पाकिस्तानी राजनीति में महासंग्राम: रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का बड़ा कबूलनामा
पाकिस्तान की सियासत में एक बार फिर ऐसा सियासी भूचाल आया है जिसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामाबाद की प्रशासनिक व्यवस्था की कलई खोलकर रख दी है। पाकिस्तानी सरकार के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक साक्षात्कार के दौरान सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर लिया है कि देश में सरकार केवल नाममात्र की है और वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति रक्षा बल यानी सेना के पास ही केंद्रित है। उनके इस चौंकाने वाले कबूलनामे के बाद पाकिस्तान के तथाकथित 'हाइब्रिड मॉडल' (नागरिक और सैन्य शासन का मिला-जुला रूप) पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। इस बयान के सामने आते ही विपक्षी दलों ने शहबाज शरीफ सरकार पर करारे हमले शुरू कर दिए हैं।
#1. हाइब्रिड मॉडल का सच और रक्षा मंत्री की बेबाकी
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का यह बयान उस समय सामने आया है जब देश बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है। अंतरराष्ट्रीय साक्षात्कार के दौरान जब उनसे पाकिस्तान की सत्ता संरचना पर तीखे सवाल पूछे गए, तो उन्होंने यह माना कि पाकिस्तान में रक्षा नीति ही नहीं, बल्कि विदेश नीति से जुड़े तमाम बड़े फैसले सेना की मंजूरी से ही तय होते हैं। ख्वाजा आसिफ ने सत्ता-साझाकरण के इस स्वरूप को आपसी सहमति और हाइब्रिड निजाम बताया, लेकिन उनके उत्तर ने यह साफ कर दिया कि नागरिक सरकार केवल आधिकारिक मुहर लगाने का काम करती है। उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार और सेना प्रमुख मिलकर निर्णय लेते हैं, लेकिन सेना के प्रभाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
#1. शहबाज सरकार की बेबसी और असीम मुनीर का बढ़ता प्रभाव
शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली सरकार पर शुरुआत से ही यह आरोप लगते रहे हैं कि वह सेनाध्यक्ष जनरल असीम मुनीर के इशारों पर काम कर रही है। रक्षा मंत्री के इस बयान ने अब विपक्ष के दावों पर आधिकारिक मुहर लगा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान में चुनाव के जरिए चुनी गई असेंबली और कैबिनेट केवल एक मुखौटा बनकर रह गई हैं। प्रांतीय मामलों से लेकर बजट आबंटन और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक समझौतों तक, हर बड़े निर्णय की फाइल रावलपिंडी में स्थित सेना मुख्यालय (GHQ) की हरी झंडी के बिना आगे नहीं बढ़ती। इस स्थिति ने शहबाज सरकार को दुनिया के सामने अत्यंत कमजोर और लाचार स्थिति में ला खड़ा किया है।
#1. इमरान खान के दौर से लेकर आज तक: क्या बदला पाकिस्तान?
यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान में सैन्य दखलअंदाजी का सच उजागर हुआ हो। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी अपने कार्यकाल के दौरान इस बात को गर्व से स्वीकार किया था कि वह तत्कालीन सेना प्रमुख के साथ मिलकर हाइब्रिड मॉडल चला रहे हैं। हालांकि, सत्ता से बेदखल होने के बाद इमरान खान ने ही सेना पर सरकार गिराने का आरोप लगाया था। अब ख्वाजा आसिफ के इस बयान से यह बात पूरी तरह साबित हो चुकी है कि पाकिस्तान में चेहरा चाहे किसी भी नेता का हो, लेकिन शासन की असल कमान हमेशा सेना के हाथ में ही रहती है। सत्ताधारी दल और सेना का यह अनधिकृत गठबंधन लोकतंत्र की बुनियादी परिभाषा को पूरी तरह ध्वस्त कर रहा है।
#1. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान का कूटनीतिक संकट
रक्षा मंत्री के इस कबूलनामे का अंतरराष्ट्रीय पटल पर गंभीर असर पड़ने की संभावना है। जब किसी देश की चुनी हुई सरकार स्वयं यह स्वीकार करती है कि उसकी विदेश और रक्षा नीति पर सेना का नियंत्रण है, तो वैश्विक शक्तियां उस सरकार के साथ किए गए समझौतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने लगती हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देश हमेशा से पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और पारदर्शिता की मांग करते रहे हैं। ऐसे समय में ख्वाजा आसिफ का यह बयान इस्लामाबाद की अंतरराष्ट्रीय साख को गहरा झटका दे सकता है, क्योंकि दुनिया को अब स्पष्ट संदेश गया है कि नागरिक सरकार के पास अपनी नीतियां लागू करने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है।
#1. विपक्ष का जोरदार हमला और आगे के राजनीतिक समीकरण
पाकिस्तान के मुख्य विपक्षी दल पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) और अन्य विरोधी नेताओं ने इस बयान के बाद शहबाज शरीफ के इस्तीफे की मांग तेज कर दी है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि जब देश की सरकार खुद मान रही है कि वह कठपुतली की तरह काम कर रही है, तो ऐसी सरकार को सत्ता में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। संसद के भीतर और बाहर इस बयान को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सेना और शहबाज सरकार इस विवाद से ध्यान हटाने के लिए क्या कदम उठाती है, लेकिन फिलहाल इस घटनाक्रम ने पाकिस्तानी राजनीति की अनकही सच्चाई को पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है।