सीतारमण ने चीन की गैर-टैरिफ बाधाओं पर कसा तंज

सीतारमण ने चीन की गैर-टैरिफ बाधाओं पर कसा तंज

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत और चीन के बीच का व्यापारिक असंतुलन एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की वार्षिक बैठकों के दौरान थिंक-टैंक 'अटलांटिक काउंसिल' के साथ एक विशेष संवाद कार्यक्रम में भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा न केवल बेहद बड़ा है, बल्कि यह समय के साथ लगातार असमान रूप से बढ़ता ही जा रहा है।

वित्त मंत्री ने जोर देकर कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार में सबसे बड़ी रुकावट चीन द्वारा खड़े किए गए 'गैर-टैरिफ बैरियर्स' (Non-Tariff Barriers) हैं। जब भारतीय सामान चीनी बाजारों में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें सख्त फाइटोसेनेटरी नियमों, जटिल अनुमोदन प्रक्रियाओं और प्रशासनिक रुकावटों का सामना करना पड़ता है। सीतारमण के इस सीधे और तीखे बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी, क्योंकि यह पहली बार नहीं है जब भारत ने इस मुद्दे को उठाया है, लेकिन इस बार तेवर काफी सख्त थे।

सीतारमण ने यह भी रेखांकित किया कि भारत ने इस असंतुलन को ठीक करने के लिए कभी भी जल्दबाजी में काउंटरवेलिंग ड्यूटी (CVD) या बदले की भावना से दंडात्मक टैरिफ लगाने का आक्रामक रास्ता नहीं चुना है। भारत हमेशा संवाद, बातचीत और स्थापित तंत्र के माध्यम से समस्याओं का समाधान खोजने की नीति में विश्वास रखता है, भले ही इस प्रक्रिया में काफी समय लग जाए।

#1 100 अरब डॉलर के पार पहुंचा व्यापार घाटा: क्या कहते हैं चीन के आधिकारिक आंकड़े?

चीन के सीमा शुल्क विभाग (China Customs) द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत और चीन के बीच का व्यापार घाटा ऐतिहासिक रूप से 100 अरब डॉलर की सीमा को पार कर चुका है। रिपोर्टों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों के भीतर ही दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार 144.45 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसमें चीन से भारत को होने वाला निर्यात 125.19 अरब डॉलर रहा, जबकि भारत केवल 19.26 अरब डॉलर का सामान ही चीन को निर्यात कर सका।

यह भारी अंतर साफ दर्शाता है कि भारतीय बाजार में चीनी सामानों की पैठ बहुत गहरी है, जबकि भारतीय उत्पादों को चीनी बाजार में प्रवेश पाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है। यद्यपि भारत का चीन को होने वाला निर्यात भी प्रतिशत के हिसाब से बढ़ा है, लेकिन कुल मूल्य के मामले में चीन का पलड़ा अत्यधिक भारी है। इलेक्ट्रॉनिक्स, एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स (API), मशीनरी और औद्योगिक कच्चे माल के लिए भारतीय उद्योग काफी हद तक चीन पर निर्भर हैं।

व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस असंतुलन को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह भारत की विदेशी मुद्रा स्थिति और घरेलू विनिर्माण क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकता है। यही कारण है कि केंद्र सरकार न केवल भारत में 'मेक इन इंडिया' और पीएलआई (PLI) योजनाओं के जरिए घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दे रही है, बल्कि चीन पर अपना बाजार खोलने का निरंतर दबाव भी बना रही है।

#1 भारतीय फार्मा, आईटी और कृषि क्षेत्र के लिए चीन क्यों बंद कर रहा है अपने दरवाजे?

भारत लंबे समय से मांग करता रहा है कि चीन अपने बाजार को उन क्षेत्रों के लिए खोले जिनमें भारत वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और मजबूत है। इसमें मुख्य रूप से जेनेरिक दवाएं (Generic Medicines), सूचना प्रौद्योगिकी (IT Services), चावल, सब्जियां, गोमांस और अन्य कृषि उत्पाद शामिल हैं। भारत की जेनेरिक दवाएं पूरी दुनिया में अपनी गुणवत्ता और कम कीमत के लिए जानी जाती हैं, लेकिन चीन में इनके पंजीकरण की प्रक्रिया इतनी जटिल और लंबी है कि भारतीय कंपनियों के लिए वहां व्यापार करना बेहद कठिन हो जाता है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बात पर गहरा अफसोस जताया कि कई वर्षों की निरंतर वार्ता और द्विपक्षीय बैठकों के बावजूद इन क्षेत्रों में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। चीन सुरक्षा और मानक जांच के नाम पर गैर-टैरिफ उपायों का इस्तेमाल करके भारतीय उत्पादों को बाहर रखता है, जबकि दूसरी ओर वह भारतीय बाजार में बिना किसी बड़ी बाधा के अपने निर्मित सामानों की आपूर्ति करता रहता है।

इस नीति से भारतीय निर्यातकों में निराशा की भावना पैदा हो रही है। भारत का तर्क है कि यदि दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध निष्पक्ष और टिकाऊ बनाने हैं, तो चीन को अपने बाजार में भारतीय वस्तुओं और सेवाओं को समान अवसर (Level Playing Field) प्रदान करना ही होगा।

#1 विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया: बीजिंग ने सीतारमण के आरोपों पर क्या सफाई दी?

निर्मला सीतारमण के कड़े रुख और बयानों के बाद चीन के विदेश मंत्रालय की आधिकारिक प्रतिक्रिया भी सामने आ गई है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चीन भारत के साथ मिलकर एक-दूसरे की आर्थिक और व्यापारिक चिंताओं को संतुलित और सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने के लिए पूरी तरह तैयार है। बीजिंग का कहना है कि वे दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों के निरंतर और स्थिर विकास को बढ़ावा देना चाहते हैं।

हालांकि, चीनी अधिकारियों ने विशिष्ट गैर-टैरिफ बाधाओं पर सीधे तौर पर कोई तकनीकी जवाब देने से परहेज किया और कहा कि व्यापार से जुड़े विस्तृत और तकनीकी प्रश्नों के लिए संबंधित चीनी वाणिज्यिक अधिकारियों से संपर्क किया जाना चाहिए। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि चीन का यह रुख भारत की बढ़ती आर्थिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय दबाव का नतीजा है।

बीजिंग जानता है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और भारतीय बाजार को खोना किसी भी देश के लिए बड़ा झटका हो सकता है। ऐसे में चीन अब केवल बयानों तक सीमित रहने के बजाय भारत के साथ व्यापारिक वार्ता के नए दौर की शुरुआत करने का संकेत दे रहा है।

#1 भविष्य की राह: भारत की आत्मनिर्भरता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव

भारत-चीन व्यापार संबंधों में आ रहा यह मोड़ केवल दो देशों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) के पुनर्गठन का हिस्सा है। भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता को कम करने के लिए कई कड़े और रणनीतिक कदम उठाए हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में चीनी निवेश पर नकेल कसने से लेकर कई चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने और आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देने तक, भारत ने एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया है।

इसके साथ ही, भारत दुनिया के अन्य प्रमुख आर्थिक केंद्रों जैसे अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को अंतिम रूप देने या उन पर तेजी से काम करने में लगा हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यापार के स्रोतों का विविधीकरण करना है ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता न रहे। यदि चीन भारत की चिंताओं को दूर करते हुए गैर-टैरिफ बाधाओं को नहीं हटाता है, तो भारत अपनी आयात रणनीतियों में और अधिक कठोर बदलाव कर सकता है, जिसका सीधा असर भविष्य के द्विपक्षीय व्यापार पर पड़ेगा।