हिजाब बैन विवाद में पाकिस्तान के दो सबसे करीबी सहयोगियों के बीच बढ़ा तनाव

हिजाब बैन विवाद में पाकिस्तान के दो सबसे करीबी सहयोगियों के बीच बढ़ा तनाव

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में एक अभूतपूर्व और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है, जहाँ पाकिस्तान के दो सबसे भरोसेमंद सहयोगी देश—तुर्की और अजरबैजान—हिजाब बैन के मुद्दे पर आमने-सामने आ गए हैं। मुस्लिम बहुल देशों में हिजाब और धार्मिक पहरावे को लेकर शुरू हुआ यह नीतिगत मतभेद अब एक गंभीर राजनीतिक और रणनीतिक टकराव में तब्दील हो चुका है। अजरबैजान में धर्मनिरपेक्षता (Secularism) की रक्षा के नाम पर सार्वजनिक स्थानों और शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर लागू किए गए प्रतिबंधात्मक नियमों का तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन की सरकार ने खुलकर विरोध किया था। इसके जवाब में अजरबैजान ने कड़ा रुख अपनाते हुए तुर्की को अपनी संप्रभुता और आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप न करने की सख्त चेतावनी जारी कर दी है। दोनों देशों के बीच दशकों पुरानी "एक राष्ट्र, दो राज्य" की कूटनीतिक अवधारणा इस नए वैचारिक मतभेद के कारण पूरी तरह डगमगाती हुई दिखाई दे रही है।

अजरबैजान की तुर्की को सख्त चेतावनी और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा का संकल्प

बाकू की अलियेव सरकार ने अंकारा को स्पष्ट संदेश दिया है कि अजरबैजान एक संप्रभु और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है, जिसके कानून और सामाजिक नीतियां किसी भी बाहरी धार्मिक दबाव से तय नहीं होंगी। अजरबैजान के विदेश मंत्रालय और शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व ने तुर्की की आलोचनाओं का करारा जवाब देते हुए कहा है कि देश में कट्टरपंथ और धार्मिक अतिवाद को रोकने के लिए हिजाब से जुड़े नियम पूरी तरह से आवश्यक हैं। अजरबैजान ने चेतावनी दी है कि यदि तुर्की ने अपनी घरेलू इस्लामी नीतियों को बाकू पर थोपने का प्रयास जारी रखा, तो इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक, सैन्य और ऊर्जा समझौतों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इस कड़े रुख ने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों को भी हैरत में डाल दिया है, क्योंकि अजरबैजान ने इससे पहले कभी भी तुर्की के खिलाफ इतनी सख्त बयानबाजी नहीं की थी।

एर्दोगन का कूटनीतिक धर्मसंकट और मध्य पूर्व से लेकर काकेशस तक का राजनीतिक गणित

इस पूरे विवाद ने तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन को एक बेहद जटिल कूटनीतिक और वैचारिक धर्मसंकट में फंसा दिया है। एक तरफ एर्दोगन खुद को वैश्विक मुस्लिम समुदाय (उम्माห์) के सर्वमान्य नेता और इस्लामी मूल्यों के रक्षक के रूप में पेश करने की राजनीति करते हैं, वहीं दूसरी तरफ अजरबैजान उनका सबसे बड़ा रणनीतिक और सैन्य साझेदार है। नागोर्नो-कारबाख युद्ध के दौरान तुर्की ने अजरबैजान को अत्याधुनिक ड्रोन और सैन्य सहायता देकर अर्मेनिया के खिलाफ ऐतिहासिक जीत दिलाई थी। लेकिन अब, जब बाकू में हिजाब पर प्रतिबंध को कड़ा किया जा रहा है, तो एर्दोगन के लिए अपने घरेलू धार्मिक वोट बैंक को खुश करना और अजरबैजान के साथ अपने सबसे अहम सामरिक रिश्तों को बचाना एक साथ असंभव सा साबित हो रहा है।

दक्षिण एशिया और पाकिस्तान पर इस गुटबाजी का गहरा असर

तुर्की और अजरबैजान के बीच बढ़ता यह तनाव पाकिस्तान के लिए भी एक बहुत बड़ी कूटनीतिक सिरदर्दी बन गया है। पाकिस्तान लंबे समय से तुर्की और अजरबैजान के साथ मिलकर एक मजबूत "त्रिपक्षीय रक्षा गठबंधन" बनाने की कोशिश में जुटा हुआ था। इस्लामाबाद ने कश्मीर मुद्दे से लेकर वैश्विक मंचों तक हमेशा इन दोनों देशों के साथ अपने प्रगाढ़ संबंधों का ढोल पीटा है। अब जब पाकिस्तान के ये दोनों 'परम मित्र' आपसी टकराव की राह पर चल पड़े हैं, तो पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय इस असमंजस में है कि वह किसका पक्ष ले। यदि पाकिस्तान तुर्की की इस्लामी कट्टरपंथी नीतियों का समर्थन करता है तो वह अजरबैजान जैसे महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार से दूर हो जाएगा, और यदि वह अजरबैजान के धर्मनिरपेक्ष रुख का मौन समर्थन करता है तो अंकारा के साथ उसके रिश्तों में दरार आ जाएगी। यह नया विवाद मुस्लिम जगत में सत्ता और विचारधारा के नए समीकरण गढ़ रहा है।