पाकिस्तानी फौज के साथ नजदीकी रिश्ते बनाने पर असंतोष
दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक गलियारों से एक बेहद संवेदनशील और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है, जिससे पता चलता है कि पड़ोसी देश बांग्लादेश की सेना के भीतर आंतरिक हलचल और बगावत की बू आने लगी है। पिछले कुछ महीनों में बांग्लादेश की अंतरिम व्यवस्था और रक्षा तंत्र के भीतर ऐसे कई घटनाक्रम तेजी से बदले हैं, जिससे वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से लेकर आम जवानों तक में भारी बेचैनी और नाराजगी का माहौल बन गया है। इस आंतरिक तनाव की सबसे बड़ी वजह पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) के साथ बढ़ती रणनीतिक और गोपनीय नजदीकियां बताई जा रही हैं। कभी 1971 के मुक्ति संग्राम के ऐतिहासिक और खूनी संघर्ष में पाकिस्तान के जुल्मों का शिकार रही बांग्लादेशी सेना के भीतर आज अचानक से पुरानी विरोधी ताकतों के साथ हाथ मिलाने की कोशिशों ने देश के राष्ट्रवादियों और पेशेवर सैनिकों को झकझोर कर रख दिया है।
1971 के घावों को भूलकर पाकिस्तानी फौज से दोस्ती: पेशेवर सैन्य अधिकारियों में क्यों भड़का है गुस्सा?
बांग्लादेश की सेना को दुनिया भर में एक अनुशासित और पेशेवर सैन्य बल के रूप में जाना जाता रहा है, जिसने अपनी संप्रभुता और देश के गौरव की रक्षा के लिए भारी बलिदान दिए हैं। लेकिन हाल के दिनों में जिस प्रकार राजनीतिक बदलाव के बाद रक्षा नीतियों में यू-टर्न लिया गया है और पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों के साथ गुप्त बैठकों तथा रक्षा संपर्कों का दौर शुरू हुआ है, उसने सेना के भीतर वैचारिक संघर्ष को जन्म दे दिया है। युवा और मध्यम स्तर के कई सैन्य अधिकारियों का मानना है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी तरह की सैन्य नजदीकी न केवल बांग्लादेश के स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों के बलिदान का अपमान है, बल्कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता के लिए भी एक गंभीर खतरा है। यही कारण है कि छावनियों के भीतर दबी जुबान से विरोध के सुर उठने लगे हैं और अधिकारी इस बात से चिंतित हैं कि कहीं देश की रक्षा प्रणाली को किसी बाहरी और निहित स्वार्थी राजनीतिक एजेंडे के अधीन तो नहीं किया जा रहा है।
रक्षा गलियारों में गुप्त बैठकों का दौर और भारत-विरोधी बयानों से बढ़ रही असहजता
सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारी के मुताबिक, ढाका के सैन्य मुख्यालयों और छावनियों में इन दिनों रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर गंभीर मतभेद उभरकर सामने आए हैं। कुछ ऐसे तत्व जो वैचारिक रूप से कट्टरपंथी सोच रखते हैं, वे लगातार पाकिस्तानी और अन्य बाहरी ताकतों के इशारे पर सामरिक समझौतों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके विपरीत, बड़ी संख्या में ऐसे सैन्य कमांडर और सैनिक मौजूद हैं जो भारत के साथ पारंपरिक और मैत्रीपूर्ण संबंधों को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक मानते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि भारत के साथ भौगोलिक निकटता और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक रिश्तों को ताक पर रखकर पाकिस्तान के साथ यारी बढ़ाना बांग्लादेश के दीर्घकालिक आर्थिक और सामरिक हितों के लिए घातक साबित होगा। इन अंतर्विरोधों के कारण सैन्य बल के भीतर कमान और नियंत्रण को लेकर गंभीर असहजता का माहौल पैदा हो गया है, जिसे छुपाना अब रक्षा विश्लेषकों के लिए भी मुमकिन नहीं रहा है।
आंतरिक बगावत की आशंका और क्षेत्रीय भू-राजनीति पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभाव
बांग्लादेशी सेना के भीतर सुलग रही इस असंतोष की आग ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों की नींद उड़ा दी है। यदि यह आंतरिक असंतोष जल्द ही शांत नहीं हुआ या इसे सही तरीके से नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह सेना के भीतर एक बड़े विद्रोह या तख्तापलट के रूप में भी फूट सकता है। एक तरफ जहां देश की जनता पहले से ही आर्थिक और राजनीतिक अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है, वहीं दूसरी तरफ देश के सबसे बड़े और मजबूत स्तंभ यानी सेना के भीतर फूट पड़ना पूरे देश को अराजकता की तरफ धकेल सकता है। कूटनीतिक एक्सपर्ट्स का यह भी मानना है कि यदि पाकिस्तानी दखलअंदाजी बांग्लादेश के रक्षा मामलों में इसी तरह बढ़ती रही, तो इससे दक्षिण एशिया का पूरा सुरक्षा संतुलन बिगड़ जाएगा, जिसका सीधा असर भारत की सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति पर भी पड़ना तय है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि बांग्लादेश का रक्षा नेतृत्व इस आंतरिक असंतोष और बगावत के खतरों से कैसे निपटता है।