हिमंत बिस्वा सरमा के CJP को असम कूच अल्टीमेटम पर पूर्व मेजर जनरल ने दिया करारा जवाब
पूर्वोत्तर भारत की राजनीति में इन दिनों बयानों का दौर और तीखी तनातनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है, जहां असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के बीच छिड़ा विवाद अब एक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। हाल ही में असम के मुख्यमंत्री ने CJP को सीधे तौर पर एक तीखा अल्टीमेटम जारी करते हुए असम कूच करने की चुनौती दी थी, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई। इस पूरे घमासान के बीच देश के एक प्रतिष्ठित पूर्व मेजर जनरल ने इस मुद्दे पर कूदते हुए बेहद कड़े और बेबाक शब्दों में एक ऐसा सवाल पूछ लिया है जिसने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। पूर्व मेजर जनरल ने तंज कसते हुए कहा कि "आखिर ये दीपके (तीस्ता सीतलवाड़ या संबंधित एनजीओ से जुड़े लोग) कौन हैं?" और इस प्रकार के संगठन लगातार पूर्वोत्तर की शांति व्यवस्था को अशांत करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं। इस बयान के सामने आने के बाद असम की राजनीति में उबाल आ गया है और पक्ष-विपक्ष के बीच एक नया वैचारिक व राजनीतिक संग्राम छिड़ गया है, जिसके दूरगामी परिणाम आने वाले समय में राज्य के सामाजिक ताने-बाने पर पड़ सकते हैं।
CJP के असम कूच अल्टीमेटम और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का आक्रामक रुख
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) संगठन और उससे जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं ने असम सरकार की नीतियों, विशेषकर अवैध अतिक्रमण विरोधी अभियानों, डिटेंशन कैंपों और नागरिकता से जुड़े मुद्दों पर लगातार सवाल उठाने शुरू किए। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, जो अपने आक्रामक और स्पष्ट राजनीतिक अंदाज के लिए जाने जाते हैं, ने इस तरह के बाहरी हस्तक्षेप और राज्य की शांति को भंग करने वाले प्रयासों पर कड़ी आपत्ति जताई। मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि असम की जनता और सरकार राज्य में किसी भी कीमत पर अराजकता या सांप्रदायिक तनाव पैदा नहीं होने देगी, और यदि इस संगठन में हिम्मत है तो वे असम आकर दिखाएं। मुख्यमंत्री के इस तीखे अल्टीमेटम ने न केवल राजनीतिक दलों को बल्कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों को भी आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि हिमंत बिस्वा सरमा का यह रुख राज्य के उन मूल निवासियों के बीच काफी लोकप्रिय हो रहा है जो पूर्वोत्तर की जनसांख्यिकीय सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा को सबसे ऊपर रखते हैं।
पूर्व मेजर जनरल का तीखा बयान: "दीपके कौन हैं?" और सुरक्षा मामलों पर गंभीर सवाल
जब इस अल्टीमेटम और राजनीतिक गहमागहमी पर देश भर के रक्षा विशेषज्ञों और पूर्व सैन्य अधिकारियों की राय आनी शुरू हुई, तब एक जाने-माने पूर्व मेजर जनरल ने इस पूरे प्रकरण पर अत्यंत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान कटाक्ष करते हुए कहा कि असम जैसे संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में जहां देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता का सवाल है, वहां इस तरह के बाहरी एनजीओ और एक्टिविस्ट अनावश्यक दखलअंदाजी करके माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। पूर्व मेजर जनरल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में इस प्रकार के तत्वों को तवज्जो देने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे अक्सर जमीनी वास्तविकताओं को समझे बिना केवल अपने वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है, जहां एक तरफ कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थक इसे देशहित में उठाया गया एक जरूरी और कड़ा कदम मान रहे हैं।
पूर्वोत्तर की राजनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और इस विवाद के दूरगामी राजनीतिक निहितार्थ
असम और पूर्वोत्तर भारत का भू-राजनीतिक परिदृश्य हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है, क्योंकि यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से जुड़ा हुआ है जहां अवैध घुसपैठ, सीमा पार तस्करी और डेमोग्राफिक बदलाव जैसे मुद्दे हमेशा राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में रहे हैं। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा उठाए जा रहे कदम और पूर्व मेजर जनरल जैसे सैन्य दिग्गजों का समर्थन यह साबित करता है कि पूर्वोत्तर में अब राज्य सरकारें बाहरी दबावों के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। जब भी कोई संगठन स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली को चुनौती देने की कोशिश करता है, तो सरकार और जनता मिलकर उसका कड़ा मुकाबला करती है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि CJP और अन्य संबंधित संगठन इस अल्टीमेटम पर क्या कदम उठाते हैं और क्या वे वास्तव में असम का रुख करते हैं या यह केवल कागजी बयानों तक ही सीमित रहता है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत के सीमावर्ती राज्यों में राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय अखंडता और स्थानीय राजनीति का तालमेल कितना जटिल और महत्वपूर्ण है।