क्या कट्टर विरोधी संग गठबंधन बचाएगा राजनीतिक वजूद? जानिए विस्फोटक सच

क्या कट्टर विरोधी संग गठबंधन बचाएगा राजनीतिक वजूद? जानिए विस्फोटक सच

पाकिस्तान की डांवाडोल सियासत में एक बार फिर ऐसा अप्रत्याशित और विस्फोटक मोड़ देखने को मिल रहा है, जिसकी कल्पना कुछ समय पहले तक किसी ने नहीं की थी। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक और जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपने सबसे बड़े और पुराने राजनीतिक कट्टर प्रतिद्वंद्वी जमियत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (JUI-F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान (जिन्हें इमरान अक्सर 'मौलाना डीजल' कहकर पुकारते थे) की तरफ हाथ बढ़ाया है। रावलपिंडी की अदियाला जेल में बंद इमरान खान के राजनीतिक वजूद और रिहाई के सारे कानूनी व कूटनीतिक रास्ते जब लगभग बंद नजर आ रहे हैं, तब मौलाना फजलुर रहमान ही उनकी आखिरी उम्मीद बनकर उभरे हैं। पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कोई सामान्य राजनीतिक संवाद नहीं, बल्कि सत्ताधारी शहबाज शरीफ सरकार और शक्तिशाली सैन्य प्रतिष्ठान (Military Establishment) के खिलाफ देशव्यापी मोर्चाबंदी का एक बड़ा मास्टरप्लान है।

कट्टर दुश्मनी से रणनीतिक मजबूरी तक: क्या है इमरान-मौलाना के करीब आने की वजह?

इमरान खान और मौलाना फजलुर रहमान के बीच का राजनीतिक इतिहास बेहद कड़वा और कटु बयानों से भरा रहा है। इमरान खान वर्षों तक मौलाना पर भ्रष्ट राजनीति का आरोप लगाते रहे और उन्हें सार्वजनिक रैलियों में 'मौलाना डीजल' नाम देकर चिढ़ाते रहे, वहीं मौलाना फजलुर रहमान ने इमरान खान के खिलाफ 'आजादी मार्च' निकालकर उनकी सरकार को उखाड़ फेंकने में मुख्य भूमिका निभाई थी। लेकिन पाकिस्तान में हुए हालिया आम चुनावों में व्यापक धांधली के गंभीर आरोपों और 26वें संवैधानिक संशोधन के जरिए न्यायपालिका की शक्तियों को सीमित किए जाने के बाद स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। मौलाना फजलुर रहमान भी मौजूदा शहबाज शरीफ सरकार और सैन्य हस्तक्षेप से बेहद नाराज चल रहे हैं। ऐसे में इमरान खान ने अपनी पुरानी निजी दुश्मनी को दरकिनार करते हुए जेल से अपने वकीलों और नेताओं के जरिए मौलाना को एक साथ मिलकर सरकार विरोधी आंदोलन शुरू करने का खुला पैगाम भेजा है।

सेना और शहबाज सरकार के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की बिसात

अगर पीटीआई (PTI) और जेयूआई-एफ (JUI-F) एक साथ हाथ मिलाते हैं, तो यह इस्लामाबाद की सत्ता में बैठे हुक्मरानों और सैन्य जनरलों के लिए अब तक का सबसे बड़ा संकट बन सकता है। इमरान खान के पास भारी जनसमर्थन और युवाओं का विशाल कैडर बेस है, जबकि मौलाना फजलुर रहमान के पास पूरे देश में फैले मदरसों, धार्मिक कार्यकर्ताओं और एक बेहद अनुशासित तथा आक्रामक कार्यकर्ता नेटवर्क की ताकत है। जब पीटीआई का जनसमर्थन और मौलाना का सड़कों पर उतरने वाला जनसैलाब एक मंच पर आएंगे, तो इस्लामाबाद को पूरी तरह से ठप करना बेहद आसान हो जाएगा। पीटीआई के वरिष्ठ नेताओं के अनुसार, इस नए संभावित विपक्षी गठबंधन का मुख्य उद्देश्य इमरान खान समेत तमाम राजनीतिक बंदियों की रिहाई, निष्पक्ष चुनावों की बहाली और संविधान तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करना है।

क्या मौलाना देंगे इमरान खान का साथ? पाकिस्तान में उथल-पुथल की आशंका

इस विस्फोटक राजनीतिक घटनाक्रम के सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या मौलाना फजलुर रहमान इमरान खान के इस प्रस्ताव को पूरी तरह स्वीकार करेंगे या इसे अपनी सौदेबाजी (Bargaining Chip) के रूप में इस्तेमाल करेंगे। हालांकि मौलाना ने इमरान खान की रिहाई की मांग का समर्थन किया है और सरकार की जनविरोधी नीतियों पर लगातार हमला बोला है, लेकिन वे पूरी तरह से पीटीआई के एजेंडे पर चलेंगे या नहीं, इसे लेकर कूटनीतिक हलकों में संशय बना हुआ है। यदि यह गठबंधन औपचारिक रूप से धरातल पर उतरता है, तो आने वाले दिनों में पाकिस्तान की सड़कों पर हिंसक विरोध प्रदर्शन और व्यापक राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिल सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि इमरान खान का यह आखिरी दांव या तो उन्हें जेल से बाहर निकालकर सियासत के मुख्य केंद्र में वापस ले आएगा या फिर पाकिस्तान को गृहयुद्ध जैसी खतरनाक स्थिति की ओर धकेल देगा।