सौ साल के इतिहास से दुनिया को बहुत कुछ सीखने की जरूरत: इजरायली शोधकर्ता
अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक और वैचारिक गलियारों में उस समय एक दिलचस्प बहस छिड़ गई जब इजराइल के एक प्रमुख शोधकर्ता और अकादमिक विशेषज्ञ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सौ वर्षों के सफर को लेकर खुलकर अपने विचार रखे। इजरायली शोधकर्ता डॉ. ओफिरा लिविंगस्टोन ने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में आरएसएस के योगदान की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए कहा है कि इस संगठन की मूल विचारधारा और कार्यपद्धति से इजराइल की राष्ट्रवादी सोच में बहुत सी समानताएं दिखाई देती हैं। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि कैसे एक संगठन बिना किसी सरकारी संरक्षण के लगातार एक सदी तक राष्ट्र निर्माण, सांस्कृतिक संरक्षण और वैचारिक अनुशासन के मार्ग पर अडिग रह सकता है, यह दुनिया भर के राष्ट्रवादियों के लिए एक अनुकरणीय अध्ययन का विषय है।
सौ साल का ऐतिहासिक सफर और वैचारिक सुदृढ़ता का अनूठा उदाहरण
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे कर लिए हैं और इस ऐतिहासिक पड़ाव तक पहुंचने का सफर किसी भी सामाजिक संगठन के लिए आसान नहीं रहा है। इस लंबी अवधि में संगठन ने कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव, वैचारिक विरोध और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना किया है, लेकिन इसके बावजूद इसकी जमीनी पकड़ और कार्यकर्ताओं का अनुशासन लगातार मजबूत हुआ है। इजरायली शोधकर्ताओं का मानना है कि किसी भी राष्ट्र की अस्मिता को सुरक्षित रखने के लिए वैचारिक स्पष्टता उतनी ही जरूरी है जितनी कि भौतिक सुरक्षा। डॉ. लिविंगस्टोन ने अपने शोध और विश्लेषण में इस बात का उल्लेख किया है कि कैसे आरएसएस ने शाखा पद्धति के माध्यम से पीढ़ियों दर पीढ़ियों देशभक्ति और सामाजिक समरसता के संस्कार सींचे हैं, जो आधुनिक समाजों में तेजी से लुप्त हो रहे सामुदायिक भाव को पुनर्जीवित करने का काम करते हैं।
इजरायली सोच और भारतीय राष्ट्रवाद में वैचारिक समानता के बिंदु
जब इस बात की गहराई से समीक्षा की जाती है कि आखिर क्यों विदेशी शोधकर्ता भारतीय संगठनों में रुचि ले रहे हैं, तो इसके पीछे राष्ट्र-राज्य की सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा जैसे साझा मुद्दे सामने आते हैं। इजराइल एक ऐसा देश है जो अपनी स्थापना के पहले दिन से ही भौगोलिक और सामरिक चुनौतियों के बीच अपनी अस्मिता की रक्षा करता आया है। ठीक इसी प्रकार, भारत में भी सदियों के विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव से उबरकर अपनी मूल संस्कृति को पुनर्जीवित करने का संघर्ष रहा है। शोधकर्ताओं का यह मानना है कि जब कोई राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटने लगता है, तो उसका आंतरिक पतन तय माना जाता है। आरएसएस ने अपनी स्थापना के समय से ही 'राष्ट्र प्रथम' के मूल मंत्र को सर्वोपरि रखा है, जो कि इजराइल की सुरक्षा और राष्ट्रीय अखंडता की नीति से बहुत हद तक मेल खाता है।
सामाजिक समरसता, सेवा कार्य और आपदा प्रबंधन में स्वयंसेवकों की भूमिका
केवल वैचारिक चर्चाओं तक सीमित न रहकर, आरएसएस ने व्यावहारिक धरातल पर भी अपनी एक ऐसी अमिट छाप छोड़ी है जो दुनिया भर के समाजशास्त्रियों को आकर्षित करती है। देश में जब भी कोई प्राकृतिक आपदा, भूकंप, बाढ़ या महामारी जैसी बड़ी त्रासदी आई है, तो सरकारी तंत्र के पहुंचने से पहले संघ के स्वयंसेवक राहत और बचाव कार्यों में सबसे आगे खड़े नजर आते हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान हो या उससे पहले के अन्य संकटों में, स्वयंसेवकों द्वारा किए गए सेवा कार्यों ने यह साबित कर दिया है कि एक संगठित समाज किसी भी बड़ी विपत्ति का मुकाबला करने में सक्षम होता है। इजरायली शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि राष्ट्र के प्रति समर्पण की यह भावना केवल नारों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे समाज के हर वर्ग के उत्थान के लिए जमीन पर उतारना आवश्यक है, जिसे संघ ने बखूबी करके दिखाया है।
वैश्विक स्तर पर भारतीय राष्ट्रवाद और संगठनों की बढ़ती स्वीकार्यता
आज के वैश्वीकृत दौर में जब पश्चिमी विचारधाराओं और आधुनिकता के नाम पर सांस्कृतिक विरूपण बढ़ रहा है, तब अपनी प्राचीन परंपराओं और मूल्यों के साथ खड़े रहना एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे समय में आरएसएस जैसे संगठनों का प्रभाव यह संदेश देता है कि आधुनिकता और तकनीक को अपनाते हुए भी अपनी जड़ों से जुड़ा जा सकता है। इजरायली शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं का इस प्रकार भारतीय संगठनों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखना यह दर्शाता है कि दुनिया अब भारत के आंतरिक सामाजिक ताने-बाने और राष्ट्रवादी दर्शन को नए सिरे से और अधिक गहराई से समझने लगी है। आने वाले समय में इस तरह के वैचारिक आदान-प्रदान से दोनों देशों के बीच अकादमिक और सांस्कृतिक संबंधों को और अधिक मजबूती मिलने की पूरी संभावना है।