अमेरिका की तीन शर्तों को भारत ने किया खारिज
दुनिया की दो सबसे बड़ी लोकतांत्रिक ताकतों—भारत और अमेरिका—के बीच कूटनीतिक रिश्तों में उस समय एक नया और दिलचस्प भू-राजनीतिक मोड़ आ गया जब चीन के सरकारी और मुखर अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' ने अचानक से भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की सराहना शुरू कर दी। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) के बहुप्रतीक्षित भारत दौरे से ठीक पहले ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय और विश्लेषणात्मक लेखों में दावा किया है कि नई दिल्ली ने वाशिंगटन डीसी द्वारा थोपी जा रही तीन बड़ी शर्तों और रणनीतिक दबावों को सिरे से नकार दिया है। इस चीनी दावे के सामने आने के बाद वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है कि क्या ड्रैगन इस बहाने भारत और अमेरिका के बीच खटास पैदा करने की कोशिश कर रहा है या फिर यह वाकई दक्षिण एशिया के बदलते रणनीतिक समीकरणों का एक नया सच है।
मार्को रुबियो के दौरे से पहले चीन की अचानक भारत पर मेहरबानी के मायने
अमेरिकी प्रशासन में विदेश मंत्री का पद संभालने के बाद मार्को रुबियो की यह पहली भारत यात्रा होने जा रही है, जिसे हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र (Indo-Pacific Region) के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वाशिंगटन और नई दिल्ली के संबंध पिछले कुछ वर्षों में रक्षा, अंतरिक्ष और तकनीक के मोर्चे पर काफी मजबूत हुए हैं, लेकिन रूस के साथ भारत के पुराने तेल और रक्षा व्यापार तथा अमेरिकी मानवाधिकार संबंधी आपत्तियों जैसे कुछ मुद्दों पर दोनों देशों के बीच समय-समय पर मतभेद भी उभरते रहे हैं। ऐसे संवेदनशील समय में चीन के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स द्वारा यह दावा किया जाना कि भारत ने अमेरिकी दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया है, एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है। चीनी विश्लेषक यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिका अपने सहयोगियों पर अनुचित नियंत्रण रखना चाहता है, जबकि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के साथ कोई समझौता नहीं कर रहा है।
कौन सी हैं वे तीन शर्तें जिन्हें भारत द्वारा नकारे जाने का दावा कर रहा है चीन?
चीनी मीडिया रिपोर्ट्स और अंतरराष्ट्रीय जानकारों के विश्लेषण के अनुसार, जिन तीन प्रमुख शर्तों या दबाव बिंदुओं को लेकर यह दावा किया जा रहा है, उनमें सबसे पहला बिंदु रूस के साथ भारत के सैन्य और ऊर्जा संबंध हैं। अमेरिका लंबे समय से यह चाहता रहा है कि भारत रूसी हथियारों पर अपनी निर्भरता पूरी तरह खत्म करे और मॉस्को से तेल आयात में कटौती करे। दूसरा बड़ा मुद्दा रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर भारत का तटस्थ रुख रहा है, जहां भारत ने पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद रूस की खुलकर आलोचना करने से परहेज किया है। तीसरा और अंतिम बिंदु पश्चिमी देशों के घरेलू और मानवाधिकार संबंधी मामलों में कथित दखलअंदाजी और इंडो-पैसिफिक में नाटो जैसी सैन्य संरचनाओं में भारत को सीधे तौर पर शामिल करने का दबाव माना जा रहा है। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि उसकी नीतियां किसी बाहरी दबाव के तहत नहीं, बल्कि देश के राष्ट्रीय हितों (National Interests) के आधार पर तय होती हैं।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और विदेश नीति का मूल मंत्र
भारतीय कूटनीति का इतिहास हमेशा से 'गुट-निरपेक्षता' और आधुनिक दौर में 'बहु-पक्षीय रणनीतिक स्वायत्तता' पर आधारित रहा है। भारत ने दुनिया के तमाम बड़े देशों के साथ अपने संबंधों को इस आधार पर आगे बढ़ाया है कि उसका राष्ट्रीय हित सर्वोच्च होना चाहिए। एक तरफ जहां भारत क्वाड (QUAD) समूह के माध्यम से अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर चीन की बढ़ती आक्रामकता का मुकाबला कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह ब्रिक्स (BRICS) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों पर रूस और चीन के साथ आर्थिक और क्षेत्रीय मंच साझा करता है। नई दिल्ली के इस संतुलित रुख ने पश्चिमी देशों और चीन दोनों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि भारत को किसी एक खेमे में पूरी तरह से बांधना असंभव है। यही कारण है कि जब भी अमेरिका का कोई बड़ा नेता भारत आता है, तो चीन इस तरह के मनोवैज्ञानिक और प्रोपेगेंडा वाले दावे पेश करके कूटनीतिक दबाव बनाने का प्रयास करता है।
मार्को रुबियो की यात्रा से क्या हैं वाशिंगटन और नई दिल्ली की उम्मीदें?
चीनी मीडिया के इन तमाम दावों के विपरीत, मार्को रुबियो के इस दौरे का असली एजेंडा दोनों देशों के बीच रक्षा तकनीक के हस्तांतरण (Defense Technology Transfer), सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला और समुद्री सुरक्षा को और अधिक पुख्ता करना है। अमेरिकी प्रशासन यह अच्छी तरह समझता है कि चीन को क्षेत्रीय स्तर पर संतुलित करने के लिए भारत उसका सबसे मजबूत और विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार है। इसलिए, वाशिंगटन छोटे-मोटे व्यापारिक या रणनीतिक मतभेदों को दरकिनार कर दीर्घकालिक सहयोग पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि मार्को रुबियो और भारतीय नेतृत्व के बीच होने वाली वार्ताओं में इन तमाम वैश्विक मुद्दों पर क्या ठोस सहमति बनती है और चीन के इस कूटनीतिक प्रोपेगेंडा का वास्तविकता पर कितना असर पड़ता है।