EC पर भड़के असदुद्दीन ओवैसी, आचार संहिता और निष्पक्षता पर उठाए तीखे सवाल
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भारतीय चुनाव आयोग (Election Commission of India) की निष्पक्षता और कार्यशैली पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। एक बड़ी राजनीतिक जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने कहा कि देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाली इस संवैधानिक संस्था की साख लगातार सवालों के घेरे में आ रही है। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि बेहतर होगा कि केंद्र सरकार चुनाव आयोग का नाम बदलकर 'प्रधानमंत्री जिताओ कमीशन' रख दे। ओवैसी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अब एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की तरह काम करने के बजाय सत्ताधारी दल के राजनीतिक हितों को साधने का जरिया बनता दिख रहा है। उनके इस विस्फोटक बयान ने सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
आचार संहिता के दोहरे मापदंड पर गंभीर सवाल, सत्ता पक्ष को खुली छूट का आरोप
ओवैसी ने चुनावी रैलियों में आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) के क्रियान्वयन को लेकर चुनाव आयोग के रवैये पर उंगली उठाई। उन्होंने कहा कि जब विपक्ष का कोई नेता अपने भाषणों में अल्पसंख्यकों, दलितों या गरीबों के बुनियादी हकों की बात करता है, तो चुनाव आयोग तुरंत हरकत में आकर नोटिस थमा देता है और प्रचार पर पाबंदी लगाने की धमकी देने लगता है। इसके विपरीत, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता चुनावी मंचों से ध्रुवीकरण करने वाले या विवादास्पद बयान देते हैं, तब आयोग पूरी तरह आंखें मूंद लेता है। ओवैसी ने कहा कि नियमों की यह दोहरी व्यवस्था साबित करती है कि सभी दलों को बराबरी का मैदान (Level Playing Field) नहीं दिया जा रहा है।
वोटर लिस्ट से नाम कटने और फॉर्म-7 के दुरुपयोग का उठाया मुद्दा
अपने भाषण में ओवैसी ने मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण (SIR) और वोटर लिस्ट से बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में चुनाव आयोग की नाक के नीचे हजारों गरीब, अल्पसंख्यक और वंचित मतदाताओं के नाम चुपचाप लिस्ट से हटाए जा रहे हैं। ओवैसी ने कहा कि फॉर्म-7 का गलत इस्तेमाल करके फर्जी आपत्तियों के जरिए वास्तविक नागरिकों के मताधिकार को छीना जा रहा है, लेकिन आयोग इस पर कोई पारदर्शी जांच बिठाने के बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठा है। उन्होंने लोकतंत्र की मजबूती के लिए हर नागरिक के वोट के अधिकार की रक्षा को अनिवार्य बताया और कहा कि संस्थागत चुप्पी देश के लोकतांत्रिक ढांचे को भीतर से खोखला कर रही है।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया और स्वायत्तता पर गहराता संकट
असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े नए कानून पर भी केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन समिति में शामिल रखने का निर्देश दिया था, लेकिन केंद्र सरकार ने कानून में बदलाव कर समिति से चीफ जस्टिस को ही बाहर कर दिया। ओवैसी ने कहा कि जब आयोग के प्रमुखों का चयन केवल सत्ताधारी दल के बहुमत से तय होगा, तो उस संस्था से निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है। उन्होंने कहा कि इसी वजह से आज देश की आम जनता और विपक्षी दलों के मन में चुनाव आयोग की स्वायत्तता को लेकर भारी संशय पैदा हो रहा है।
लोकतंत्र और संविधान की रक्षा का आह्वान, विपक्ष की भूमिका पर भी तंज
ओवैसी ने केवल चुनाव आयोग और भाजपा पर ही निशाना नहीं साधा, बल्कि खुद को सेक्युलर और लोकतंत्र का रक्षक बताने वाले अन्य विपक्षी दलों को भी कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि जब संवैधानिक संस्थाओं का हनन हो रहा होता है, तब कई तथाकथित विपक्षी दल सिर्फ अपने सियासी नफे-नुकसान का गणित बैठाने में लगे रहते हैं। ओवैसी ने जनसभा में मौजूद युवाओं और समर्थकों से अपने वोट की ताकत को समझने और मतदाता सूची में अपना नाम हर हाल में दर्ज कराने की अपील की। उन्होंने कहा कि मजलिस किसी दबाव के आगे झुकने वाली नहीं है और जब तक जनता अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहेगी, तब तक लोकतंत्र को बंधक बनाने की हर साजिश नाकाम होती रहेगी।