नवरात्रि के तीसरे दिन भौमे जया सिद्ध योग, चौथे दिन आयुष्मान और पंचमी पर कालदंड औदायिक योग; जानें साधना व खरीदारी के शुभ मुहूर्त
शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर मां भगवती के विभिन्न स्वरूपों की उपासना के साथ-साथ तिथियों और नक्षत्रों का अद्भुत खगोलीय संगम देखने को मिल रहा है। वैदिक पंचांग और मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार, नवरात्रि के तीसरे, चौथे और पांचवें दिन अत्यंत प्रभावशाली और विशिष्ट योगों का निर्माण हो रहा है। तीसरे दिन मंगलवार के प्रभाव और तृतीया तिथि के संयोग से 'भौमे जया सिद्ध योग' बन रहा है, वहीं चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा के साथ अमृतदायी 'आयुष्मान योग' का प्रभाव रहेगा। इसके उपरांत पंचमी तिथि को मां स्कंदमाता की आराधना के समय 'कालदंड' और 'औदायिक योग' का विशिष्ट संयोग बन रहा है। ज्योतिषविदों के अनुसार, इन योगों के प्रभाव में की जाने वाली मंत्र साधना, अनुष्ठान और भौतिक खरीदारी कई गुना अधिक शुभ और अक्षुण्ण फल प्रदान करती है।
तीसरे दिन 'भौमे जया सिद्ध योग': मां चंद्रघंटा की उपासना और शत्रुओं पर विजय
नवरात्रि की तृतीया तिथि पर मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना का विधान है। शास्त्रों में तृतीया तिथि को 'जया' तिथि कहा गया है, जिसका अर्थ है विजय और सफलता दिलाने वाली तिथि। जब जया तिथि मंगलवार (भौमवार) के दिन पड़ती है और साथ में सिद्ध योग का मेल होता है, तो इसे ज्योतिष में 'भौमे जया सिद्ध योग' का नाम दिया जाता है।
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धार्मिक व ज्योतिषीय महत्व: यह योग शत्रुओं पर विजय, मुकदमों में राहत और भूमि-भवन से जुड़े कार्यों में सफलता दिलाने के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।
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साधना विधान: मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। इस दिन लाल वस्त्र धारण कर देवी को लाल सेब, केसर की खीर या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाने और चमेली के पुष्प अर्पित करने से साधक के भीतर अदम्य साहस और निर्भयता का संचार होता है। मंगल ग्रह से जुड़े दोषों और रक्त विकार की समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए यह दिन विशेष फलदायी है।
चौथे दिन 'आयुष्मान योग': मां कुष्मांडा की आराधना से आरोग्य और दीर्घायु का वरदान
चतुर्थी तिथि पर ब्रह्मांड की आद्य स्वरूपा मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है, जिनकी मंद मुस्कान से सृष्टि की उत्पत्ति मानी गई है। इस दिन पंचांग में 'आयुष्मान योग' का संयोग बन रहा है। वैदिक ज्योतिष में आयुष्मान योग को नाम के अनुरूप ही दीर्घ जीवन, उत्तम स्वास्थ्य और चिरस्थायी यश प्रदान करने वाला माना गया है।
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शुभ फल: इस योग में किए गए संकल्प और मांगलिक कार्य लंबे समय तक स्थायित्व और शुभ परिणाम देते हैं। जो लोग पुरानी बीमारियों से ग्रसित हैं, उनके लिए इस दिन की गई साधना विशेष संजीवनी का काम करती है।
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पूजन विधि: मां कुष्मांडा को 'कुम्हड़ा' (पेठा) और मालपुए का भोग अति प्रिय है। हरे या पीले रंग के वस्त्र पहनकर देवी की आराधना करने से बुध ग्रह के दोष शांत होते हैं, बुद्धि प्रखर होती है और परिवार में आरोग्य का वास होता है।
पंचमी पर 'कालदंड' और 'औदायिक योग': मां स्कंदमाता देंगी नकारात्मकता से सुरक्षा
नवरात्रि की पंचमी तिथि वात्सल्य की देवी मां स्कंदमाता को समर्पित है, जो भगवान कार्तिकेय (स्कंद) को अपनी गोद में लिए कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इस तिथि पर सूर्योदय कालीन मान से 'औदायिक योग' और विशिष्ट नक्षत्र गति के चलते 'कालदंड योग' का प्रभाव रहेगा।
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कालदंड और औदायिक योग का प्रभाव: औदायिक योग उदयातिथि के कारण पूरे दिन की शुभता और संकल्प की शक्ति को बनाए रखता है। वहीं कालदंड योग के दौरान नकारात्मक ऊर्जाओं, तंत्र बाधाओं और अनिष्टकारी शक्तियों का शमन करने के लिए मां भगवती का कवच पाठ और संकीर्तन अचूक माना जाता है। यह योग साधक को कठिन परिस्थितियों और आकस्मिक संकटों से ढाल बनकर बचाता है।
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साधना और भोग: मां स्कंदमाता को केले और शहद का भोग लगाना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। इस दिन श्वेत अथवा स्लेटी/धूसर रंग के वस्त्र धारण कर पूजा करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है और ज्ञान व विवेक में वृद्धि होती है।
इन योगों में खरीदारी और नए कार्यों की शुरुआत
नवरात्रि के इन तीनों दिनों में बन रहे दुर्लभ योग केवल आध्यात्मिक साधना के लिए ही नहीं, बल्कि नए व्यापार की शुरुआत, बहीखाता पूजन, वाहन, स्वर्ण-रजत आभूषण और अचल संपत्ति की खरीदारी के लिए भी अत्यंत शुभ माने गए हैं:
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तृतीया (भौमे जया सिद्ध योग): जमीन-जायदाद, फ्लैट या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बुकिंग व खरीदारी के लिए यह योग अत्यंत शुभ है।
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चतुर्थी (आयुष्मान योग): नई साझेदारी, स्वास्थ्य बीमा, औषधियों की शुरुआत और शिक्षा से जुड़े निवेश के लिए यह सर्वोत्तम समय है।
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पंचमी (औदायिक योग): वस्त्र, आभूषण, शेयर बाजार में दीर्घकालिक निवेश और नए प्रतिष्ठान के उद्घाटन के लिए यह दिन समृद्धिदायक माना जाता है।
शास्त्र सम्मत मान्यता है कि नवरात्रि के दौरान बनने वाले ऐसे शुभ योगों में सच्चे मन से की गई दुर्गा सप्तशती की एक भी आवृत्ति साधक के जीवन के समस्त पापों और दरिद्रता का नाश कर अक्षय पुण्य प्रदान करती है।