ओडिशा के जंगलों में 5 ओरंगुटान मिलने के बाद देश की सुरक्षा एजेंसियों और कोस्टगार्ड के उड़े होश

ओडिशा के जंगलों में 5 ओरंगुटान मिलने के बाद देश की सुरक्षा एजेंसियों और कोस्टगार्ड के उड़े होश

भारतीय वन्यजीव इतिहास और सुरक्षा तंत्र के गलियारों में इस समय एक ऐसी सनसनीखेज और खलबली मचा देने वाली घटना सामने आई है जिसने देश की खुफिया एजेंसियों, पुलिस महकमे और इंडियन कोस्टगार्ड की नींद उड़ाकर रख दी है। हाल ही में ओडिशा के एक दूरदराज और घने जंगल से दक्षिण-पूर्व एशिया में पाए जाने वाले पांच दुर्लभ 'महावानर' यानी ओरंगुटान (Orangutans) के मिलने के बाद अब सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या भारत की समुद्र सीमाओं और तटीय इलाकों के रास्ते कोई बहुत बड़ा इंटरनेशनल पशु तस्करी सिंडिकेट (International Wildlife Smuggling Syndicate) सक्रिय रूप से काम कर रहा है। इंडोनेशिया और मलेशिया के सघन वर्षावनों की यह दुर्लभ प्रजाति हजारों किलोमीटर का समंदर पार करके भारत के पूर्वी तट तक कैसे पहुंच गई, इस एक सवाल ने देश के तटीय सुरक्षा बलों और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो को गहन जांच के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया है। जब से इन जीवों का डीएनए इंसानों से 95 प्रतिशत मिलने और इनके तस्करी के मार्जिन का खुलासा हुआ है, तब से सीमा सुरक्षा और खुफिया तंत्र के तमाम बड़े अधिकारी इस बात की टोह लेने में जुट गए हैं कि देश के भीतर विदेशी वन्यजीवों के काले बाजार का यह नेटवर्क आखिर कितना गहरा और खतरनाक है।

ओडिशा के जंगलों में विदेशी प्राइमेट्स का मिलना: तटीय सुरक्षा में भारी सेंध का बड़ा सबूत

किसी भी देश की संप्रभुता और तटीय सुरक्षा का पैमाना केवल हथियारों और घुसपैठियों की निगरानी तक सीमित नहीं होता, बल्कि देश के समुद्री रास्तों से होने वाली अवैध तस्करी और पर्यावरण की सुरक्षा भी उसकी उतनी ही बड़ी परीक्षा होती है। ओडिशा के जंगलों में इन पांच ओरंगुटान का जिंदा मिलना इस बात का अकाट्य और प्रत्यक्ष प्रमाण है कि भारत के लंबे और संवेदनशील समुद्री तटों पर कस्टम जांच, पोर्ट सिक्योरिटी और कोस्टगार्ड की निगरानी में कहीं न कहीं कुछ ऐसी गंभीर और चिंताजनक खामियां मौजूद हैं जिनका फायदा उठाकर अंतरराष्ट्रीय तस्कर बेखौफ होकर प्रतिबंधित जीवों को देश के अंदर धकेल रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के घने जंगलों से इन भारी-भरकम और महंगे प्राइमेट्स को पकड़कर मालवाहक जहाजों, गुप्त कंटेनरों या अवैध नावों के जरिए बंगाल की खाड़ी के रास्ते भारतीय तटों तक लाना किसी आम चोर या छोटे गिरोह के बस की बात नहीं हो सकती है। इसके पीछे निश्चित रूप से एक बहुत बड़ा और पेशेवर अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट काम कर रहा है जिसके तार दुनिया के कई देशों के काले बाजारों और दुर्लभ पशुओं के खरीदारों से जुड़े हुए हैं।

इंटरनेशनल वाइल्डलाइफ ब्लैक मार्केट और एशिया में लुप्तप्राय जीवों की खौफनाक तस्करी

