मायावती का केंद्र और चुनाव आयोग पर बड़ा हमला
भारतीय राजनीतिक गलियारों और चुनावी उठापटक के बीच बहुजन समाज पार्टी (BSP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती (Mayawati) ने एक बार फिर से देश की चुनावी प्रक्रिया, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और विपक्षी दलों की भूमिका पर बेहद तीखे, आक्रामक और सनसनीखेज सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में एक राजनीतिक कार्यक्रम और प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मायावती ने न सिर्फ चुनाव परिणामों पर गंभीर संदेह जताया, बल्कि आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) की जीत के पीछे भी एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश का बड़ा आरोप मढ़ दिया। मायावती के इस बयान के सामने आते ही उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश की राजनीति में भूचाल आ गया है और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की तरफ से इस पर लगातार प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो ने बहुत ही बेबाक अंदाज में यह कहा कि देश की मौजूदा चुनावी प्रणाली से आम जनता का भरोसा उठता जा रहा है, और यदि लोकतंत्र को वास्तव में जिंदा रखना है, तो देश भर में ईवीएम का इस्तेमाल बंद करके फिर से पुरानी और पारदर्शी बैलट पेपर (Ballot Paper) व्यवस्था को बहाल किया जाना चाहिए। आइए इस विस्तृत और विशेष रिपोर्ट में जानते हैं कि मायावती ने अपने इस तीखे हमले के दौरान और कौन-कौन से बड़े आरोप लगाए और इसके राजनीतिक मायने क्या हैं।
मायावती का बड़ा हमला: चंद्रशेखर आजाद की जीत के पीछे बताई गई राजनीतिक साजिश
अपने तीखे बयानों और बेबाक राजनीतिक फैसलों के लिए जानी जाने वाली मायावती ने इस बार अपनी ही राजनीति के दायरे में उठने वाली नई आवाज़ों और चुनावी परिणामों पर सीधा निशाना साधा है। उन्होंने बिना नाम लिए या सीधे तौर पर इशारा करते हुए कहा कि कुछ खास क्षेत्रीय और विपक्षी दलों ने सत्ताधारी पार्टी (BJP) के साथ मिलकर गुप्त समझौते किए, जिसके तहत एक सोची-समझी साजिश के तहत चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं को चुनाव जितवाया गया ताकि दलित वोटों को और अधिक खंडित किया जा सके। मायावती का यह तर्क रहा है कि जब तक जमीनी स्तर पर जनता का पूर्ण समर्थन और निष्पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था नहीं होती, तब तक इस तरह के चुनावी नतीजे अपने आप में कई बड़े संदेह पैदा करते हैं। उनके इस बयान के बाद से राजनीतिक विश्लेषक यह कयास लगा रहे हैं कि आगामी चुनावों से पहले बहुजन समाज पार्टी अपनी रणनीति में बहुत बड़ा बदलाव करने जा रही है और वह अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाने के लिए आक्रामक रुख अख्तियार करने के मूड में पूरी तरह से तैयार है।
ईवीएम पर बार-बार उठते सवाल और बैलट पेपर की वापसी की उठी मांग
चुनावी हार-जीत के बाद ईवीएम (EVM) की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना भारतीय राजनीति में कोई नया वाकया नहीं है, लेकिन मायावती ने इस मुद्दे को एक बार फिर सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया है। उन्होंने बहुत ही कड़े शब्दों में यह कहा कि दुनिया के कई विकसित देश आज भी पारदर्शी चुनाव कराने के लिए बैलट पेपर का इस्तेमाल करते हैं, तो फिर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में ईवीएम को लेकर इतना आग्रह क्यों बना हुआ है? मायावती का यह मानना है कि जब तक मतदान मशीनों की पारदर्शिता और उनकी फुल-प्रूफ सुरक्षा को लेकर देश के हर मतदाता के मन से संदेह दूर नहीं हो जाता, तब तक लोकतंत्र की सच्ची बहाली संभव नहीं है। उन्होंने चुनाव आयोग (Election Commission) से यह मांग की है कि देश के भविष्य और निष्पक्षता को ध्यान में रखते हुए आगामी सभी छोटे-बड़े चुनाव ईवीएम के बजाय पारंपरिक मतपत्रों यानी बैलट पेपर के माध्यम से ही कराए जाएं, ताकि किसी भी दल को यह शिकायत न रहे कि मशीन के जरिए जनादेश के साथ कोई छेड़छाड़ की गई है।
विपक्षी दलों की भूमिका और बहुजन समाज पार्टी की आगामी चुनावी रणनीति
मायावती के इस नए और आक्रामक राजनीतिक हमले ने यह साफ कर दिया है कि बहुजन समाज पार्टी आने वाले दिनों में किसी भी गठबंधन के दबाव में आए बिना अपने दम पर अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए संघर्ष करेगी। उन्होंने अन्य विपक्षी दलों पर भी कटाक्ष करते हुए कहा कि वे केवल चुनाव के समय दलितों और शोषितों के वोट पाने की राजनीति करते हैं, लेकिन असल मुद्दों पर कोई ठोस और क्रांतिकारी कदम नहीं उठाते। बीएसपी सुप्रीमो ने अपने सभी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को यह निर्देश दिया है कि वे गांव-गांव जाकर पार्टी की नीतियों का प्रचार करें और जनता को यह समझाएं कि कैसे कुछ ताकतें उनके संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की साजिश रच रही हैं। इस पूरी रणनीति का मुख्य उद्देश्य पार्टी के उस मूल कैडर को फिर से एकजुट करना है जो पिछले कुछ चुनावों में छिटक कर अन्य दलों की तरफ चला गया था, ताकि पार्टी अपनी खोई हुई राजनीतिक ताकत को दोबारा हासिल कर सके।
राजनीतिक गलियारों में मची हलचल: इस बयान के आने वाले चुनावों पर क्या होंगे गंभीर असर?
मायावती के इस सनसनीखेज बयान के बाद उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति का तापमान काफी बढ़ गया है। जहां एक तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अन्य विरोधी दलों ने उनके इन आरोपों को उनकी राजनीतिक जमीन खिसकने की बौखलाहट करार दिया है, वहीं दूसरी तरफ बीएसपी समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं में इस मुखर विरोध के बाद एक नया जोश देखने को मिल रहा है। राजनीति के जानकारों का यह मानना है कि मायावती का यह कदम भले ही विवादास्पद लग रहा हो, लेकिन इसके जरिए उन्होंने एक बार फिर राजनीतिक पटल पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा दी है। जैसे-जैसे देश में आगामी चुनावों की सरगर्मी तेज होगी, ईवीएम बनाम बैलट पेपर का यह मुद्दा और बहुजन राजनीति की यह खींचतान भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े चुनावी मुद्दों में से एक बनकर उभरेगी, जिस पर हर देशवासी की पैनी नजर बनी रहेगी।