यूपी में 2.7 करोड़ मतदाता रिजस्टर्ड क्यों नहीं
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण अधिकार को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। राज्य की अनुमानित वयस्क (18 वर्ष से अधिक आयु) जनसंख्या की तुलना में भारत निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची में करीब 2.7 करोड़ लोग पंजीकृत ही नहीं हैं। आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, प्रदेश की लगभग 16.7 प्रतिशत वयस्क आबादी चुनाव प्रक्रिया में मतदान करने के अधिकार से वंचित दिख रही है। एक ओर जहां निर्वाचन आयोग लगातार 'स्वीप' (SVEEP) अभियानों और विशेष मतदाता पुनरीक्षण (SIR) कार्यक्रमों के माध्यम से शत-प्रतिशत पंजीकरण का दावा करता है, वहीं इतनी बड़ी संख्या में पात्र नागरिकों का वोटर लिस्ट से गायब होना चुनावी प्रणाली, प्रशासनिक सतर्कता और नागरिक जागरूकता पर बड़े सवाल खड़े करता है।
अनुमानित वयस्क आबादी और मतदाता सूची में दर्ज आंकड़ों के बीच बड़ा अंतर
उत्तर प्रदेश की कुल जनसंख्या अनुमानों के आधार पर राज्य में 18 वर्ष से ऊपर के वयस्कों की संभावित संख्या लगभग 16.17 करोड़ के करीब आंकी गई है। हालांकि, चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए नवीनतम मतदाता आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगभग 13.46 करोड़ दर्ज की गई है। इस प्रकार, संभावित वयस्क आबादी और असल पंजीकृत मतदाताओं के बीच सीधे तौर पर 2.71 करोड़ से अधिक का एक विशाल अंतर दिखाई देता है। इस आंकड़ों के अंतर का सीधा गणित यह है कि उत्तर प्रदेश का हर छठा पात्र वयस्क नागरिक वर्तमान में आधिकारिक मतदाता सूची में जगह नहीं बना पाया है, जिससे वह आगामी चुनावों में अपने मताधिकार का प्रयोग करने में असमर्थ है।
पलायन, फॉर्म-6 की जटिलता और महिलाओं का कम नामांकन बने बड़े कारण
इस रिकॉर्ड अंतर के पीछे कई सामाजिक, तकनीकी और भौगोलिक कारण जिम्मेदार माने जा रहे हैं। सबसे प्रमुख कारणों में उत्तर प्रदेश से बड़े पैमाने पर होने वाला अंतरराज्यीय और अंतर-जिला पलायन (Migration) है। रोजगार, शिक्षा और आजीविका की तलाश में लाखों युवा दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, गुजरात, पंजाब और दक्षिण भारत के राज्यों में जाकर बस जाते हैं, जिससे उनका नाम न तो गृह गांव में दर्ज हो पाता है और न ही नए कार्यस्थल पर समय से जुड़ पाता है। इसके अलावा, युवा पीढ़ी (18-19 आयु वर्ग) के पहली बार बनने वाले मतदाताओं के बीच फॉर्म-6 भरने को लेकर जानकारी की कमी और प्रक्रियात्मक देरी भी एक प्रमुख बाधा है। लैंगिक अनुपात (Gender Ratio) के स्तर पर भी बड़ा अंतर देखा गया है; ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में सामाजिक बंदिशों व दस्तावेजों की अनुपलब्धता के कारण महिलाओं का मतदाता के रूप में पंजीकरण पुरुषों की तुलना में अब भी काफी कम है।
मतदाता सूची के फर्जीवाड़े को रोकने के लिए 'विलोपन अभियान' का असर
चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाने के लिए चलाए गए विशेष अभियानों (SIR) के तहत लाखों दोहरे (Duplicate), स्थानांतरित (Shifted) और मृत मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। इस सघन विलोपन प्रक्रिया के तहत जहां एक तरफ बोगस वोटिंग पर रोक लगी है, वहीं दूसरी तरफ कई बार दस्तावेजों के सत्यापन में देरी या बीएलओ (BLO - बूथ लेवल ऑफिसर) के डोर-टू-डोर सर्वे के दौरान घरों पर न मिलने के कारण कई वास्तविक पात्र नागरिकों के नाम भी ड्राफ्ट सूची से कट गए हैं। अर्हता तिथियों पर आवेदन न कर पाना या आधार कार्ड से वोटर आईडी लिंक कराने में आई तकनीकी समस्याएं भी उन कारणों में शामिल हैं जिनके चलते नाम जुड़ने की रफ्तार गति नहीं पकड़ सकी।
चुनाव आयोग का विशेष नामांकन अभियान और आम जनता के लिए जरूरी कदम
इस 2.7 करोड़ के विशाल अंतर को पाटने के लिए उत्तर प्रदेश निर्वाचन कार्यालय (CEO UP) और जिला निर्वाचन अधिकारियों द्वारा युद्धस्तर पर अभियान चलाए जा रहे हैं। डिग्री कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और औद्योगिक क्षेत्रों में विशेष कैंप लगाकर पात्र युवाओं के नाम जोड़े जा रहे हैं। चुनाव आयोग ने ऑनलाइन माध्यमों जैसे 'वोटर हेल्पलाइन ऐप' (Voter Helpline App) और NVSP पोर्टल के जरिए घर बैठे फॉर्म-6 भरने की सुविधा को और सरल बनाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस छूटी हुई 16.7 फीसदी आबादी को समय रहते मतदाता सूची में शामिल नहीं किया गया, तो यह आगामी त्रिस्तरीय और आम चुनावों में मत प्रतिशत (Voter Turnout) को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है। प्रशासन ने नागरिकों से अपील की है कि वे वोटर लिस्ट में अपने नाम की जांच तुरंत करें और समय रहते फॉर्म-6 भरकर अपने लोकतांत्रिक अधिकार को सुनिश्चित करें।