भारत आतंकवाद का हवाला देकर नहीं रोक सकता सिंधु का पानी
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जल कूटनीति और सिंधु जल संधि (IWT) को लेकर एक बार फिर वैश्विक बहस तेज हो गई है। इस बीच एक डच जल विशेषज्ञ का बड़ा और चौंकाने वाला बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि भारत केवल सीमा पार आतंकवाद का हवाला देकर या अपनी मर्जी से सिंधु नदी के पानी के प्राकृतिक प्रवाह को पूरी तरह रोक नहीं सकता है। इस बयान के सामने आने के बाद दक्षिण एशिया की भू-राजनीति और जल सुरक्षा के मुद्दों पर सरगर्मी काफी बढ़ गई है। विशेषज्ञ ने इस संवेदनशील माहौल के बीच पाकिस्तान को भी कुछ अहम और व्यावहारिक सलाह दी है कि इस संकट से निपटने के लिए इस्लामाबाद को कूटनीतिक और तकनीकी मोर्चे पर क्या रुख अपनाना चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि की समीक्षा, उसमें बदलाव और उसके प्रावधानों को लेकर लगातार तीखी बयानबाजी चल रही है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव का दायरा और अधिक व्यापक होता जा रहा है।
सिंधु जल संधि और अंतरराष्ट्रीय जल कानूनों का कड़ा दायरा
विशेषज्ञों के अनुसार, 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि (IWT) दुनिया की सबसे सफल, टिकाऊ और ऐतिहासिक जल-बंटवारा संधियों में से एक मानी जाती रही है। डच एक्सपर्ट का यह तर्क है कि इस संधि के तहत दोनों पड़ोसी देशों के अधिकार, दायित्व और भौगोलिक सीमाएं बहुत ही स्पष्ट रूप से तय की गई हैं। संधि के नियमों के मुताबिक, भारत को पश्चिमी नदियों (यानी सिंधु, झेलम और चेनाव) के पानी के कृषि और अन्य उपयोग का सीमित अधिकार तो मिला है, लेकिन वह इसके स्वाभाविक और निरंतर प्रवाह को पूरी तरह से बाधित या अवरुद्ध नहीं कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय जल कानूनों और संधि की मूल शर्तों के दायरे में रहते हुए किसी भी एक पक्ष द्वारा एकतरफा तरीके से पानी रोकने या मोड़ने के फैसले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों या मध्यस्थता मंचों पर कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है। यही मुख्य वजह है कि दुनिया भर के जल विशेषज्ञ किसी भी एकतरफा कार्रवाई के बजाय द्विपक्षीय बातचीत और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पूर्ण पालन पर जोर देते हैं।
आतंकवाद और जल सुरक्षा के मुद्दों को आपस में न जोड़ने की बड़ी दलील
डच जल विशेषज्ञ का मुख्य और सबसे बड़ा तर्क यह है कि सिंधु जल संधि एक तकनीकी, कानूनी और मानवीय जल-बंटवारा समझौता है, जिसका संबंध सीधे तौर पर दोनों देशों की करोड़ों बेकसूर आबादी की कृषि, आजीविका और पेयजल आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ है। उनका मानना है कि भारत द्वारा सीमा पार आतंकवाद के विरोध में कड़े कूटनीतिक और सैन्य कदम उठाए जाने के बावजूद, जल जैसे जीवन-आधारित प्राकृतिक संसाधन को सीधे तौर पर कूटनीतिक हथियार या सजा के तौर पर उपयोग करना अंतरराष्ट्रीय संधियों के प्रावधानों और भावना के अनुकूल नहीं है। हालांकि, भारत का घरेलू रुख और कूटनीतिक रणनीतिकार यह पूरी दृढ़ता से मानते रहे हैं कि "खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते," लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जल विशेषज्ञ लगातार यह चेतावनी देते रहे हैं कि इस तरह के द्विपक्षीय समझौतों से एकतरफा हटना या उनका उल्लंघन करना पूरे दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर और भयानक परिणाम पैदा कर सकता है।
पाकिस्तान के लिए डच एक्सपर्ट की खास सलाह और कूटनीतिक विकल्प
इस पूरे गरमागरम घटनाक्रम के बीच डच एक्सपर्ट ने पाकिस्तान को भी अपनी घरेलू व्यवस्था सुधारने के लिए कड़ी नसीहत दी है। उनका कहना है कि पाकिस्तान को केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर रोना रोने या भारत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के बजाय अपनी खुद की घरेलू जल प्रबंधन प्रणाली, पुरानी नहर प्रणालियों और बुनियादी ढांचे में भारी सुधार करने की सख्त जरूरत है। पाकिस्तान में पानी की अत्यधिक बर्बादी, वाटर मैनेजमेंट की भारी कमी और बुनियादी ढांचे के कुप्रबंधन के कारण देश का आंतरिक जल संकट और अधिक खतरनाक रूप से गहराता जा रहा है। विशेषज्ञ का स्पष्ट सुझाव है कि पाकिस्तान को कूटनीतिक और कानूनी मोर्चे पर सिंधु जल संधि के प्रावधानों का मजबूती से पालन करते हुए भारत के साथ तकनीकी स्तर पर बातचीत के रास्ते हमेशा खुले रखने चाहिए, ताकि आपसी अविश्वास की खाई को कम किया जा सके और भविष्य के भीषण जल संकट से समय रहते निपटा जा सके।
भारत-पाक द्विपक्षीय संबंधों और भविष्य की जल कूटनीति की दिशा
सिंधु जल संधि का यह पूरा विवाद केवल दो देशों के बीच पानी के बंटवारे का कोई साधारण मामला नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की संपूर्ण भू-राजनीति का एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण स्तंभ है। जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और नदियों में पानी की उपलब्धता अनिश्चित होती जा रही है, वैसे-वैसे इस ऐतिहासिक संधि की प्रासंगिकता, सीमाओं और प्राधिकार पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। भारत लगातार इस बात पर पुरजोर जोर दे रहा है कि बदलती हुई पर्यावरणीय परिस्थितियों और आतंकवाद के लगातार साए में इस संधि में व्यापक, निष्पक्ष और कड़े संशोधन की सख्त जरूरत है। दूसरी ओर, डच विशेषज्ञ के इस चर्चित बयान ने यह साबित कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय जल समझौतों को बदलना या उनसे रातों-रात हटना इतना आसान नहीं है। आने वाले दिनों में भारत और पाकिस्तान के बीच जल कूटनीति का यह पेंच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक नया और कड़ा संघर्ष देखने को मिल सकता है, जिस पर पूरी दुनिया की पैनी नजर टिकी हुई है।