नीला, आसमानी, बैंगनी, कलर के शेड्स की पहचान नहीं होती

नीला, आसमानी, बैंगनी, कलर के शेड्स की पहचान नहीं होती

हमारी यह खूबसूरत और रंग-बिरंगी दुनिया अनगिनत रंगों के मेल से बनी है, जहाँ प्रकृति ने हर एक चीज को अलग-अलग और मनमोहक रंगों से सजाया है। सुबह के वक्त आसमान का नीला रंग, शाम के वक्त सूरज की सुनहरी किरणें और फूलों के अनगिनत शेड्स हमारी आंखों को एक अलग ही सुकून और आनंद देते हैं। हम में से ज्यादातर लोग लाल, पीले, हरे, नीले और बैंगनी रंगों को बहुत ही आसानी से पहचान लेते हैं और उनके बीच का अंतर पलक झपकते ही समझ जाते हैं, लेकिन क्या आपने कभी ऐसे किसी इंसान के बारे में सुना है जो आसमान के नीले रंग और गहरे बैंगनी या आसमानी रंग में कोई फर्क ही न कर पाए? जी हां, दुनिया में लाखों ऐसे लोग मौजूद हैं जो रंगों के इस अंतर को समझने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। जब किसी व्यक्ति को नीला, आसमानी, फिरोजी या बैंगनी जैसे मिलते-जुलते रंगों के शेड्स एक जैसे दिखने लगते हैं, तो लोग अक्सर इसे उनकी कमजोरी या नजर की मामूली गड़बड़ी मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि असलियत इसके बिल्कुल विपरीत होती है। यह स्थिति किसी सामान्य चश्मे के नंबर से जुड़ी नहीं होती, बल्कि यह हमारे शरीर के भीतर आंखों की रेटिना में मौजूद विशेष कोशिकाओं की कार्यप्रणाली से जुड़ी एक आनुवंशिक या चिकित्सीय स्थिति होती है जिसे मेडिकल की भाषा में कलर विजन डिफिशिएंसी यानी कलर ब्लाइंडनेस कहा जाता है। आइए आज इस लेख के माध्यम से बहुत ही विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह कलर ब्लाइंडनेस क्या है, यह क्यों होती है और आप कैसे खुद यह पहचान सकते हैं कि आप इस समस्या से पीड़ित हैं या नहीं।

क्या है कलर ब्लाइंडनेस और कैसे हमारी आंखें और रेटिना रंगों को पहचानने का करती हैं अद्भुत काम

कलर ब्लाइंडनेस को सरल भाषा में वर्णान्धता कहा जाता है, जिसका सीधा मतलब होता है रंगों को सही तरीके से न पहचान पाना या उनमें भेद न कर पाना। इस बीमारी को समझने के लिए हमें अपनी आंखों के अंदर की बनावट को थोड़ा करीब से जानना होगा। हमारी आंखें किसी हाई-टेक कैमरे की तरह काम करती हैं, जिसके पिछले हिस्से यानी रेटिना में दो तरह की मुख्य प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाएं पाई जाती हैं जिन्हें रॉड्स और कोन्स (Rods and Cones) कहा जाता है। इनमें से जो 'कोन' कोशिकाएं होती हैं, वे मुख्य रूप से तेज रोशनी और रंगों को पहचानने के लिए जिम्मेदार होती हैं। इंसानी आंख में मुख्य रूप से तीन प्रकार की कोन कोशिकाएं होती हैं जो लाल (Red), हरी (Green) और नीली (Blue) रोशनी को अवशोषित करती हैं। जब हम किसी वस्तु को देखते हैं, तो ये तीनों कोशिकाएं मिलकर अलग-अलग रंगों के सिगरेट हमारे मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं, जिससे हम लाखों तरह के रंगों के शेड्स को आसानी से पहचान लेते हैं। लेकिन जब इनमें से कोई एक या एक से अधिक कोन कोशिकाएं ठीक से काम नहीं करती हैं या उनमें कोई आनुवंशिक विकास संबंधी दोष होता है, तो मस्तिष्क तक रंगों के सही सिग्नल नहीं पहुंच पाते हैं। परिणाम यह होता है कि व्यक्ति को लाल और हरा रंग एक जैसा दिखने लगता है, या फिर नीला, आसमानी और बैंगनी रंग आपस में इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि उनके बीच की असली पहचान करना असंभव हो जाता है।

नीला, आसमानी और बैंगनी रंगों में भ्रम: क्यों इन खास शेड्स को पहचानना हो जाता है बेहद मुश्किल

