कर्ज के बोझ तले दबे देशों के UN समर्थित बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म का अध्यक्ष बना पाकिस्तान

कर्ज के बोझ तले दबे देशों के UN समर्थित बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म का अध्यक्ष बना पाकिस्तान

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मंचों पर एक बेहद महत्वपूर्ण और चर्चित घटनाक्रम के तहत पाकिस्तान को कर्ज लेने वाले विकासशील देशों के वैश्विक संगठन 'बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म' (Borrowers' Platform) की गवर्निंग काउंसिल की कमान सौंपी गई है। बैंकॉक में आयोजित विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की वार्षिक बैठकों के दौरान पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने आधिकारिक रूप से इस पदभार को स्वीकार किया। 30 से अधिक विकासशील और कर्जदार राष्ट्रों वाले इस संयुक्त राष्ट्र (UN) समर्थित प्लेटफॉर्म का नेतृत्व संभालना पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर काफी अहम माना जा रहा है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद वैश्विक वित्तीय बिरादरी में यह बहस छिड़ गई है कि आर्थिक संकट से जूझ रहा देश आखिर इस वैश्विक क्लब को किस दिशा में ले जाएगा और यह मंच कितना असरदार साबित होगा।

क्या है बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म और इसे बनाने का मुख्य उद्देश्य क्या है?

संयुक्त राष्ट्र (UN) की पहलों के तहत स्थापित 'बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म' मुख्य रूप से दुनिया के उन विकासशील देशों का एक साझा मंच है जो भारी विदेशी कर्ज, मुद्रास्फीति और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य कर्जदार देशों को एक मंच पर लाकर उनके बीच तकनीकी सहयोग बढ़ाना, कर्ज प्रबंधन की बेहतर रणनीतियों को साझा करना और पारस्परिक सीख को बढ़ावा देना है। वैश्विक वित्तीय प्रणाली में अक्सर यह देखा गया है कि अंतरराष्ट्रीय ऋणदाता एजेंसियां और बैंक अपनी शर्तों पर कर्ज प्रदान करते हैं, जिससे कमजोर अर्थव्यवस्थाओं पर भारी दबाव बनता है। ऐसे में यह प्लेटफॉर्म विकासशील देशों को एक ऐसा साझा स्थान देता है जहां वे अपनी ऋण आवश्यकताओं, रिपेमेंट शेड्यूल और आर्थिक सुधारों से जुड़े अनुभवों को एक-दूसरे के साथ साझा कर सकें।

कितना ताकतवर है UN समर्थित यह कर्जदार देशों का नया क्लब?

जब बात इस संस्था के प्रभाव और शक्तियों की आती है, तो अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि 'बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म' कोई ऐसा दबाव समूह नहीं है जो पेरिस क्लब, आईएमएफ या अंतरराष्ट्रीय साहूकारों के साथ सीधे बातचीत में कोई सख्त शर्तें थोप सके। हालांकि, इसकी ताकत सामूहिक आवाज और नीतिगत मार्गदर्शन में निहित है। 30 से अधिक देशों का प्रतिनिधित्व करने के कारण यह मंच वैश्विक वित्तीय संस्थानों के सामने विकासशील राष्ट्रों की प्राथमिकताओं को मजबूती से रखने का जरिया बनता है। यह बहुपक्षीय वित्त पोषण एजेंसियों जैसे विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक (ADB) से बेहतर ब्याज दरों और दीर्घकालिक ऋण अवधियों की मांग करने के लिए शोध आधारित रिपोर्ट और नीतियां तैयार करता है। यह कोई कर्ज माफ कराने वाला निकाय नहीं है, बल्कि कर्ज प्रबंधन क्षमता को बेहतर बनाने वाला एक वैश्विक ज्ञान मंच है।

अध्यक्ष पद मिलने के बाद पाकिस्तान के वित्त मंत्री की क्या हैं प्राथमिकताएं?

अध्यक्षता स्वीकार करते ही पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने वर्ष 2026-27 के लिए संस्था की कार्ययोजना और प्राथमिकताओं का खाका प्रस्तुत किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान का ध्यान ऋण दायित्वों के सतत प्रबंधन, पारदर्शी उधारी प्रक्रियाओं और आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा देने पर रहेगा। पाकिस्तान खुद लंबे समय से आईएमएफ कार्यक्रमों और बहुपक्षीय ऋणों के सहारे अपनी अर्थव्यवस्था को संतुलित करने के प्रयासों में जुटा है। ऐसे में पाकिस्तानी अधिकारियों का दावा है कि उनके देश के पास आर्थिक झटकों से निपटने और ऋण पुनर्गठन (Debt Restructuring) का व्यापक व्यावहारिक अनुभव है, जो अन्य सदस्य देशों के लिए बेहद मददगार साबित हो सकता है।

भू-राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से इस फैसले के क्या हैं मायने?

इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम को लेकर दक्षिण एशियाई राजनीति और वैश्विक अर्थशास्त्र के जानकारों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली हैं। एक ओर जहां पाकिस्तान के समर्थकों का मानना है कि बहुपक्षीय वित्तीय मंच पर मिली यह जिम्मेदारी देश की कूटनीतिक स्थिति को सुधारेगी, वहीं दूसरी तरफ आलोचकों का कहना है कि जो देश खुद भारी कर्ज संकट और मुद्रास्फीति से जूझ रहा हो, उसे कर्जदार राष्ट्रों का नेता बनाना एक दिलचस्प स्थिति है। बहरहाल, वैश्विक स्तर पर बढ़ती ब्याज दरों, मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव और ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान के नेतृत्व में यह प्लेटफॉर्म विकासशील देशों को कर्ज के जाल से उबारने और आर्थिक सुधारों को गति देने में कितना कारगर साबित होता है।