भरत मिलाप का है मुगल काल और बेगम जहांआरा से गहरा कनेक्शन
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में स्थित मऊ जनपद की रामलीला देश भर में अपनी अनूठी परंपराओं, भव्यता और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए एक मिसाल मानी जाती है। यहां की रामलीला का मुख्य आकर्षण 'भरत मिलाप' का वह ऐतिहासिक प्रसंग है, जिसका सीधा और दिलचस्प कनेक्शन मुगल काल और शहजादी बेगम जहांआरा से जुड़ा हुआ है। सदियों पुरानी इस परंपरा के तहत जब भगवान श्री राम का विमान (रथ) भरत मिलाप के पावन अवसर पर शहर के मुख्य मार्गों से गुजरता है, तो वह एक खास रास्ते से होते हुए शहर की एक ऐतिहासिक मस्जिद को तीन बार श्रद्धा और सम्मान के साथ स्पर्श करता है। भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की यह अनोखी दास्तान न केवल स्थानीय लोगों के लिए बल्कि देश भर के शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए भी गहरी आस्था का केंद्र बनी हुई है। इस लेख में हम आपको मऊ की इस ऐतिहासिक रामलीला के उस अनसुने और गौरवशाली इतिहास से रूबरू करा रहे हैं, जो आज भी भारत की साझी संस्कृति की सबसे सुंदर तस्वीर पेश करता है।
मुगल बादशाह शाहजहां की बेटी बेगम जहांआरा और मऊ की रामलीला का यह ऐतिहासिक संस्मरण
मऊ के बुजुर्गों और इतिहास के पन्नों को खंगालने पर यह दिलचस्प तथ्य सामने आता है कि मुगल साम्राज्य के दौरान जब इस इलाके में सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों को लेकर कुछ गतिरोध की स्थिति बनी थी, तब मुगल बादशाह शाहजहां की सुपुत्री बेगम जहांआरा ने इस मामले में हस्तक्षेप किया था। बेगम जहांआरा ने दोनों समुदायों के बीच आपसी सद्भाव और शांति बनाए रखने के लिए एक ऐसा अनूठा समाधान निकाला था जो आज तक इतिहास के पन्नों में अमर हो गया है। उनके द्वारा तय किए गए नियमों और मार्ग के अनुसार ही रामलीला के दौरान भगवान श्रीराम के विमान को शहर की एक विशेष पुरानी मस्जिद के पास से गुजारे जाने की परंपरा शुरू की गई थी। इस परंपरा का उद्देश्य यह संदेश देना था कि कला, आस्था और सामाजिक सौहार्द किसी एक दायरे में बंधे नहीं होते, बल्कि सभी को साथ लेकर चलने में ही देश की असली खूबसूरती है। तब से लेकर आज तक, बिना किसी व्यवधान के पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह परंपरा पूरी निष्ठा के साथ निभाई जा रही है।
जब तीन बार मस्जिद को स्पर्श करता है श्रीराम का विमान: साझी संस्कृति और आपसी भाईचारे की अनूठी मिसाल
मऊ की इस ऐतिहासिक रामलीला के दौरान जब विजयादशमी या भरत मिलाप के दिन भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता का विमान शोभायात्रा के रूप में आगे बढ़ता है, तो पूरे शहर में गजब का उत्साह और भक्तिमय माहौल होता है। जैसे ही यह शोभायात्रा उस पारंपरिक मार्ग पर पहुंचती है, जहां ऐतिहासिक मस्जिद स्थित है, विमान को रोककर बेहद श्रद्धा के साथ उसे तीन बार मस्जिद की दीवारों को स्पर्श कराया जाता है। इस दृश्य को देखने के लिए हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के हजारों लोग सड़क के दोनों किनारों पर और छतों पर मौजूद रहते हैं। दोनों पक्षों के लोग इस दौरान फूलों की वर्षा करते हैं और एक-दूसरे को गले मिलकर बधाई देते हैं। वर्तमान समय में जब देश के कई हिस्सों में छोटी-छोटी बातों पर तनाव की खबरें आती हैं, मऊ की यह रामलीला और भरत मिलाप का यह दृश्य पूरी दुनिया को यह सिखाता है कि कैसे सदियों पुराने आपसी प्रेम और समझौतों को सहेजकर एक मजबूत और शांतिपूर्ण समाज का निर्माण किया जा सकता है।