अफगानिस्तान पर पाकिस्तान के बेबुनियाद आरोपों का तालिबान ने दिया कड़ा जवाब
दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बार फिर से काबुल और इस्लामाबाद के बीच जुबानी जंग अपने चरम पर पहुंच गई है। पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य नेतृत्व और रक्षा तंत्र द्वारा लगातार यह दावा किया जा रहा है कि उनकी धरती पर होने वाली आतंकवादी गतिविधियों के पीछे अफगान तालिबान सरकार की शह है या अफगान जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ किया जा रहा है। इन तमाम सनसनीखेज और निराधार आरोपों पर तालिबान प्रशासन ने अब तक का सबसे आक्रामक और दो टूक रुख अपनाते हुए पाकिस्तान को आईना दिखाया है। काबुल में बैठे तालिबान के वरिष्ठ प्रवक्ताओं और नीति निर्धारकों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक विफलताओं, राजनीतिक अस्थिरता और नाकामी का ठीकरा हमेशा अफगानिस्तान के सिर फोड़ने की पुरानी और घिसी-पिसी आदत से बाज आए। तालिबान का कहना है कि अफगानिस्तान पर झूठे और मनगढ़ंत आरोप लगाने से पाकिस्तान की आतंकवाद से जुड़ी आंतरिक समस्याएं कभी हल नहीं होने वाली हैं, बल्कि इससे दोनों पड़ोसी देशों के बीच अविश्वास की खाई और अधिक गहरी होती जा रही है।
पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर के प्रोपेगैंडा और राजनीतिक पैंतरेबाजी की खुली पोल
तालिबान सरकार ने अपने आधिकारिक बयानों में सीधे तौर पर पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के बयानों और उनके द्वारा चलाए जा रहे दुष्प्रचार (Propaganda) की कलई खोलकर रख दी है। तालिबान का स्पष्ट मानना है कि जब भी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और वहां की सेना देश की अवाम को महंगाई, राजनीतिक संकट, आर्थिक बदहाली और बलूचिस्तान व खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ते आंतरिक विद्रोह से भटकाना चाहती है, तब-तब अफगानिस्तान को निशाना बनाकर एक नया प्रोपेगैंडा गढ़ दिया जाता है। पाकिस्तानी हुक्मरान अपनी जनता को यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि उनके देश में होने वाली हर आतंकी घटना का रिमोट कंट्रोल काबुल या कंधार से संचालित होता है। तालिबान ने साफ किया है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) पाकिस्तान का अपना आंतरिक संकट है, जिसे कुचलने में पाकिस्तानी सेना पूरी तरह विफल साबित हो चुकी है और अब वह अपनी इस असफलता को छुपाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अफगानिस्तान को बदनाम करने का घटिया षड्यंत्र रच रही है।
सीमा पार तनाव और दोनों देशों के बीच व्यापारिक व कूटनीतिक रिश्ते बदतर
इस लगातार बढ़ती बयानबाजी और तल्खी का सीधा असर डूरंड लाइन (Durand Line) और दोनों देशों की सीमाओं पर देखने को मिल रहा है। पाकिस्तान की तरफ से एकतरफा सीमा चौकियों को बंद करने, अफगान शरणार्थियों पर अत्याचार करने और व्यापारिक मार्ग बाधित करने की कार्रवाइयों ने स्थिति को और अधिक विस्फोटक बना दिया है। तालिबान प्रशासन ने चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तान इसी तरह दबाव बनाने की रणनीति अपनाता रहेगा और सीमा पार से सैन्य दुस्साहस का परिचय देगा, तो इसका करारा जवाब दिया जाएगा। काबुल का रुख अब पूरी तरह से कड़ा हो चुका है और वह किसी भी कीमत पर अपनी संप्रभुता से समझौता करने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर, पाकिस्तानी सेना अंदर ही अंदर इस बात से बेहद परेशान है कि वैचारिक रूप से कभी उनके अपने पाले हुए समझे जाने वाले तालिबान शासक अब उनकी किसी भी धौंस या दबाव में आने को तैयार नहीं हैं, जिससे इस्लामाबाद की क्षेत्रीय रणनीति पूरी तरह धाराशायी हो गई है।
क्षेत्रीय स्थिरता पर मंडराता खतरा और भविष्य का भू-राजनीतिक समीकरण
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच चल रहा यह तीखा गतिरोध केवल इन दोनों देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे मध्य और दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा है। चीन, ईरान और मध्य एशियाई देश भी इस बढ़ते तनाव को लेकर गहरी चिंता में हैं क्योंकि अस्थिरता का यह दौर क्षेत्रीय व्यापार और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। तालिबान ने दुनिया के सामने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि पाकिस्तान को अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं की समीक्षा करने के लिए अपनी खुफिया नीतियों में बदलाव करना होगा, न कि पड़ोसी देश पर दोष मढ़ना होगा। जब तक इस्लामाबाद अपनी पारंपरिक जिहादी प्रॉक्सी नीतियों और झूठे प्रोपेगैंडा से बाहर नहीं निकलता, तब तक सीमावर्ती इलाकों में शांति बहाल होना नामुमकिन है। यह घटनाक्रम इस बात का सबूत है कि दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के अपने ही पुराने रणनीतिक समीकरण अब उसके लिए जी का जंजाल बन चुके हैं।