'वंदे मातरम्' न गाने पर नहीं होनी चाहिए आपराधिक सजा: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

'वंदे मातरम्' न गाने पर नहीं होनी चाहिए आपराधिक सजा: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' (Vande Mataram) के गायन को अनिवार्य करने और न गाने पर दंडात्मक कार्रवाई के नए प्रावधानों को लेकर शुरू हुआ कानूनी विवाद अब देश की शीर्ष अदालत पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से उस याचिका पर औपचारिक जवाब दाखिल करने को कहा है, जिसमें 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971' में वर्ष 2026 में किए गए हालिया संशोधन और गृह मंत्रालय के आदेशों को चुनौती दी गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने इस मामले में अहम मौखिक टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति धार्मिक मान्यताओं या अंतरात्मा की आवाज (Conscientious objection) के चलते इसे नहीं गाता, उसके खिलाफ कोई दंडात्मक या आपराधिक कार्रवाई (Penal consequences) नहीं होनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

'राष्ट्रगीत क्या हो यह तय करना कोर्ट का काम नहीं, पर सजा पर होगी समीक्षा'

मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने साफ किया कि राष्ट्रीय गीत की अंतर्वस्तु क्या होनी चाहिए—उसमें दो अंतरे हों या पूरे छह अंतरे—यह तय करना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र (Remit) में नहीं आता। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह तय करना सरकार और विधायिका का काम है कि देश का राष्ट्रगीत क्या है और उससे जनभावनाएं कैसे जुड़ी हैं।

हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह इस बात की न्यायिक समीक्षा जरूर करेगी कि क्या किसी नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था या अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगीत न गाने पर जेल में डाला जा सकता है। पीठ ने वर्ष 1986 के ऐतिहासिक 'बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य' (Bijoe Emmanuel case) फैसले की नजीर देते हुए कहा कि उस समय तय हुआ कानून आज भी पूरे देश में लागू है। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान के समय आदरपूर्वक खड़ा रहता है लेकिन धार्मिक कारणों से उसे गाता नहीं है, तो उसे अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने उम्मीद जताई कि वर्तमान कानून भी इसी संवैधानिक सिद्धांत के तहत लागू रहेगा।

टीएम कृष्णा की याचिका: 6 अंतरों की अनिवार्यता और 3 साल जेल के प्रावधान पर सवाल

कर्नाटक संगीत के जाने-माने गायक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता टी. एम. कृष्णा (T.M. Krishna) ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह याचिका दाखिल की है। याचिका में मुख्य रूप से 2026 के संशोधन कानून की धारा 3 और गृह मंत्रालय द्वारा जारी सर्कुलर को चुनौती दी गई है:

  1. धार्मिक संदर्भों का आरोप: याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वंदे मातरम् के अंतिम चार अंतरों (Stanzas 3 to 6) में प्रत्यक्ष रूप से हिंदू देवी-देवताओं (दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती) का आह्वान किया गया है। ऐसे में गैर-हिंदू या अन्य धार्मिक मान्यताओं के नागरिकों को इसे गाने के लिए बाध्य करना संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) व अनुच्छेद 19(1)(ए) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का सीधा उल्लंघन है।

  2. तीन साल की जेल का कड़ा नियम: नए संशोधन के तहत जानबूझकर राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के गायन को रोकने अथवा ऐसी सभा में व्यवधान पैदा करने पर 3 साल तक की कैद या जुर्माने का प्रावधान किया गया है। याचिका में कहा गया कि स्पष्ट परिभाषा के अभाव में इस प्रावधान का दुरुपयोग नागरिकों को प्रताड़ित करने के लिए किया जा सकता है।

  3. 1937 के कांग्रेस प्रस्ताव का हवाला: याचिका में याद दिलाया गया कि वर्ष 1937 में ही राष्ट्रीय सहमति बनाते हुए राष्ट्रीय कार्यक्रमों में केवल पहले दो अंतरों को ही गाने की व्यवस्था बनाई गई थी, ताकि सभी धर्मों की भावनाएं आहत न हों।

पूर्व चीफ जस्टिस डॉ. एस. मुरलीधर की दलील: 'कानून में राष्ट्रगीत की परिभाषा ही नहीं'

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए ओडिशा हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एवं वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने कानून की विसंगतियों पर जोरदार बहस की। उन्होंने कहा कि कानून में 'राष्ट्रगीत' (National Song) की कोई स्पष्ट वैधानिक परिभाषा तक नहीं दी गई है। केवल गृह मंत्रालय ने एक सामान्य कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) जारी कर इसे पूरे छह अंतरों के साथ अनिवार्य कर दिया, जिसे सरकारी गजट तक में प्रकाशित नहीं किया गया।

मुरलीधर ने जोर देकर कहा कि कोई भी आपराधिक दंडात्मक कानून अस्पष्ट (Vague) नहीं हो सकता। जब तक किसी चीज की विधिक परिभाषा तय न हो, तब तक उसके उल्लंघन पर सजा का प्रावधान करना कानून के शासन के विपरीत है।

केंद्र का रुख: 'औपचारिक नोटिस से सनसनी फैलेगी', अदालत ने दो हफ्ते में मांगा पक्ष

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से अनुरोध किया कि इस संवेदनशील मामले में कोई औपचारिक नोटिस जारी न किया जाए, क्योंकि इससे अनावश्यक विवाद और सनसनी (Sensation) पैदा होगी। उन्होंने कहा कि याचिका की प्रति उन्हें सौंप दी जाए और सरकार सीधे अपना रुख स्पष्ट कर देगी।

पीठ ने सॉलिसिटर जनरल की दलीलों को सुनते हुए याचिका की प्रति सरकार को हस्तगत कराने और दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह देश की भावनाओं और राष्ट्रीय गौरव का पूरा सम्मान करती है, लेकिन नागरिक स्वतंत्रताओं और अंतरात्मा के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी अदालत का सर्वोच्च संवैधानिक कर्तव्य है। इस मामले की अगली सुनवाई अब 12 अक्टूबर को तय की गई है।