कश्मीर-सिंधु संधि पर चर्चा और असीम मुइज्जू से मुलाकात से क्षेत्रीय राजनीति में हलचल

कश्मीर-सिंधु संधि पर चर्चा और असीम मुइज्जू से मुलाकात से क्षेत्रीय राजनीति में हलचल

दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों में इस समय एक नया और दिलचस्प मोड़ आ गया है, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के कूटनीतिक गलियारों में गहरी चिंता और चर्चा पैदा कर दी है। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू अपनी तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पहुंचे हैं। इस हाई-प्रोफाइल दौरे के दौरान जहाँ एक तरफ पाकिस्तान और मालदीव के बीच रक्षा और व्यापार समेत करीब 20 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, वहीं दूसरी तरफ बंद दरवाजों के पीछे हुई बैठकों में कश्मीर का मुद्दा और भारत से जुड़ी सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) जैसे संवेदनशील विषय भी उठाए गए। इस मुलाकात के बाद विश्लेषकों के मन में यह बड़ा सवाल उठने लगा है कि क्या मालदीव के राष्ट्रपति अब चीन के बाद पाकिस्तानी सेना और वहां के जनरलों की रणनीतिक चालों के पाले में पूरी तरह खड़े होते जा रहे हैं?

इस्लामाबाद में कूटनीतिक वार्ताओं का दौर और पाकिस्तान की पुरानी रोटियां सेंकने की कोशिश

पाकिस्तान की सरजमीं पर कदम रखते ही राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू का औपचारिक स्वागत किया गया, लेकिन इस कूटनीतिक यात्रा के असली मायने तब सामने आए जब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और अन्य शीर्ष नेतृत्व के साथ द्विपक्षीय बैठकें शुरू हुईं। मुलाकातों के दौरान पाकिस्तान ने एक बार फिर अपनी आदत से मजबूर होकर भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्तेमाल किए जाने वाले बयानों को दोहराया। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने खुले तौर पर कश्मीर विवाद और भारत द्वारा सिंधु जल संधि को लेकर उठाए गए कदमों पर अपनी स्थिति का जिक्र किया। मालदीव जैसे छोटे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिंद महासागर के द्वीपीय देश के प्रमुख के सामने इन मुद्दों को उठाना इस बात का साफ संकेत है कि पाकिस्तान क्षेत्रीय राजनीति में भारत के खिलाफ एक नया कूटनीतिक घेरा तैयार करने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर से मुलाकात और रक्षा समझौतों के गहरे मायने

इस यात्रा का सबसे विवादास्पद और चर्चा का विषय वह गुप्त और उच्च स्तरीय बैठक रही, जो मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू और पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर के बीच संपन्न हुई। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, मैरीटाइम सिक्योरिटी (समुद्री सुरक्षा) और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान जैसे विषयों पर कई अहम समझौते किए गए। जानकारों का मानना है कि जिस तरह से मालदीव की वर्तमान सरकार ने भारत के साथ अपने पारंपरिक और पुराने संबंधों को दरकिनार कर बीजिंग और अब इस्लामाबाद के साथ नजदीकी बढ़ाई है, वह हिंद महासागर की सुरक्षा के लिए एक बड़ा बदलाव है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख के साथ मुइज्जू की इस सिंडिकेट बैठक ने यह साबित कर दिया है कि मालदीव अब कूटनीतिक रूप से भारत विरोधी ताकतों के प्रभाव क्षेत्र में तेजी से समाता जा रहा है।

भारत के खिलाफ क्षेत्रीय ध्रुवीकरण और सार्क (SAARC) के बहाने नई चालें

अपनी इस यात्रा के दौरान राष्ट्रपति मुइज्जू ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी सार्क (SAARC) के पुनरुद्धार की बात भी जोर-शोर से उठाई। कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान हमेशा से सार्क मंच का इस्तेमाल भारत पर दबाव बनाने के लिए करता रहा है, और मालदीव के राष्ट्रपति द्वारा इस मुद्दे को पाकिस्तान की जमीन से उठाना इस बात की ओर इशारा करता है कि दोनों देश मिलकर भारत को क्षेत्रीय स्तर पर असहज करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। हालांकि, भारत सरकार और विदेश मंत्रालय इन तमाम गतिविधियों पर बेहद पैनी और गंभीर नजर बनाए हुए है। भारत अच्छी तरह जानता है कि हिंद महासागर में अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं और रणनीतिक हितों की रक्षा कैसे करनी है, और इस तरह के बाहरी गठजोड़ क्षेत्रीय स्थिरता पर कितना असर डाल सकते हैं।

मालदीव की जनता के लिए कूटनीतिक असंतुलन कितना फायदेमंद?

भले ही मालदीव सरकार और पाकिस्तान ने अपने इस दौरे को द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक सहयोग का नाम दिया हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मालदीव की अर्थव्यवस्था इस समय आंतरिक मोर्चे पर कई तरह की चुनौतियों से जूझ रही है। भारत हमेशा से मालदीव का सबसे पहला और संकट के समय मददगार साबित होने वाला सच्चा पड़ोसी रहा है। इतिहास गवाह है कि जब भी मालदीव पर कोई आपदा या आर्थिक संकट आया, तो सबसे पहले भारत ने ही मदद का हाथ बढ़ाया। ऐसे में, राजनीतिक फायदों के लिए पाकिस्तान की गोद में बैठने की यह नीति आने वाले समय में मालदीव के लिए कूटनीतिक और आर्थिक रूप से भारी पड़ सकती है। हिंद महासागर की शांति और सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि इस क्षेत्र के देश बाहरी भटकाव से दूर रहें, लेकिन मुइज्जू का यह कदम दक्षिण एशिया के कूटनीतिक संतुलन के लिए एक बड़ा झटका जरूर साबित हो रहा है।