जापान ने रचा अंतरिक्ष इतिहास: मंगल के रहस्यमयी चंद्रमा पर भेजा स्पेसशिप

जापान ने रचा अंतरिक्ष इतिहास: मंगल के रहस्यमयी चंद्रमा पर भेजा स्पेसशिप

अंतरिक्ष विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान की दुनिया में जापान ने एक ऐसा मील का पत्थर छू लिया है, जिसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है। जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा (JAXA) ने एक बेहद महत्वाकांक्षी और ऐतिहासिक अंतरिक्ष मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। इस मिशन के तहत जापान ने मंगल ग्रह के सबसे बड़े चंद्रमा यानी 'फोबोस' (Phobos) के लिए अपना अत्याधुनिक स्पेसशिप रवाना किया है। अंतरिक्ष तकनीक की दौड़ में अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियां भी अभी तक जिस मुकाम पर नहीं पहुंच पाई हैं, उसे हासिल करने के लिए जापान का यह अंतरिक्षयान अब लाल ग्रह की कक्षा की तरफ लंबी छलांग लगा चुका है। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह मिशन पूरी तरह सफल रहा, तो यह मानव इतिहास में पहला ऐसा मौका होगा जब मंगल ग्रह के किसी चंद्रमा से मिट्टी और चट्टानों के अनमोल नमूने सीधे धरती पर वापस लाए जाएंगे।

क्या है MMX मिशन और कैसे काम करेगा जापानी अंतरिक्षयान?

जापान के इस ऐतिहासिक मिशन का आधिकारिक नाम 'मार्शियन मूंस एक्सप्लोरेशन' यानी MMX मिशन रखा गया है। इस अंतरिक्ष अभियान को जापान के ताकतवर एच3 रॉकेट (H3 Rocket) के जरिए तानेगाशिमा स्पेस सेंटर से अंतरिक्ष में भेजा गया है। यह स्पेसशिप लंबी यात्रा तय करते हुए वर्ष 2027 के मध्य तक मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचेगा। इसके बाद यह अंतरिक्षयान मंगल ग्रह के दोनों चंद्रमाओं—फोबोस और डीइमोस (Deimos)—की बारीकी से परिक्रमा करेगा और उनके भूगर्भ तथा सतह का अध्ययन करेगा। इस मिशन का सबसे रोमांचक हिस्सा फोबोस की सतह पर उतरकर वहां से कम से कम 10 ग्राम या उससे अधिक की मात्रा में धूल और चट्टानों के टुकड़े एकत्र करना है। इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए स्पेसशिप में विशेष प्रकार के अत्याधुनिक सैंपलिंग टूल्स और एक छोटा रोवर भी शामिल किया गया है, जो सतह पर उतरकर वैज्ञानिक डेटा जुटाएगा।

अमेरिका और चीन को पीछे छोड़ते हुए क्यों खास है जापान का यह कदम?

वर्तमान समय में अंतरिक्ष विज्ञान को लेकर दुनिया के तमाम शक्तिशाली देशों के बीच होड़ मची हुई है, जिसमें अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रम सबसे आगे माने जाते रहे हैं। हालांकि, मंगल ग्रह की सतह तक अपने रोवर भेजने और वहां की तस्वीरें भेजने में इन देशों को सफलता जरूर मिली है, लेकिन मंगल के चंद्रमाओं तक पहुंचकर वहां से सुरक्षित सैंपल वापस धरती पर लाने का जोखिमभरा और जटिल काम अभी तक किसी ने नहीं किया है। जापानी वैज्ञानिकों ने इस अंतरिक्ष अभियान के जरिए उसी असंभव समझे जाने वाले लक्ष्य को साधने की ठान ली है। अंतरिक्ष विश्लेषकों का कहना है कि जापान की यह तकनीक और उसकी सटीक योजना अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में उसे एक नई और सर्वोच्च स्थिति पर लाकर खड़ा कर देगी, क्योंकि सीमित संसाधनों के बावजूद जापानी तकनीक की सटीकता हमेशा से पूरी दुनिया में मिसाल रही है।

साल 2031 में धरती पर वापसी और अंतरिक्ष विज्ञान में नए रहस्यों से उठेगा पर्दा

जापान का यह एमएमएक्स स्पेसशिप मंगल के चंद्रमाओं का लगभग तीन साल तक अध्ययन करने के बाद वहां की मूल्यवान मिट्टी और चट्टानों को एक विशेष हीट-प्रोटेक्टेड कैप्सूल में सील करेगा। इसके बाद यह अंतरिक्षयान वापसी की लंबी यात्रा शुरू करेगा और अनुमानित रूप से वर्ष 2031 तक इसके कैप्सूल के सुरक्षित रूप से ऑस्ट्रेलिया के रेगिस्तानी इलाके में उतरने की उम्मीद है। इन नमूनों के प्रयोगशाला में परीक्षण के बाद वैज्ञानिकों को यह समझने में आसानी होगी कि मंगल के ये चंद्रमा वास्तव में कैसे बने थे—क्या वे अंतरिक्ष से भटके हुए एस्टेरॉयड (क्षुद्रग्रह) थे जो मंगल के गुरुत्वाकर्षण में फंस गए, या फिर मंगल ग्रह से किसी प्राचीन टक्कर के बाद निकले मलबे से इनका निर्माण हुआ था। इस प्रकार यह मिशन सौर मंडल के जन्म और ग्रहों के विकास से जुड़े कई अनसुलझे रहस्यों से पर्दा उठाने में बेहद मददगार साबित होगा।