ऑफिस में लगातार तारीफ मिलने के बाद भी अंदर से क्यों सताता रहता है अजीब सा डर
आज की इस तेज रफ्तार और गला काट प्रतियोगिता वाले कॉरपोरेट युग में सफलता पाना और ऑफिस में अपनी एक अलग पहचान बनाना हर पेशेवर कर्मचारी का सपना होता है। दिन-रात मेहनत करके जब किसी प्रोजेक्ट में बड़ी सफलता मिलती है या खुद बॉस और सहकर्मी आपके काम की खुली तारीफ करते हैं, तो किसी भी आम इंसान का सीना गर्व से चौड़ा हो जाना स्वाभाविक है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसे अजीब और अजीबोगरीब मानसिक अनुभव से गुजरे हैं कि जब लोग आपकी तारीफ कर रहे हों, तब बाहर से मुस्कुराते हुए भी अंदर ही अंदर आपके मन में एक ऐसा डर बैठ जाता है कि आप इस सफलता के असली हकदार नहीं हैं और एक दिन सब कुछ पोल खुल जाएगी? यदि हां, तो आप अकेले नहीं हैं, क्योंकि दुनिया भर के लाखों कामकाजी पेशेवर और यहां तक कि बड़े-बड़े सीईओ भी इस मनोवैज्ञानिक स्थिति से जूझते हैं, जिसे आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में 'इम्पोस्टर सिंड्रोम' (Imposter Syndrome) कहा जाता है। ऑफिस में लगातार शानदार प्रदर्शन करने और प्रशंसा पाने के बावजूद खुद को अयोग्य या 'धोखेबाज' महसूस करने की यह अजीब मानसिक स्थिति धीरे-धीरे इंसान के मानसिक स्वास्थ्य और करियर की रफ्तार दोनों को अंदर ही अंदर खोखला करने लगती है।
मनोवैज्ञानिकों और कॉरपोरेट काउंसलर्स के अनुसार, इम्पोस्टर सिंड्रोम कोई मानसिक बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक तरह का नकारात्मक मानसिक पैटर्न है जो इंसान के अंदर छिपी असुरक्षा की भावना से पैदा होता है। इस सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति अपनी किसी भी सफलता का श्रेय अपनी मेहनत और प्रतिभा को देने के बजाय अपनी 'किस्मत' या 'तुक्के' को मानता है। उसे हमेशा यह डर सताता रहता है कि अगली बार जब कोई नया टास्क या जिम्मेदारी मिलेगी, तो वह उसमें फेल हो जाएगा और हर कोई जान जाएगा कि वह इस पद के काबिल ही नहीं था। यह मानसिक उलझन इतनी गंभीर हो सकती है कि इंसान छोटी-छोटी गलतियों को भी बहुत बड़ा पहाड़ मान लेता है और परफेक्शनिस्ट बनने के चक्कर में खुद को मानसिक रूप से पूरी तरह थका देता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि यह इम्पोस्टर सिंड्रोम क्या है, इसके क्या लक्षण हैं और इससे बाहर निकलने के लिए हमें क्या व्यावहारिक कदम उठाने चाहिए।
ऑफिस में कब और कैसे उभरती है इम्पोस्टर सिंड्रोम की भावना?
इम्पोस्टर सिंड्रोम आमतौर पर तब ज्यादा सिर उठाता है जब कोई कर्मचारी अपनी नौकरी बदलता है, उसे नया प्रमोशन मिलता है या फिर उसे किसी बड़े और चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट की लीडरशिप सौंपी जाती है। बाहरी दुनिया को वह व्यक्ति बहुत कॉन्फिडेंट और सफल नजर आता है, लेकिन पर्दे के पीछे उसका दिमाग लगातार खुद को दूसरों से कम आंक रहा होता है। वह अपने सहकर्मियों की सफलताओं को देखकर उनसे अपनी तुलना करता है और यह सोचता है कि बाकी लोग उससे कहीं अधिक बुद्धिमान और सक्षम हैं। जब भी ऑफिस में कोई मीटिंग होती है या प्रेजेंटेशन देना होता है, तो उसके मन में यह विचार बार-बार आता है कि इस बार पोल खुलने ही वाली है। इस तरह का लगातार मानसिक दबाव इंसान को धीरे-धीरे एंग्जायटी (Anxiety), डिप्रेशन और बर्नआउट (Burnout) की तरफ धकेल देता है, जिससे उसकी प्रोडक्टिविटी पर भी बुरा असर पड़ने लगता है।
इम्पोस्टर सिंड्रोम से निपटने और खुद को मानसिक रूप से मजबूत बनाने के आसान तरीके
यदि आप भी कभी-कभार या अक्सर इस तरह के मानसिक द्वंद्व का शिकार होते हैं, तो घबराने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि कुछ आसान और प्रभावी मानसिक बदलावों से इस पर पूरी तरह काबू पाया जा सकता है। सबसे पहले, अपने अंदर की आलोचनात्मक आवाज (Inner Critic) को पहचानें और जब भी मन में यह ख्याल आए कि आप इसके लायक नहीं हैं, तो खुद को अपनी पिछली सफलताओं की याद दिलाएं। अपनी उपलब्धियों की एक लिस्ट बनाएं और देखें कि आपने अपनी मेहनत और काबलियत से क्या-क्या हासिल किया है। इसके अलावा, अपने डर को अपने तक सीमित रखने के बजाए अपने किसी भरोसेमंद दोस्त, पार्टनर या मेंटर के साथ साझा करें, क्योंकि मन की बात शेयर करने से आधा बोझ वैसे ही हल्का हो जाता है। परफेक्शन के भ्रम को छोड़ें और यह स्वीकार करें कि गलती करना हर इंसान का स्वभाव है और गलतियों से सीखकर ही आगे बढ़ा जाता है। अपनी सफलताओं का जश्न मनाएं और खुद पर भरोसा रखें, क्योंकि आप अपनी मेहनत के दम पर ही इस मुकाम तक पहुंचे हैं।