औलाद को तरस रही महिला के कांपे हाथ-पैर, घरवाले समझे ‘नजर’ का असर

औलाद को तरस रही महिला के कांपे हाथ-पैर, घरवाले समझे ‘नजर’ का असर

समाज में आज भी मातृत्व यानी मां बनने के सुख को किसी भी स्त्री के जीवन की सबसे बड़ी और पूर्णता देने वाली उपलब्धि माना जाता है। एक महिला जब शादी के बाद लंबे समय तक मां नहीं बन पाती है, तो उस पर न केवल सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने का भारी दबाव होता है, बल्कि वह खुद अंदर ही अंदर गहरे मानसिक अवसाद, अकेलेपन और निराशा के कुंए में डूबती चली जाती है। कुछ ऐसी ही दिल दहला देने वाली और मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली एक बेहद मार्मिक घटना हाल ही में सामने आई है, जिसने यह साबित कर दिया है कि हमारे समाज में आज भी वैज्ञानिक सोच और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के बजाय रूढ़िवादिता और अंधविश्वास कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। एक महिला, जो बरसों से अपनी सूनी गोद को भरने के लिए तरस रही थी, तनाव और कुंठा के इस कदर शिकार हुई कि उसके शरीर ने धीरे-धीरे जवाब देना शुरू कर दिया। उसके हाथ और पैर अचानक बेकाबू होकर बुरी तरह से कांपने लगे, वह न तो ठीक से खड़े पा रही थी और न ही अपने दैनिक जीवन के सामान्य कार्य कर पा रही थी। एक तरफ मातृत्व का न मिल पाना और दूसरी तरफ शरीर की इस लाचारी ने उसकी जिंदगी को नर्क जैसा बना दिया था, लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उसके अपने ही परिवार वालों ने उसकी इस गंभीर चिकित्सीय और मानसिक स्थिति को किसी बीमारी या तनाव मानने के बजाय उस पर किसी बुरी ताकत या 'नजर' का साया समझ लिया और उसे डॉक्टरों के पास ले जाने के बजाय झाड़-फूंक और ओझा-गुणी के चक्कर में उलझा दिया।

झाड़-फूंक और अंधविश्वास का काला जाल: बीमारी को नजर मानकर तांत्रिकों के चक्कर काटता रहा परिवार

महिला के हाथ-पैर में लगातार आ रही कंपकंपी और उसकी बिगड़ती हुई शारीरिक हालत को देखकर उसके घरवाले घबरा गए। किसी ने सलाह दी कि बहू पर किसी की बुरी नजर लग गई है, तो किसी ने यहां तक कह दिया कि किसी ने उस पर कोई तांत्रिक क्रिया या काला जादू करवा दिया है ताकि उसकी गोद हमेशा सूनी ही रहे। अंधविश्वास की अंधी चादर में लिपटे परिवार ने बिना एक पल गंवाए पढ़े-लिखे होने का दावा करने के बावजूद आधुनिक अस्पतालों की दहलीज लांघने के बजाय स्थानीय ओझाओं, तांत्रिकों और नीम-हकीमों के दरवाजे खटखटाना शुरू कर दिया। कभी किसी तांत्रिक के पास जाकर नींबू-मिर्च के टोटके कराए गए, तो कभी रात-बिरात झाड़-फूंक के नाम पर हवन और अनुष्ठान किए गए। ओझाओं ने भी लोगों की इस कमजोरी का पूरा फायदा उठाते हुए अजीबोगरीब दावे किए और कहा कि महिला के शरीर में किसी बुरी आत्मा का वास हो गया है जिसे भगाने के लिए लंबे और महंगे अनुष्ठान करने पड़ेंगे। इस पूरे ड्रामे के दौरान उस बेचारी महिला को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित होना पड़ा। तांत्रिकों के इन पाखंडों और झाड़-फूंक के चक्कर में कीमती वक्त बर्बाद होता चला गया और महिला की बीमारी कम होने के बजाय दिन-प्रतिदिन और अधिक गंभीर होती चली गई। वह चाहकर भी अपनी बात खुलकर किसी को नहीं समझा पा रही थी क्योंकि उसके अंदर का डर और तनाव अब उसके पूरे तंत्रिका तंत्र यानी नर्वस सिस्टम को बुरी तरह से प्रभावित कर चुका था, जिससे उसकी हालत सुधारने के बजाय लगातार बद से बदतर होती जा रही थी।