दुनिया भर में हथियारों और ड्रग्स की तस्करी के बाद यदि कोई सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाला अवैध कारोबार है, तो वह वन्यजीवों और उनकी दुर्लभ प्रजातियों की तस्करी का ब्लैक मार्केट है। दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन और खाड़ी देशों के कुछ हिस्सों में ओरंगुटान जैसे दुर्लभ जीवों की मांग निजी चिड़ियाघरों, अवैध पेंट्स, रिसॉर्ट्स और विदेशी पालतू जानवरों के शौकीनों के बीच बहुत अधिक होती है, जहां एक-एक जीव को करोड़ों रुपये में खरीदा और बेचा जाता है। तस्कर इन मासूम और बेजुबान जीवों को उनके प्राकृतिक आवास से बेरहमी से पकड़कर छोटे-छोटे पिंजरों में ठूंस देते हैं और समुद्री मार्ग के जरिए उन देशों में भेज देते हैं जहाँ वन्यजीव संरक्षण कानून कमजोर हैं या भ्रष्टाचार के कारण आसानी से नियमों को ताक पर रख दिया जाता है। भारत के जंगलों में इन जीवों का पहुंचना यह बताता है कि तस्करों ने अब भारत को न केवल एक ट्रांजिट रूट (Transit Route) के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, बल्कि वे यहां के दूरदराज के जंगलों को इन अवैध विदेशी जीवों को छुपाने की सुरक्षित सेफ हाउस के रूप में भी देखने लगे हैं।

पुलिस, कोस्टगार्ड और वाइब्रेंट इंटेलिजेंस एजेंसियों की संयुक्त उच्चस्तरीय जांच शुरू

इस सनसनीखेज खुलासे के बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB), राज्य पुलिस की विशेष शाखा और इंडियन कोस्टगार्ड ने मिलकर एक साझा ऑपरेशन और हाई-लेवल जांच शुरू कर दी है ताकि इस पूरे अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट के मास्टरमाइंड्स तक पहुंचा जा सके। एजेंसियां इस बात की गहराई से छानबीन कर रही हैं कि पिछले कुछ महीनों में ओडिशा, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में कौन-कौन से संदिग्ध विदेशी जहाज लंगर डाले हुए थे और क्या किसी तस्कर गिरोह ने तटरक्षक बलों की गश्त से बचने के लिए सुनियोजित तरीके से इन जीवों को जंगल में छोड़ दिया था। पकड़े गए इन पांचों ओरंगुटान के स्वास्थ्य की निगरानी देश के शीर्ष पशु वैज्ञानिकों और वन्यजीव चिकित्सा विशेषज्ञों की देखरेख में की जा रही है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यदि इनसे जुड़े किसी तस्कर या बिचौलिए से पूछताछ करनी पड़े, तो कानूनी प्रक्रिया में कोई तकनीकी अड़चन न आए। सरकार अब देश के सभी प्रमुख बंदरगाहों और तटीय चौकियों पर सुरक्षा को और अधिक चाक-चौबंद करने के लिए नए दिशानिर्देश जारी कर रही है ताकि भविष्य में इस तरह की अवैध घुसपैठ को पूरी तरह से रोका जा सके।

भारत के पारिस्थितिक तंत्र पर मंडराता खतरा और कड़े कानूनों की सख्त जरूरत

इंटरनेशनल पशु तस्करी के इस भयानक खेल ने केवल देश की सुरक्षा एजेंसियों के सामने ही चुनौती पेश नहीं की है, बल्कि इसने भारत के स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) और वन्यजीव संरक्षण के सामने भी एक बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। यदि ऐसे विदेशी और आक्रामक जीव भारतीय जंगलों में लंबे समय तक बिना रोक-टोक के जीवित रहते हैं, तो वे यहां की स्थानीय प्रजातियों के भोजन, आवास और प्राकृतिक संतुलन को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं, साथ ही विदेशी बीमारियां भी यहाँ फैल सकती हैं। पर्यावरणविदों और एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट्स का साफ तौर पर यह कहना है कि वन्यजीव तस्करी से जुड़े मामलों में मौजूदा कानूनी सजा और जुर्माने के प्रावधानों को और अधिक कठोर बनाया जाना चाहिए ताकि कोई भी तस्कर इस तरह के जघन्य अपराध को अंजाम देने से पहले सौ बार सोचे। यह घटना भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि अब समय आ गया है जब देश की सीमाओं के साथ-साथ हमारी जैव-विविधता और जंगलों की सुरक्षा के लिए एक अत्याधुनिक, तकनीक-आधारित और समन्वित राष्ट्रीय ग्रिड बनाया जाए, जो हर तरह के विदेशी और आंतरिक खतरों से देश के पर्यावरण और वन्यजीवों की मुकम्मल रक्षा कर सके।