बायोमेट्रिक जांच में खुली पोल, एक सॉल्वर गिरफ्तार, दूसरा मुख्य आरोपी फरार
उत्तराखंड के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS Rishikesh) में सरकारी नौकरी पाने के नाम पर चल रहे एक बड़े फर्जीवाड़े और शातिर खेल का खुलासा हुआ है। एम्स की CRE-3 भर्ती प्रक्रिया के दौरान जब प्रशासन ने पारदर्शिता बरतते हुए कड़ाई से जांच शुरू की, तो बायोमेट्रिक सत्यापन (Biometric Verification) के दौरान एक चौंकाने वाला मामला सामने आया। परीक्षा किसी और ने दी थी और नौकरी की कुर्सी पर कोई दूसरा शख्स बैठने की फिराक में था। इस हाई-प्रोफाइल खुलासे के बाद से मेडिकल संस्थान से लेकर पुलिस प्रशासन तक में हड़कंप मच गया है। एम्स प्रशासन की शिकायत पर स्थानीय पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मौके से एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि इस पूरे फर्जी रैकेट का मास्टरमाइंड और असली फायदा उठाने वाला दूसरा आरोपी अभी भी पुलिस की पकड़ से दूर फरार चल रहा है।
कैसे खुली पोल? बायोमेट्रिक जांच के दौरान पकड़ा गया सॉल्वर का खेल
पूरी घटना का खुलासा तब हुआ जब एम्स ऋषिकेश में वायरमैन (Wireman) के पदों पर हुई CRE-3 भर्ती प्रक्रिया के तहत शॉर्टलिस्ट किए गए अभ्यर्थियों का बायोमेट्रिक मिलान किया जा रहा था। दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया के दौरान जब विकास कुमार मीणा नाम के अभ्यर्थी की पहचान का मिलान किया गया, तो वहां मौजूद अधिकारियों के कान खड़े हो गए। कंप्यूटर स्क्रीन पर आ रहे बायोमेट्रिक आंकड़े और सामने खड़े व्यक्ति के चेहरे व दस्तावेजों की तस्वीरों में जमीन-आसमान का अंतर पाया गया। गहन पूछताछ और तकनीकी जांच में यह साफ हो गया कि परीक्षा में बैठने वाला सॉल्वर कोई और था, जबकि कागजों में हेरफेर कर नौकरी हथियाने के लिए संस्थान में कोई दूसरा व्यक्ति पहुंचा था। इस तरह के शातिर तरीके से सिस्टम को धोखा देने की कोशिश ने चयन प्रक्रिया की सुरक्षा पर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पुलिस की ताबड़तोड़ कार्रवाई, राजस्थान तक जुड़े हैं इस फर्जीवाड़े के तार
मामले की गंभीरता को देखते हुए एम्स के सहायक प्रशासनिक अधिकारी ने तुरंत ऋषिकेश कोतवाली में लिखित शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र का मुकदमा दर्ज कर तुरंत अपनी टीमें गठित कर दी। पुलिस ने त्वरित दबिश देते हुए बायोमेट्रिक सत्यापन के लिए पहुंचे अशोक कुमार मीणा (निवासी दौसा, राजस्थान) को धर दबोचा। अदालत में पेश करने के बाद उसे न्यायिक हिरासत में जिला कारागार देहरादून भेज दिया गया है। वहीं, इस पूरी धोखाधड़ी का मुख्य लाभार्थी और वांछित आरोपी विकास कुमार मीणा घटना के सामने आने के बाद से ही भूमिगत हो गया है। पुलिस उसकी गिरफ्तारी के लिए लगातार संभावित ठिकानों पर छापेमारी कर रही है।
क्या अन्य परीक्षाओं और भर्तियों में भी हुई है इस गैंग द्वारा सेंधमारी?
इस ताजा खुलासे के बाद से जांच एजेंसियों का दायरा और अधिक बड़ा कर दिया गया है। पुलिस अब यह खंगालने की कोशिश कर रही है कि क्या इस गिरفت में केवल यही एक पद प्रभावित था या फिर इस अंतर-राज्यीय सॉल्वर गैंग (Solver Gang) ने एम्स और अन्य संस्थानों की पिछली परीक्षाओं में भी इसी तरह की अवैध सेंधमारी की है। राजस्थान और उत्तराखंड के बीच सक्रिय इस तरह के सिंडिकेट युवाओं को आसानी से सरकारी नौकरी दिलाने का झांसा देकर मोटी रकम वसूलते हैं। पुलिस अब पकड़े गए आरोपी से पूछताछ के आधार पर उन अन्य चेहरों की तलाश कर रही है जो इस काले कारोबार के पीछे मुख्य सूत्रधार के रूप में काम कर रहे हैं।
सख्त निगरानी और भविष्य के लिए कड़े प्रशासनिक कदम
इस घटना के सामने आने के बाद देश भर के चिकित्सा संस्थानों और भर्ती बोर्डों के लिए यह स्पष्ट हो गया है कि चयन प्रक्रियाओं में बायोमेट्रिक और आधार आधारित मल्टी-लेवल वेरिफिकेशन कितना जरूरी है। यदि एम्स प्रशासन ने इस चरण में सतर्कता न बरती होती, तो एक अपात्र और फर्जी तरीके से आया व्यक्ति अंदरूनी सिस्टम का हिस्सा बन जाता। एम्स ऋषिकेश के प्रबंधन ने साफ किया है कि संस्थान में भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े के लिए कोई जगह नहीं है, और ऐसे मामलों में लिप्त हर एक शख्स के खिलाफ कानून के मुताबिक सबसे कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।