सुप्रीम कोर्ट में CJI सूर्यकांत की बेंच ने तीखा सवाल पूछकर मांगा हलफनामा
भारतीय डिजिटल भुगतान प्रणाली (Digital Payment Ecosystem) और यूपीआई (UPI) ट्रांजैक्शन को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में एक बहुत ही अहम और बड़ा कानूनी मुकाबला शुरू हो चुका है, जिसने देश भर के फिनटेक सेक्टर, बैंकिंग संस्थानों और करोड़ों आम नागरिकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में हुई सुनवाई के दौरान जब यह बात सामने आई कि दो हजार रुपये से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर लगने वाले संभावित शुल्कों या चार्जेस पर फिलहाल किसी प्रकार की रोक लगाने से केंद्र सरकार ने इनकार कर दिया है, तो मामले ने तूल पकड़ लिया। इस रुख पर कड़ी आपत्ति जताते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने केंद्र सरकार से तीखे शब्दों में सवाल किया कि यदि यह शुल्क कोई टैक्स यानी कर नहीं है, तो फिर आखिरकार यह किस श्रेणी के अंतर्गत आता है और इसके पीछे का विधिक आधार क्या है। अदालत ने केंद्र सरकार और संबंधित विभागों को इस गंभीर मामले पर जल्द से जल्द अपना विस्तृत हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया है, जिससे आने वाले दिनों में डिजिटल ट्रांजैक्शन की नीतियों को लेकर एक बड़ी नीतिगत बहस छिड़ने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
डिजिटल इंडिया और UPI क्रांति के दौर में ट्रांजैक्शन चार्जेस पर क्यों मचा है घमासान?
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की है, जहां छोटे से लेकर बड़े व्यापारी तक हर कोई अपने रोजमर्रा के लेन-देन के लिए यूपीआई (Unified Payments Interface) का खुलकर इस्तेमाल कर रहा है। सरकार और रिजर्व बैंक (RBI) की तरफ से हमेशा से यह बढ़ावा दिया जाता रहा है कि डिजिटल भुगतान पूरी तरह से सहज, सुलभ और बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के होना चाहिए ताकि देश में कैशलेस इकॉनमी को तेजी से गति मिल सके। हालांकि, जब से दो हजार रुपये से अधिक के कुछ खास लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या अन्य शुल्कों को लेकर चर्चाएं शुरू हुई हैं, तब से बैंकरों, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के मन में यह चिंता सताने लगी है कि क्या मुफ्त मिलने वाली यह सेवा आने वाले समय में महंगी हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट में चल रहे इस मौजूदा मामले ने इसी अंतर्निहित चिंता को सतह पर ला दिया है, क्योंकि जब बात आम जनता की जेब और देश के सबसे बड़े पेमेंट नेटवर्क की आती है, तो हर कोई यह जानना चाहता है कि सरकार की दीर्घकालिक नीति क्या है और क्या उपभोक्ताओं पर इसका कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने वाला है।
CJI सूर्यकांत की बेंच की कड़ी पूछताछ: "अगर यह टैक्स नहीं है, तो फिर यह क्या है?"
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच ने मामले की गंभीरता को समझते हुए सरकार के नुमाइंदों से बेहद तीखे और सटीक सवाल पूछे। जब केंद्र सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि यूपीआई लेन-देन पर लगने वाले ये चार्ज किसी प्रकार का पारंपरिक टैक्स या कर नहीं हैं, तो बेंच ने तुरंत टोकते हुए पूछा कि यदि इसे वैधानिक रूप से टैक्स नहीं कहा जा सकता, तो फिर इसे किस रूप में परिभाषित किया जाएगा और इसके नियमन (Regulation) की क्या व्यवस्था है। अदालत का यह स्पष्ट रुख यह दर्शाता है कि न्यायपालिका डिजिटल इकोनॉमी से जुड़े वित्तीय मामलों में पूरी पारदर्शिता चाहती है और यह सुनिश्चित करना चाहती है कि बिना किसी स्पष्ट कानूनी ढांचा या मनमाने तरीके से उपभोक्ताओं या सेवा प्रदाताओं पर कोई आर्थिक बोझ न डाला जाए। बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि डिजिटल ट्रांजैक्शन आज देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं, इसलिए इस पर किसी भी प्रकार का अस्पष्ट शुल्क या नीतिगत असमंजस जनता के बीच गलत संदेश दे सकता है।
सरकार का पक्ष, हलफनामे की मांग और इस कानूनी लड़ाई के दूरगामी प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े निर्देश के बाद अब केंद्र सरकार और संबंधित वित्तीय नियामकों की जिम्मेदारी बढ़ गई है कि वे अदालत के समक्ष एक विस्तृत और स्पष्ट हलफनामा पेश करें जिसमें इन शुल्कों की कानूनी वैधता, जरूरत और उसके तौर-तरीकों का पूरा ब्योरा हो। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का फैसला केवल कुछ शुल्कों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में डिजिटल पेमेंट्स के भविष्य, मर्चेंट डिस्काउंट रेट की नीतियों और फिनटेक कंपनियों के बिजनेस मॉडल को भी गहराई से प्रभावित करेगा। यदि अदालत इस मामले में कड़े दिशानिर्देश जारी करती है, तो सरकार और बैंकों को यूपीआई से जुड़े लेन-देन के ढांचे में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। फिलहाल, पूरे देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं, जहां यह तय होगा कि आम आदमी के डिजिटल सफर में यह शुल्क व्यवस्था किस रूप में आकार लेगी और क्या सरकार को अपने रुख में कोई संशोधन करना पड़ेगा या नहीं।