'उमर खालिद और शरजील इमाम बिना ट्रायल के लंबे समय से जेल में बंद

'उमर खालिद और शरजील इमाम बिना ट्रायल के लंबे समय से जेल में बंद

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और कूटनीतिक गलियारों में एक बार फिर भारत की न्यायिक प्रणाली और आंतरिक नीतियों को लेकर गर्मागरम बहस छिड़ गई है। अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने एक बार फिर भारत सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखा सवाल उठाते हुए एक विवादास्पद बयान जारी किया है। आयोग का दावा है कि दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में आरोपी बनाए गए छात्र नेता उमर खालिद और एक्टिविस्ट शरजील इमाम बिना किसी ठोस न्यायिक ट्रायल या मुकदमों के पिछले कई सालों से जेल में सलाखों के पीछे बंद हैं। अमेरिकी संस्था के इस बयान के सामने आने के बाद से ही वैश्विक मंचों पर भारत की घरेलू न्याय व्यवस्था और मानवाधिकार के मुद्दों को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है, जिस पर भारतीय पक्ष की ओर से भी लगातार कड़ा ऐतराज जताया जाता रहा है।

अमेरिकी आयोग USCIRF की रिपोर्ट और मानवाधिकारों को लेकर भारत पर पुराने आरोप

अमेरिकी संस्था USCIRF यानी यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम अपनी रिपोर्टों और बयानों के लिए अक्सर सुर्खियों में बनी रहती है। इस बार आयोग ने अपने बयानों में विशेष रूप से भारत के कड़े आतंकवाद विरोधी कानूनों जैसे गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए (UAPA) के तहत लंबे समय तक विचारणाधीन कैदियों (Under-trial prisoners) की हिरासत पर गहरी चिंता व्यक्त की है। आयोग का तर्क है कि कानून की यह प्रक्रिया अपने आप में सजा बन चुकी है जहां अदालतों में सुनवाई शुरू होने से पहले ही आरोपियों को वर्षों जेल में गुजारने पड़ रहे हैं। हालांकि, भारत सरकार और विदेश मंत्रालय ने अतीत में भी ऐसे कई बयानों को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत की स्वतंत्र न्यायपालिका अपने संवैधानिक दायरे में पूरी पारदर्शिता के साथ काम करती है और किसी भी बाहरी संस्था को देश के आंतरिक मामलों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।

उमर खालिद और शरजील इमाम का मामला: कानूनी पेचीदगियां और अदालती सुनवाई का सफर

दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में साल 2020 के दौरान हुए बहुचर्चित दंगों और कथित बड़ी साजिश के मास्टरमाइंड होने के आरोप में उमर खालिद, शरजील इमाम और कई अन्य लोगों को दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा द्वारा गिरफ्तार किया गया था। इन सभी पर यूएपीए और भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर निचली अदालतों से लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय तक में लंबी कानूनी लड़ाइयां लड़ी जा चुकी हैं, लेकिन कई स्तरों पर जमानत खारिज होने के कारण इन्हें अभी तक राहत नहीं मिल पाई है। कानूनी जानकारों का यह भी मानना है कि मामलों की विशाल संचिका (Case Diary), दस्तावेजों की भारी भरकम संख्या और गवाहों की लंबी फेरिस्त के कारण अदालती ट्रायल की प्रक्रिया में सामान्य से अधिक समय लग रहा है, जिसे लेकर मानवाधिकार संगठन लगातार न्याय में देरी का हवाला देते रहे हैं।

भारत की संप्रभुता और स्वतंत्र न्यायपालिका पर बाहरी हस्तक्षेप का कड़ा विरोध

भारत सरकार हमेशा से इस बात पर अडिग रही है कि देश का संविधान, कानून और न्यायपालिका किसी भी विदेशी दबाव या बाहरी संगठनों के प्रमाण पत्रों की मोहताज नहीं है। जब भी अमेरिकी आयोग या पश्चिमी देश भारत की आंतरिक न्याय व्यवस्था पर उंगली उठाते हैं, तो नई दिल्ली की तरफ से इसे सीधे तौर पर देश की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करार दिया जाता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा और परिपक्व लोकतंत्र है जहां कानून का शासन सर्वोपरि है और किसी भी आरोपी को भारतीय संविधान के तहत अपनी बेगुनाही साबित करने का पूरा और निष्पक्ष अवसर दिया जाता है। इस प्रकार के बाहरी बयानों का उद्देश्य अक्सर भारत की वैश्विक छवि को धूमिल करना होता है, जिसका जवाब देश की राजनीतिक और कूटनीतिक प्रणालियों द्वारा समय-समय पर पूरी मजबूती के साथ दिया जाता रहा है।

भू-राजनीतिक समीकरण और वैश्विक मंचों पर भारत के बढ़ते दबदबे के मायने

आज के आधुनिक भू-राजनीतिक परिदृश्य में अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक और रक्षात्मक साझेदारियां अपनी चरम सीमा पर हैं, लेकिन इसके बावजूद मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर अमेरिकी संस्थाओं की ओर से समय-समय पर इस तरह की टिप्पणियां सामने आती रहती हैं। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आयोगों के बयान अमेरिकी प्रशासन की आधिकारिक विदेश नीति का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, बल्कि विभिन्न दबाव समूहों और राजनीतिक Lobbies के प्रभाव का परिणाम होते हैं। भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और मजबूत आर्थिक विकास के बल पर इन सभी बयानों से बेअसर होकर लगातार आगे बढ़ रहा है। आने वाले समय में भी यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय न्यायपालिका इन बहुचर्चित मामलों में क्या अंतिम निर्णय लेती है और वैश्विक मानवाधिकार के मोर्चे पर कूटनीतिक संवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।