कलर ब्लाइंडनेस के कई अलग-अलग प्रकार होते हैं, जिनमें सबसे आम प्रकार लाल-हरा कलर ब्लाइंडनेस है, लेकिन इसके अलावा नीला-पीला कलर ब्लाइंडनेस (Tritanopia) भी एक बेहद महत्वपूर्ण और गंभीर स्थिति है। जिन लोगों को नीला, आसमानी, फिरोजी और बैंगनी रंगों के शेड्स पहचानने में दिक्कत होती है, वे अक्सर ट्रिटानोपिया या ब्लू-येलो कलर विजन डेफिशिएंसी से पीड़ित होते हैं। इस विशेष स्थिति में व्यक्ति को नीला रंग हरा या पीला दिखाई देने लगता है, जबकि चमकीला बैंगनी और गहरा आसमानी रंग उनके लिए एक ही जैसा बन जाता है। रोज़मर्रा की जिंदगी में यह समस्या तब बहुत बड़ी चुनौती बन जाती है जब ऐसे लोग कोई ऐसा काम कर रहे होते हैं जहाँ रंगों की सटीक पहचान बेहद जरूरी होती है, जैसे कि कंप्यूटर ग्राफिक्स डिजाइनिंग, पेंटिंग, इलेक्ट्रिकल वायरिंग जिसमें अलग-अलग रंगों के तार होते हैं, या फिर फैशन और टेक्सटाइल इंडस्ट्री। इसके अलावा, रोजमर्रा के पहनावे में कौन सा कपड़ा किस रंग का है, यह तय करना भी उनके लिए किसी पहेली से कम नहीं होता है। कई बार लोग दूसरों के सामने इस बात को छुपाने की कोशिश करते हैं ताकि उनका मजाक न उड़ाया जाए, लेकिन अंदर ही अंदर यह भ्रम उनके आत्मविश्वास और मानसिक सुकून को प्रभावित करने लगता है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि समय रहते इसके लक्षणों को पहचाना जाए और डॉक्टर से सलाह ली जाए ताकि भविष्य में किसी बड़ी परेशानी से बचा जा सके।

कैसे करें अपनी आंखों की जांच? क्या वाकई इसका कोई पक्का इलाज या समाधान संभव है

यदि आपको या आपके किसी परिवार के सदस्य को भी रंगों को लेकर ऐसा ही कोई भ्रम रहता है, तो आप घर बैठे ही बहुत आसानी से इसकी शुरुआती जांच कर सकते हैं। चिकित्सा विज्ञान में कलर ब्लाइंडनेस की जांच के लिए सबसे प्रसिद्ध और अचूक तरीका इशिहारा टेस्ट (Ishihara Test) का है। इस टेस्ट में गोल घेरों के अंदर अलग-अलग रंगों के छोटे-छोटे डॉट्स या बिंदु बने होते हैं, जिनके बीच में कुछ खास अंक या आकृतियां छिपी होती हैं। यदि किसी व्यक्ति की आँखें पूरी तरह स्वस्थ हैं, तो उसे वे अंक स्पष्ट रूप से दिखाई दे जाते हैं, लेकिन यदि व्यक्ति कलर ब्लाइंडनेस का शिकार है, तो उसे वे अंक या तो बिल्कुल नहीं दिखते या फिर गलत दिखाई देते हैं। इसके अलावा आप किसी भी अच्छे और अनुभवी नेत्र विशेषज्ञ (Optometrist or Ophthalmologist) के पास जाकर अपनी पूरी आँखों की डिजिटल जाँच करवा सकते हैं। जहाँ तक इसके इलाज की बात है, तो जन्मजात कलर ब्लाइंडनेस का कोई शत-प्रतिशत सर्जिकल इलाज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में अभी पूरी तरह संभव नहीं है, क्योंकि यह जेनेटिक यानी आनुवंशिक होता है, लेकिन आज के आधुनिक दौर में कुछ खास तरह के विशेष कलर-करेक्टिव चश्मे (Color Blindness Glasses) और कॉन्टैक्ट लेंस बाजार में उपलब्ध हैं जो रंगों के बीच के कंट्रास्ट को बेहतर बनाकर देखने में काफी हद तक मदद करते हैं। साथ ही, स्मार्टफोन और कंप्यूटर पर कई ऐसे विशेष ऐप्स और सेटिंग्स आ चुकी हैं जो स्क्रीन के रंगों को इस तरह समायोजित कर देती हैं कि कलर ब्लाइंड लोग भी आसानी से डिजिटल दुनिया का इस्तेमाल कर सकें।