जब परिजनों की आंखें खुलीं और महिला को लेकर पहुंचे अस्पताल, डॉक्टर ने की काउंसलिंग और मेडिकल जांच

परिवार की इस अंधी दौड़ और पाखंड का अंत तब हुआ जब महिला के एक समझदार और पढ़े-लिखे रिश्तेदार ने बीच में दखल दिया। उसने परिवार को दोटूक शब्दों में समझाया कि यह कोई भूत-प्रेत या नजर का मामला नहीं है, बल्कि महिला का शरीर और दिमाग गंभीर मानसिक आघात (Trauma) से गुजर रहा है। इसके बाद परिवार के होश ठिकाने आए और वे आनन-फानन में महिला को लेकर एक जाने-माने और बड़े अस्पताल के न्यूरोलॉजी और साइकियाट्री डिपार्टमेंट पहुंचे। अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक ने जब उस महिला की शारीरिक और मानसिक स्थिति का बारीकी से निरीक्षण किया और उसके पुराने इतिहास को खंगाला, तो माजरा पूरी तरह से साफ हो गया। डॉक्टर ने परिवार के लोगों को अकेले में बुलाकर जो सच्चाई बताई, उसे सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। डॉक्टर ने स्पष्ट किया कि महिला को कोई बाहरी साया या भूत-प्रेत नहीं है, बल्कि लगातार मातृत्व न मिलने के कारण उसके अवचेतन मन में जो गहरा डर, हीनभावना और तनाव घर कर गया था, उसने उसके नर्वस सिस्टम को झकझोर कर रख दिया था। इस मेडिकल कंडीशन को साइकोजेनिक नॉन-एपलेप्टिक सीजर्स (PNES) या सीवियर सोमैटाइजेशन डिसऑर्डर कहा जाता है, जिसमें अत्यधिक मानसिक तनाव शारीरिक लक्षणों जैसे अंगों के कांपने, बेहोशी या कमजोरी के रूप में बाहर आने लगता है।

डॉक्टर की चेतावनी: अंधविश्वास से जान गंवाने से बचाएं, समय पर इलाज और मानसिक सपोर्ट है असली दवा

अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टर ने इस पूरे मामले पर बेहद गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए समाज के नाम एक बड़ा संदेश दिया है। डॉक्टर का कहना है कि आज के आधुनिक और वैज्ञानिक युग में भी इस तरह के मामले सामने आना यह दर्शाता है कि मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) के प्रति जागरूकता की कितनी भारी कमी है। जब कोई महिला बांझपन या संतान न होने के दर्द से गुजरती है, तो उसके भीतर का इमोशनल टॉर्चर इतना भयानक होता है कि उसका शरीर उस दर्द को सहन नहीं कर पाता और ऐसे गंभीर शारीरिक विकारों के रूप में प्रतिक्रिया देता है। यदि समय रहते उस महिला को किसी अच्छे मनोचिकित्सक (Psychiatrist) के पास ले जाकर उसकी काउंसलिंग न कराई जाती और उसे परिवार का प्यार और संबल न मिलता, तो वह हमेशा के लिए मानसिक संतुलन खो बैठती या पक्षाघात जैसी किसी बड़ी बीमारी का शिकार हो जाती। डॉक्टर ने देश के सभी लोगों से अपील की है कि बीमारी चाहे शारीरिक हो या मानसिक, उसका इलाज हमेशा योग्य डॉक्टरों और अस्पतालों में ही कराएं, न कि ओझा-बैद्यों और झाड़-फूंक के चक्कर में पड़कर अपनी ही बेटियों और बहुओं की जिंदगी दांव पर लगाएं। इस पूरी घटना ने एक बार फिर यह आईना दिखा दिया है कि समाज से अंधविश्वास की बेड़ियों को उखाड़ फेंकने के लिए अभी हमें और कितनी लंबी और जागरूक लड़ाई लड़ने की जरूरत है।