ईरान ने तोड़ी 2,000 किमी की अपनी ही कसम, अब दुनिया के आधे देश निशाने पर
मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव के बीच ईरान (Iran) ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक सुरक्षा (Global Security) समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। ईरान ने अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों (Ballistic Missiles) की मारक क्षमता पर खुद से लगाई गई 2,000 किलोमीटर की सीमा को आधिकारिक तौर पर हटा दिया है। ईरान के इस कदम को सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei) के स्पष्ट इशारे के रूप में देखा जा रहा है। अब इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) किसी भी वक्त आरपार के मूड में नज़र आ रही है। इस फैसले के बाद अब ईरान के मिसाइल न केवल पूरे मध्य पूर्व (Middle East), बल्कि यूरोप (Europe) और एशिया के कई देशों तक पहुँचने की क्षमता रखते हैं, जिससे एक नए मिसाइल संकट का खतरा पैदा हो गया है।
यह खबर दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों के लिए चौंकाने वाली नहीं है, क्योंकि ईरान पिछले कई दशकों से अपने मिसाइल कार्यक्रम को लगातार आधुनिक बना रहा है। लेकिन, 2,000 किमी की सीमा हटाने का आधिकारिक ऐलान एक बड़ी नीतिगत तब्दीली है। दरअसल, ईरान ने लंबे समय से कूटनीतिक दबाव और पश्चिमी देशों के साथ परमाणु समझौते (Nuclear Deal) की बातचीत के दौरान यह स्व-घोषित सीमा बनाए रखी थी, ताकि वह यह दिखा सके कि उसका मिसाइल कार्यक्रम केवल क्षेत्रीय सुरक्षा (Regional Security) के लिए है और वह यूरोप के लिए खतरा नहीं बनना चाहता।
हालाँकि, हाल के वर्षों में अमेरिका (USA) और इज़राइल (Israel) के साथ बढ़ते तनाव और परमाणु समझौते के भविष्य पर मंडराते बादलों ने तेहरान की सोच बदल दी है। सूत्रों के मुताबिक, यह फैसला सीधे सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई के निर्देशों पर लिया गया है, जो ईरान की सैन्य नीति के अंतिम निर्णायक हैं। खामेनेई का इशारा मिलते ही IRGC के वरिष्ठ कमांडरों ने अपनी रणनीति बदल दी। IRGC अब इस सीमा को एक कूटनीतिक बोझ मान रही थी, जिसने उनके रक्षात्मक और आक्रामक विकल्पों को सीमित कर दिया था। अब, वे स्वतंत्र रूप से ऐसी मिसाइलों का विकास और परीक्षण कर सकते हैं, जो तेहरान की रणनीतिक ज़रूरतों के मुताबिक लंबी दूरी तक मार कर सकें।
जब तक 2,000 किमी की सीमा थी, ईरान की सबसे शक्तिशाली मिसाइलें भी मुख्य रूप से इज़राइल, पूरे खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region), और तुर्की या मिस्र जैसे पड़ोसी देशों के कुछ हिस्सों को ही निशाना बना सकती थीं। पश्चिमी यूरोप के अधिकांश हिस्से उनके दायरे से बाहर थे। लेकिन अब, यह सब बदल गया है। इस सीमा के हटने का मतलब है कि ईरान अब इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM) के विकास की दिशा में तेजी से बढ़ सकता है।
यदि ईरान सफलतापूर्वक 3,000 किमी या 4,000 किमी की मारक क्षमता वाली मिसाइलें बनाता है, तो लंदन (London), पेरिस (Paris), और बर्लिन (Berlin) जैसे यूरोपीय शहर सीधे उनके निशाने पर होंगे। यह न केवल यूरोप की सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा है, बल्कि यह उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के रक्षा समीकरणों को भी पूरी तरह से बदल देगा। इसके अलावा, भारत (India) और चीन (China) के कुछ पश्चिमी हिस्से भी ईरान के नए मिसाइल दायरे में आ सकते हैं, जिससे एशिया में भी सुरक्षा चिंताएँ बढ़ेंगी। यह एक ऐसा रणनीतिक बदलाव है, जिसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरी दुनिया के शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगा।
ईरान के इस फैसले का सबसे पहला और तीव्र असर अमेरिका और इज़राइल पर पड़ेगा। इज़राइल के लिए, यह एक अस्तित्वगत खतरा (Existential Threat) है। इज़राइल लंबे समय से तर्क दे रहा है कि ईरान एक परमाणु हथियार (Nuclear Weapon) और लंबी दूरी की मिसाइलें विकसित कर रहा है, जिनका इस्तेमाल अंततः उसे नष्ट करने के लिए किया जा सकता है। अब जब ईरान ने अपनी मिसाइल सीमा हटा दी है, तो इज़राइल के पास अपने रक्षात्मक विकल्पों पर पुनर्विचार करने और शायद ईरान के सैन्य ठिकानों के खिलाफ निवारक कार्रवाई (Preventive Action) पर विचार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
अमेरिका के लिए भी, यह फैसला एक बड़ी सिरदर्दी है। राष्ट्रपति जो बाइडेन (Joe Biden) की सरकार ईरान के साथ 2015 के परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है। ईरान ने अपनी मिसाइल क्षमता को वार्ता की मेज पर रखने से हमेशा इनकार किया है। अब, इस सीमा को हटाकर, ईरान ने अमेरिका को एक स्पष्ट संदेश दिया है: यदि आप हमारी परमाणु शर्तों को नहीं मानते हैं और हम पर प्रतिबंध जारी रखते हैं, तो हम अपनी मिसाइल क्षमता को बढ़ाते रहेंगे और अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों के लिए खतरा बनते रहेंगे। यह ईरान को वार्ता में एक मज़बूत स्थिति (Upper Hand) देता है और अमेरिका के लिए एक जटिल कूटनीतिक चुनौती पेश करता है।
ईरान के इस कदम पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया अभी आनी बाकी है, लेकिन यह निश्चित है कि पश्चिमी देश इस फैसले की कड़ी निंदा करेंगे। यूरोप के प्रमुख देश, जो अब तक ईरान के साथ परमाणु वार्ता को बचाने की कोशिश कर रहे थे, अब ईरान पर और भी कड़े प्रतिबंध लगाने और उसे कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने के लिए अमेरिका के साथ हाथ मिला सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) में भी इस मुद्दे पर तीखी बहस हो सकती है।
लेकिन क्या प्रतिबंधों से ईरान रुकेगा? यह एक बड़ा सवाल है। ईरान पहले से ही दुनिया के सबसे भारी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और उसने अपने मिसाइल कार्यक्रम को इन प्रतिबंधों के बावजूद विकसित किया है। इस नए फैसले के बाद, एक नई हथियारों की दौड़ (Arms Race) का खतरा बढ़ गया है। इज़राइल, सऊदी अरब (Saudi Arabia), और अन्य खाड़ी देश अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने और शायद अपने स्वयं के मिसाइल कार्यक्रम विकसित करने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। मध्य पूर्व पहले से ही दुनिया के सबसे अस्थिर क्षेत्रों में से एक है, और ईरान का यह फैसला इस क्षेत्र में अशांति और संघर्ष को और बढ़ा सकता है। दुनिया अब एक नए मिसाइल युग के मुहाने पर खड़ी है, जहाँ तेहरान के फैसले वैश्विक सुरक्षा की नई परिभाषा तय करेंगे।