे ग्राहकों का डिजिटल अनुभव भी खराब न हो और हमारे देश के रीढ़ कहे जाने वाले छोटे दुकानदार भी आर्थिक नुकसान से पूरी तरह सुरक्षित रह सकें।